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शानदार अभिनेता की बढ़ती शोहरत

मलयालम सिनेमा स्टार दुलकर सलमान बॉलीवुड में अपनी पारी का आगाज कर रहे हैं. क्या वे उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे?
शानदार अभिनेता की बढ़ती शोहरत मंदार देवधर
सुहानी सिंहमुंबई, 01 August 2018

एक धारीदार सफेद टी-शर्ट में खड़े दुलकर सलमान के चेहरे से हमारे सामने खड़ी एक महिला रिपोर्टर की निगाहें नहीं हटतीं. जोश से चहकते हुए वह उन्हें बता रही है कि मणि रत्नम निर्देशित उनकी फिल्म ओके कनमणि (2015) देखने के बाद उसके दफ्तर की बहुत-सी महिलाएं दलकीर की दीवानी बन गई हैं. 31 वर्षीय ऐक्टर यह सुनकर थोड़ा झेंप जाते हैं और बातचीत को दूसरी तरफ मोड़ देते हैं.

वे अपनी पहली हिंदी फिल्म कारवां के प्रमोशन के लिए 10 दिनों से मुंबई में हैं और बॉलीवुड के प्रमोशन के अंदाज को समझने-अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. सलमान कहते हैं कि केरल में शायद ही वे किसी फिल्म का प्रमोशन करते हैं.

लेकिन कारवां के मुख्य अभिनेता इरफान लंदन में कैंसर का इलाज करा रहे हैं. ऐसे में प्रमोशन का दारोमदार उनके कंधों पर है. वे लगातार इंटरव्यू दे रहे हैं और इस कॉमेडी फिल्म के बारे में बातें करते हुए "बेहिचक'' बता रहे हैं कि इस फिल्म के मुख्य कलाकार तो इरफान ही हैं, वे तो उनके सहायक हैं.

कमल हासन, रजनीकांत और दिवंगत श्रीदेवी के बाद सलमान पहले दक्षिण भारतीय अभिनेता हैं जो बहुभाषी अभिनेता के रूप में हिंदी सिनेमा में धीरे-धीरे अपने लिए जगह बनाने की कोशिशों में जुटे हैं. मलयालम फिल्म सेकंड शो (2012) के साथ अपनी शुरुआत के बाद से उन्होंने कई तमिल और तेलुगु फिल्में की हैं जिसमें इस साल आई महानती भी शामिल है.

इसमें वे महान अभिनेता जेमिनी गणेशन के किरदार में हैं और यह अब तक की उनकी सबसे बड़ी हिट है. तो बॉलीवुड में आने में उन्हें इतना वक्त क्यूं लगा? बकौल सलमान, "इसके लिए मैंने लगकर बहुत कोशिश ही नहीं की थी. असल में प्रोजेक्ट्स तैयार करने के मामले में मैं खासा कमजोर हूं. मैं सिर्फ अपना काम देखता हूं.''

वे चाहते थे कि "ओरिजिनल कंटेट'' के साथ चीजें आगे बढ़ें लेकिन अब तक उन्हें अपनी लोकप्रिय मलयालम फिल्मों उस्ताद होटल (2012) और बंगलौर डेज (2014) के रीमेक के साथ ही आगे बढऩा पड़ रहा है. मलयालम सुपरस्टार ममूटी के बेटे सलमान ने लीक से हटकर बनी कई फिल्मों के साथ अपनी एक जगह बनाई है. उनकी सेकंड शो लाउड फिल्म नहीं थी जिसे कि लॉन्च के लायक फिल्म, बमुश्किल ही माना जा सकता है.

यहां तक कि जिस तमिल फिल्म वायै मूडी पेसोवम (2014) के साथ उन्होंने तमिल फिल्मों में कदम रखा था, इंटरवल के बाद वह भी बेहद खामोश थी. ममूटी के साथ तलपति बना चुके मणि रत्नम ने एक इंटरव्यू में कहा था, "सलमान पिता ममूटी से एकदम उलट हैं. यह देखना अद्भुत है कि इतने बड़े पिता के साए में पले-बढ़े बेटे पर पिता की बड़ी शख्सियत का कोई गुमान या असर नहीं. पूरी तरह से अलग, अनूठे, प्रतिभावान.''

कारवां में सलमान एक ऐसे युवक की भूमिका में हैं जो अपने पिता के शव को हासिल करने निकला है जिसे भूल से किसी और के साथ बदल दिया गया है. वे कहते हैं, "पहले हम सुपरहीरो जैसा बनना चाहते थे. आज बतौर ऐक्टर वैसा बनना चाहते हैं जिससे दर्शक खुद को आसानी से जोड़ लें. कारवां दिलेर फिल्म है.''

सलमान मलयालम फिल्मों के पहले कलाकार नहीं जिन्होंने बॉलीवुड में हाथ आजमाया हो. पिछले दशक में असिन (गजनी) और पृथ्वीराज सुकुमारन (अय्या, औरंगजेब) और अभी हाल में पार्वती (करीब करीब सिंगल) ने अपनी छाप छोड़ी है. खुद ममूटी ने भी बॉलीवुड में पांव जमाने की असफल कोशिश की.

और सुपरस्टार मोहनलाल भी राम गोपाल वर्मा की आग के बाद से नजर ही नहीं आए. मलयालम फिल्म उद्योग से बॉलीवुड की तरफ रुख करने वालों में रेवती ही हैं जो बॉलीवुड में टिकी रहीं. उन्होंने न सिर्फ हिंदी फिल्मों में ऐक्टिंग (लव, रात, 2 स्टेट) की है बल्कि निर्देशन (फिर मिलेंगे और मित्र, माइ फ्रेंड) भी किया है.

सलमान को मलयालम फिल्म सोलो (2017) में निर्देशित कर चुके बिजय नांबियार कहते हैं, "आप अच्छी प्रतिभाओं को लंबे समय तक दबा नहीं सकते. वे आपकी सोच को पर्दे पर उतारने के लिए सब कुछ करने को तैयार रहते हैं. एक अभिनेता के रूप में वे आत्मविश्वास से भरपूर और बहुत सुरक्षित हैं.''

शायद यही वजह है कि सलमान ने सावित्री पर बनी एक बायोपिक महानती में काम करने में कोई हिचक नहीं दिखाई. नांबियार जोड़ते हैं, "इंडस्ट्री में स्वीकार्यता अब ज्यादा है. कारवां जैसी भी रहे, सलमान अपनी जगह बना लेंगे.''

सलमान ने अगली हिंदी फिल्म द जोया फैक्टर साइन भी कर ली है जो अनुजा चौहान के उपन्यास पर है और सोनम कपूर मुख्य किरदार में. शूटिंग सितंबर में शुरू होगी. पर मुंबई में ही जम जाने की उनकी कोई योजना नहीं है. वे कहते हैं, "मलयालम सिनेमा अभी भी मेरे लिए नंबर वन है. इसने मुझे सब कुछ दिया है. नेटफ्लिक्स और अमेजन की बदौलत भौगोलिक दायरा टूट रहा है.''

कोच्चि में जन्मे सलमान चेन्नै में पले-बढ़े जहां स्कूल में उन्होंने तमिल और हिंदी सीखी. कम उम्र से ही वे अपनी विरासत को लेकर सतर्क हो चुके थे. वे कहते हैं, "फिल्मों में नहीं आता तो भी मैं अपने दम पर कुछ न कुछ जरूर करता. मैं नाकाम या यूं ही नहीं खो जाता.''

1990 के दशक में जब वे बड़े हो रहे थे तब मलयालम सिनेमा के प्रति उनमें कोई खास झुकाव नहीं था. वे बताते हैं कि फरहान अख्तर की दिल चाहता है (2001) उनके दिल को छू गई थी. "उसे देखकर महसूस किया कि हम बस अपनी कहानी कहते हुए भी अच्छी फिल्में बना सकते हैं.''

सलमान ने अमेरिका की परड्यु यूनिवॢसटी से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की है और अब भी ऊपरी तौर पर सीड और वेंचर कैपिटल फंडिंग में रुचि लेते हैं. वे कहते हैं, "इससे मुझे वैसी फिल्में करने की आजादी मिल जाती है जैसी करना चाहता हूं.'' सलमान सुकुमारन, फहद फासिल और विनीत श्रीनिवासन और ऐसे कई अन्य फिल्म इंडस्ट्री की दूसरी पीढ़ी के अभिनेताओं में से हैं, जो अपने सिनेमाई प्रयासों में सफल हुए हैं.

वे कहते हैं, "मैं समझता हूं कि किसी भी अभिनेता के लिए अपनी अलग पहचान बनाना जरूरी है.'' छह साल में 21 मलयालम फिल्में कर चुके सलमान मानते हैं कि अभी भी अनिश्चितता उनके लिए एक बड़ी परेशानी है. वे कहते हैं, "एक औसत मलयाली दर्शक को मुझसे बहुत ज्यादा आकांक्षाएं हैं. मैं खराब फिल्म नहीं कर सकता. मुझे नहीं पता कि मैं अच्छा हूं भी या नहीं.''

पिछले साल मलयालम सिनेमा गलत वजहों से खासा चर्चा में आ गया था जब लोकप्रिय मलयालम अभिनेता दिलीप पर एक अभिनेत्री के अपहरण और यौन उत्पीडऩ के गंभीर आरोप लगे थे. सलमान हालांकि दिलीप के अदालत से बरी न होने के बावजूद एम्मा (एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स) में बहाल कर लिए जाने पर टिप्पणी से बचते हैं पर इतना कहते हैं कि मलयालम फिल्मों को अपनी हीरोइनों के लिए भी कुछ करना चाहिए.

"सिनेमा के लिए लेखन में उस दौर का प्रतिबिंब था और लोग बहुत जागरूक न थे. #MeToo आंदोलन शुरू हुआ क्योंकि अब लोग खुलकर बोलने लगे हैं. अगर कोई चीज निषिद्ध हो जाती है या उसके बारे में चर्चा होने लगती है, तो उसका असर सबकी सोच पर होगा. अब कोई उस तरह की फिल्में नहीं लिखेगा. मुझे लगता है बदलाव तो आएगा.''

हिट पर हिट

उस्ताद होटल (2012)

अपने दादा से परंपराओं का सम्मान करना सीखते एक युवा खानसामा के किरदार में सलमान ने अपनी अदाकारी की छाप छोड़ी थी.

बंगलोर डेज (2014)

सलमान ने बाइकिंग के एक दीवाने युवा का किरदार निभाया था. शरीर के निचले अंगों में पक्षाघात की शिकार एक रेडियो जॉकी उसकी जिंदगी में आकर सबक देती है.

चार्ली (2015)

सलमान ने इसके लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड जीता. इसमें उन्होंने ऐसे स्वच्छंद व्यक्ति का किरदार निभाया जो अपनी तकदीर को तलाश रहा है.

ओके कनमणि (2015)

मणि रत्नम निर्देशित यह प्रेम कहानी लिव-इन रिलेशनशिप पर है और इस फिल्म से सलमान महिलाओं में खासे लोकप्रिय हुए हैं.

महानती (2018)

अभिनेत्री सावित्री पर बनी इस फिल्म में सलमान ने जेमिनी गणेशन का किरदार किया है. यह गणेश के साथ सावित्री के जटिल रिश्तों पर है.

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