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औरतों की कहानी उनकी जुबानी

महिला केंद्रित पटकथाओं की ओर फिल्मकार और निर्माता मुड़े तो इस साल आने वाली कई फिल्मों में औरतों का नजरिया और उनकी कहानियों की ही प्रमुखता दिखाई देगी

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aajtak.in
सुहानी सिंहमुंबई, 19 March 2020
औरतों की कहानी उनकी जुबानी डॉली किटी और वो चमकते सितारे में कोंकणा सेनशर्मा और भूमि पेडनेकर

एक पार्टी में पति से थप्पड़ खाने के बाद पत्नी शादी को लेकर सशंकित हो उठती है (थप्पड़); एक महिला पायलट करगिल युद्ध में लड़ाकू विमान उड़ाकर इतिहास रचती है (गुंजन सक्सेना: द करगिल गर्ल); एक सरोगेट मां का पोर्ट्रेट (मिमी); फिर, एक अंधविश्वासी पंजाबी महिला का पोर्ट्रेट (केटिना); और हत्या की चश्मदीद एक बेचैन महिला की कहानी (द गर्ल ऑन द ट्रेन). 2020 में रुपहले परदे पर आने वाली ये महज कुछेक कहानियां हैं जिनमें महिलाएं केंद्र में हैं.

स्त्री-केंद्रित अफसाने बेशक हिंदी सिनेमा में नए नहीं हैं, मगर यह साल ऐसी फिल्मों की तादाद की वजह से खास बनता दिख रहा है. इन फिल्मों का सारा दारोमदार अभिनेत्रियों के कंधों पर टिका है, जिनमें नई और अनुभवी दोनों तरह की अदाकारा हैं. यह बेशक हौसला बढ़ाने वाला ट्रेंड है कि फिल्म स्टुडियो महिलाओं के नजरिए और उनके मन की बात वाली फिल्मों में पैसा लगाने को उत्सुक हैं.

तापसी पन्नू की अदाकारी वाली अनुभव सिन्हा निर्देशित थप्पड़ बदसुलूकी बर्दाश्त न करने के हक में खड़ी है. यह कबीर सिंह के लेखक-निर्देशक संदीप रेड्डी वंगा की इस राय के उलट है कि ''जब आप प्यार में डूबे हों.. और आपको एक-दूसरे को थप्पड़ मारने की आजादी न हो, तो मुझे उसमें कोई सार दिखाई नहीं देता.'' पन्नू ने वफादार और प्यार करने वाली पत्नी अमृता का किरदार निभाया है. वह जब तलाक मांगती है तो उसके करीबी लोग सन्न रह जाते हैं. पन्नू बताती हैं कि यह फिल्म उनके लिए बेहद निजी है. वे कहती हैं, ''इसका वास्ता इस बात से है कि रिश्ते में क्या ठीक है और क्या नहीं है. फिल्म देखते वक्त या थिएटर से बाहर निकलने के बाद तकलीफदेह खामोशियां और नजरें होंगी. यह आपको कुछ देर ठहरकर सोचने का मौका देगी, जो जरूरी भी है क्योंकि इतने लंबे वक्त से हम ऐसी बातों को अनदेखा करते आ रहे हैं.''

थप्पड़ कंगना रनौत की पंगा और दीपिका पादुकोण की छपाक के एक महीने बाद आई. पहले की दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद से कमतर प्रदर्शन किया. पन्नू कहती हैं कि वे चाहती थीं कि ''ये फिल्में उड़ें'', मगर इनका हश्र देखकर दूसरों को महिला केंद्रित फिल्में बनाने से बिदकना नहीं चाहिए. पन्नू ऐसी कई फिल्मों में काम कर रही हैं. मसलन, कच्छ की धाविका पर आधारित रश्मि रॉकेट, पूर्व महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज पर बायोपिक, और जर्मन फिल्म रन लोला रन का रीमेक. वे कहती हैं, ''हम हार नहीं मान सकते. इसे समझ पाना मुश्किल है क्योंकि हम अच्छी फिल्में बना रहे हैं और बहुत कम बजट में बना रहे हैं ताकि आखिर में घाटा न हो.

हमारे मुनाफे का पड़ता हीरो केंद्रित फिल्मों जैसा भारी-भरकम नहीं है, लेकिन उम्मीद है कि उसमें इजाफा होगा.'' कुछ फिल्मों का बजट तो इतना कम है कि किसी बड़े हीरो की एक फिल्म की फीस के बराबर ही होगा. मसलन, कंगना रनौत अभिनीत क्वीन 23 करोड़ रु. में बनी थी और उसने 61 करोड़ रु. का मुनाफा कमाया. विद्या बालन की प्रमुख भूमिका वाली द डर्टी पिक्चर 31 करोड़ रु. में बनी और उसने 79 करोड़ रु. कमाए.

मगर फिल्मकार खुश हैं क्योंकि वे ऐसी कहानियां दिखा पा रहे हैं जो वे दिखाना चाहते हैं. रिभु दासगुप्ता ऐसे ही लेखक-निर्देशक हैं. उन्होंने बेस्टसेलर उपन्यास द गर्ल ऑन द ट्रेन को रुपहले परदे के हिसाब से ढाला है और परिणिति चोपड़ा, अदिति राव हैदरी और कीर्ति कुलहरि को प्रमुख भूमिकाओं में लिया है. दासगुप्ता कहते हैं, ''केवल महिलाओं को केंद्र में रखकर फिल्म बना पाना मुश्किल है क्योंकि माना यही जाता है कि महिला केंद्रित फिल्में अच्छी कामयाबी हासिल नहीं करतीं.'' दासगुप्ता यह भी कहते हैं कि ''हालांकि पहले कुछ फिल्मों ने अच्छी कामयाबी हासिल की है.'' वे विद्या बालन अभिनीत कहानी और द डर्टी पिक्चर और रानी मुखर्जी की मर्दानी का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने दर्शकों को खींचने की अपनी ताकत साबित की. यही नहीं, रनौत (तनु वेड्स मनु रिटर्न्स) और आलिया भट्ट (राजी) ने साबित किया है कि महिला केंद्रित फिल्में भी 100 करोड़ रु. का कारोबार कर सकती हैं.

यह दीगर बात है कि नायिका प्रधान फिल्मों में सहायक भूमिका के लिए लोकप्रिय ऐक्टरों को जुटा पाना मुश्किल होता है, बावजूद इसके कि पुरुष सुपरस्टार के सामने छोटी-सी भूमिका के लिए लोकप्रिय अभिनेत्रियों को लेना आम बात है. (डियर जिंदगी में शाहरुख खान अलबत्ता अच्छा अपवाद हैं). द गर्ल ऑन द ट्रेन में सहायक भूमिका के लिए अविनाश तिवारी (लैला मजनूं वाले) को राजी कर लेने वाले दासगुप्ता कहते हैं, ''यह इस पर निर्भर करता है कि भूमिका कितनी जोरदार लिखी गई है.''

फिल्मकार अलंकृता श्रीवास्तव (लिपस्टिक अंडर माइ बुर्का) जिस बात पर खास ध्यान देती हैं, वह यह कि महिला अदाकारों में आखिर कितनी ''गहरी इच्छा'' है कि वे महज ''ट्रॉफी ऐक्ट्रेस'' दिखाई न दें ''जिसमें आपको बस इतना करना है कि लड़का अच्छा दिखाई दे या आप उसके प्यार में दीवानी हैं.'' श्रीवास्तव कहती हैं, ''शुरुआत में वे महिला केंद्रित फिल्में करने की इच्छुक नहीं थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि व्यावसायिक कामयाबी... या लंबे करियर के लिहाज से यह अच्छा नहीं है.'' लेकिन, अपनी आगामी फिल्म डॉली किटी और वो चमकते सितारे में भूमि पेडणेकर और कोंकणा सेनशर्मा के साथ काम करने वाली श्रीवास्तव कहती हैं, ''पिछले कुछ साल में यह बदला है. नई आई अभिनेत्रियां जानती हैं कि उन्हें जिस साख की जरूरत है, वह ज्यादा ताकतवर भूमिकाओं वाली फिल्में करने से ही मिलेगी.''

फिल्म निर्माता भी अब सुपर स्टारों के नहीं मिलने से हौसला नहीं खोते. गुनीत मोंगा (पगलैट) और एकता कपूर (डॉली किटी... और केटीना) से लेकर संजय लीला भंसाली (गंगूबाई काठियावाड़ी) और भूषण कुमार (इंदू की जवानी और साइना नेहवाल पर बायोपिक) सभी अपनी फिल्म के कथ्य और अभिनेत्रियों की प्रतिभा को लेकर भरोसे से भरे नजर आते हैं.

नेटफ्लिक्स भी इसी नक्शेकदम पर चल पड़ा है. स्ट्रीमिंग के इस मंच की 2020 की फेहरिस्त में पांच ओरिजिनल हैं. इनमें से कुछ की कमान महिला निर्देशकों ने संभाली है. इनमें शामिल हैं रुचि नारायण की गिल्टी जो तीन महिलाओं नारायण, कनिका ढिल्लों और अतिका चौहान का लिखा कैंपस ड्रामा है; रेणुका शहाणे की निर्देशित त्रिभंगा जिसमें काजोल और मिथिला पालकर ने भूमिकाएं निभाई हैं; अनुष्का शर्मा निर्मित बुलबुल जिसमें केंद्रीय पात्र एक चुड़ैल है; मिसेज सीरियल किलर जिसमें शीर्षक भूमिका में जैकलीन फर्नांडीस हैं; और अनुराग कश्यप की चोक्ड जिसमें मुख्य भूमिका सैयामी खेर ने निभाई है. नेटफ्लिक्स इंडिया की डायरेक्टर, इंटरनेशनल ओरिजिनल्स, सृष्टि आर्या कहती हैं, ''हम यह मानना चाहेंगे कि अच्छी कहानियां कहीं से भी आ सकती हैं और हर जगह पहुंच सकती हैं.

ऐसे में तमाम किस्म की कहानियां सुनाने वालों की नुमाइंदगी जरूरी है. हम उत्साहित हैं कि इतनी सारी महिला फिल्मकार आगे आई हैं और उन्होंने लीक से हटकर कहानियां सुनाने का रास्ता चुना है.'' हाल ही में रिलीज गिल्टी में दिखाया गया है कि किस तरह ''महिलाएं मजबूत साथी और क्रूर दुश्मन एक साथ हो सकती हैं'', वहीं मस्का में एक जवान आदमी की जिंदगी उसकी मां (मनीषा कोइराला) और गर्लफ्रेंड (शर्ली सेतिया) के आमने-सामने दिखाई गई है. आर्या कहती हैं, ''महिला किरदारों को हम जिस तरीके से देखने की कोशिश कर रहे हैं, उसमें यह भी पक्का होना चाहिए कि महिलाएं केंद्रीय भूमिका में न हों तब भी वे किसी न किसी के पक्ष में खड़ी हों और उनका कोई अर्थ हो.''

पटकथा लेखिका ढिल्लों ऐसे किरदार गढ़ और रच पाती हैं, जिन्हें देख पाने की कमी वे युवा दर्शक के तौर पर खुद महसूस करती थीं. बेधड़क और जुनूनी (मनमर्जियां) से लेकर एकांत-प्रिय और ढुलमुल (जजमेंटल है क्या) तक उनकी नायिकाएं जोखिम उठाती हैं, गलतियां करती हैं और गलतियों से सीखती हैं. ढिल्लों पुरानी हीरोइनों के बारे में कहती हैं, ''मुझे लगा कि मैं परदे की इन प्यारी-सी औरतों की तरह बिल्कुल नहीं हूं. मैं स्वार्थी हूं, गफलत में हूं, मेरे दिमाग में कुछ साफ नहीं है और आसानी से प्यार में पड़ जाती और उससे बाहर निकल जाती हूं.'' ढिल्लों के लिए 'उलझे और टूटे' लोगों के बारे में लिखना और उन्हें मुक्ति का रास्ता बताना ऐसा तरीका बन गया जिससे वे दिखाती हैं कि खोटे और गड़बड़ किरदारों का भी जश्न मनाया जा सकता है.

ये फिल्में यह भी दिखाती हैं कि दर्शक भी अलग-अलग रंग के महिला किरदार देखने के लिए तैयार हैं. चाहे वह मीटू आंदोलन हो या नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन. ढिल्लों कहती हैं, ''औरतों की आवाज तेज हो रही है. खासकर इस पीढ़ी में ऐसी औरतें हैं जो स्वतंत्र हैं. ये उपेक्षित नायिकाएं हैं.''

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