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सिनेमा-शुद्ध देसी संवाद

'सिनेमा साबुन नहीं है कि ये खुशबूवाला बना देते हैं. आपको अपनी कहानी कहनी होती है. जिस कहानी की भाषा कहेंगे वही लोगों तक पहुंचेगी

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 23 April 2019
सिनेमा-शुद्ध देसी संवाद विजय मौर्य

''पैसा भी रखेंगे और देंगे भी नहीं...और झाड़ी में दम है तो लै के दिखा दीजिए...बाकी, कुत्ते आप हैं, भौंकते रहिए." (अनारकली ऑफ आरा में स्वरा भास्कर)

—''मेरे बॉयफ्रेंड से गुलुगुलु करेगी तो धोंप देगी उसको."

(गली बॉय में आलिया भट्ट)

—''सरकारी गोली से कोई गवाह मरे है...इनके तो वादों से मरे हैं सब." (सोनचिड़िया में मनोज वाजपेयी)

आज के दौर की कई फिल्मों के संवाद में हमें क्षेत्रीय भाषाओं की खुशबू मिलती है. हिंदी सिनेमा अब बोलचाल वाली हिंदी की जगह किरदारों को खड़ा करने के लिए रुपहले परदे पर गांव के साथ उसकी भाषा के रंग भी उकेर रहा है. इन बेहद स्थानीय भाषाओं को समझने में दर्शकों को कोई दिक्कत पेश नहीं आ रही. ऐसी बोली में अब संवादों के जरिए लोग गली बॉय के 'धोंप' जैसे शब्द के मायने भी समझ रहे हैं, और कड़वी हवा में इस्तेमाल की गई बुंदेलखंडी और ओडिय़ा भी. पहले ऐसे संवाद अमूमन कला फिल्मों में ही इस्तेमाल किए जाते थे पर अब ये मुख्यधारा सिनेमा के निर्माताओं को भी भा रहे हैं. सत्या के बाद गली बॉय के मुंबइया डायलॉग सिनेप्रेमियों के बीच चल निकले हैं.

फिल्में हो या वेबसीरीज कहानी के कैनवस में जो जगह है, उसके साथ उसकी भाषा भी चली आ रही है. वेब सीरीज मिर्जापुर में सारे किरदार अगर अवधी की छौंक वाली हिंदी बोलते हैं तो अनारकली ऑफ आरा, सोनचिडिय़ा, मसान और गली बॉय समेत कई फिल्मों के चरित्र भोजपुरी, बुंदेलखंडी, अवधी, हरियाणवी जैसी भाषाओं और बोलियों में बातचीत करते हैं. स्थानीयता के इस पुट ने बॉक्स ऑफिस पर इन फिल्मों की मदद ही की. अनारकली ऑफ आरा के लेखक-निर्देशक अविनाश दास कहते हैं, ''क्षेत्रीय बोली के लिए यह स्वर्णिम युग है."

हिंदी फिल्मों में देसी बोली में संवाद लिखने वाले लेखक बोली को लेकर काफी रिसर्च करते हैं. कुछ लोग इसे संवाद लेखन का नया ट्रेंड बताते हैं.

लेकिन मसान के संवाद लेखक वरुण ग्रोवर इसे ट्रेंड मानने से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ''सिनेमा साबुन नहीं है कि ये खुशबू वाला बना देते हैं. आपको अपनी कहानी कहनी होती है. ये कहानी बांग्ला में है कि भोजपुरी में या मुंबई की भाषा में जैसा कि गली बॉय आई है. हर कहानी की भाषा होती है. जिस कहानी की भाषा कहेंगे वही लोगों तक पहुंचेगी." वे सवाल करते हुए कहते हैं, ''गली बॉय खड़ी बोली में बनेगी क्या? इसी तरह हम मसान दक्षिण भारतीय भाषा में बनाएंगे तो थोड़े न वह लोगों को समझ में आएगी. गंगा कहां से दक्षिण भारत में आएगी?"

उड़ता पंजाब और सोनचिडिय़ा जैसी फिल्में अपने संवाद की वजह से भी चर्चा में रही हैं. इनके संवाद आइआइएम से पढ़ाई करने वाले सुदीप शर्मा ने लिखे हैं. शर्मा कहते हैं, ''अगर आपको कहानी किसी एक खास प्रांत में पेश करनी है और वहां की मिट्टी की खुशबू चाहिए हमें, तो भाषा भी वहां की देनी पड़ेगी." शर्मा के मुताबिक, पहले निर्माता अपनी फिल्म में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल से घबराते थे. सत्या में बंबइया, बैंडिट क्वीन में बुंदेलखंडी और ओमकारा में ठेठ खड़ी बोली को दर्शकों ने पसंद किया तो निर्माताओं को भी भरोसा हुआ. वे कहते हैं, ''हर भाषा का एक साउंड होता है.

आपका जो किरदार है वह अगर बुंदेलखंडी है और बुंदेलखंडी में बात करता है तो उसके बोलने का तरीका ही नहीं बदलता बल्कि सोचने का तरीका भी बदल जाता है. उनकी मनोदशा में पहुंचना पड़ता है संवाद लिखते वक्त." शर्मा बताते हैं कि भाषा के मामले में उन्हें स्थानीय लोगों से काफी मदद मिलती है. लिखने के बाद भी वे ड्राफ्ट को किसी स्थानीय को पढ़वाते हैं ताकि फीडबैक मिल सके. वे कहते हैं, ''देसी संवाद को आजकल ऐक्टर्स चैलेंज की तरह लेते हैं. उनको भी मजा आता है. कहीं न कहीं ऐक्टिंग का मतलब भी यही है कि आप दूसरी दुनिया में पहुंच सकें. दोनों ही फिल्मों में भाषा को समझने में ऐक्टर्स ने काफी मेहनत की थी." सोनचिडिय़ा के बाद शर्मा ने अपनी एक और आने वाली फिल्म में बुंदेलखंडी संवाद लिखे हैं. अमेजन की एक थ्रिलर वेब सीरीज में बुंदेलखंडी के साथ पंजाबी और हरियाणवी के संवाद दिए हैं.

पत्रकारिता से सिनेमा में आने वाले अविनाश का नजरिया भी काफी जमीनी है. वे कहते हैं, ''आज जिसे देसी भाषा बोलते हैं, ये कोई नई भाषा नहीं है. हमारे समाज के बीच में जो बिखरी-पसरी हुई भाषा है, सिनेमा उसमें से थोड़ा अपने लिए भी उठा रहा है. आज जनता ही डायलॉग राइटर है." वे मानते हैं कि मुख्यधारा के सिनेमा पर इस तरह की मध्यमार्गी फिल्मों का असर हो रहा है. वे कहते हैं, ''भाषा के मामले में बैंडिट क्वीन तो यलगार है एक तरह से. आप कहानी बुंदेलखंड की या आरा, छपरा की कहेंगे, और भाषा रखेंगे दिल्ली और मुंबई की तो यह संभव नहीं है. रील को रियल करने के लिए भाषा पर काम करना बहुत जरूरी है."

अविनाश मानते हैं कि आप पूरे ठौर-ठिकाने दुरुस्त रखकर अगर कहानी सुनाएंगे तो इंडस्ट्री में भाषा से हिकारत का भाव नहीं है. पर कई दफा यह संदेह भी होता है कि कुछ बेहद स्थानीय शब्द हैं जिनके न समझे जाने का खतरा भी होता है. अविनाश कहते हैं, ''देसी भाषा में संवाद लेखन में ऐसी चुनौतियां तो होती हैं. दबाव भी होता है कि ये शब्द या मुहावरा नहीं समझेंगे, तो थोड़ा बहुत बदलना पड़ता है. भाषा के मामले में 20 प्रतिशत समझौते के बावजूद हमने भाषा को बचा लिया." कुछेक छोटे समझौतों के बाद भी संवाद में देसीपन का स्पर्श आ जाता है तो इसे कामयाबी ही माना जाना चाहिए. वे अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि स्वरा भास्कर के संवाद में से एक शब्द को बदलना पड़ा था. इसके बाद टीवी के लिए एक शब्द को हटाना पड़ा था जिससे पूरी फिल्म का मायना ही बदल गया था. वे स्वीकार करते हैं कि क्षेत्रीय भाषाओं के लिए भी नेटफ्लिक्स और अमेजन जैसे वेब प्लेटफॉर्म की वजह से बाजार बड़ा हो गया है.

थिएटर बैकग्राउंड से आने वाले विजय मौर्य को चिल्लर पार्टी के ओरिजनल स्क्रीनप्ले के लिए नेशनल अवार्ड मिल चुका है. वे सत्या फिल्म का हिस्सा रह चुके हैं. देसी संवादों को लेकर मौर्य उत्साहित हैं. वे कहते हैं, ''देसी बोली वाले संवाद को व्यक्तिगत तौर पर मैं बहुत अच्छा कदम मानता हूं. वे मानते हैं कि इस समय संवाद पर जो काम हो रहा है, वह क्रांतिकारी कदम है. डायलॉग में एक फन नजर आ रहा है." वे आगे बताते हैं कि गली बॉय में मुंबई की जो भाषा मैंने इस्तेमाल की है वो किताबों में नहीं मिलेगी आपको. बहुत से राइटर भाई हैं जो कानपुर, मुजफ्फरपुर, लखनऊ से हैं, वे अपनी चीजें लाते हैं सिनेमा में और उसमें मौलिकता है, यह क्रांति वाली बात है.

असल में, गली बॉय की निर्देशक जोया अख्तर ने उनसे साफ कहा था कि संवाद में किसी तरह की गाली नहीं होनी चाहिए. और मौर्य ने पूरी फिल्म में एक भी गाली का इस्तेमाल नहीं किया है. मौर्य मुस्कराते हुए बताते हैं, ''कुछ शब्द हैं तो वो सीखने के लिए हैं. जैसे, बोहत हार्ड, इसका मतलब लेंगे तो कड़क है, सख्त है. लेकिन मुंबइया बोली में बहुत खूब, क्या बात है. आज के युवाओं की अपनी एक लिपि है, लोकल भाषा है." जाहिर है, जैसे कपड़ों का फैशन बदलता है वैसे ही शब्दों का भी फैशन भी बदल रहा है. हिंदी फिल्मों में चल निकल ले पतली गली, चल कट ले, यह सब पुराना हो गया है और तकरीबन घिस-सा गया है. शायद इसीलिए मौर्य गली बॉय में कमती हो चल जैसे नए मुहावरे लेकर आए हैं. बकौल मौर्य, ''आज के स्टार को ऐसी भाषा से परहेज नहीं है. आलिया मुंबई की हैं बावजूद इसके उन्हें बोलने का लहजा समझाया गया.

रणवीर सिंह को दिक्कत नहीं आई. गली बॉय के लिए हमने एक सेफ रास्ता निकाला और वो ब्रोकेन हिंदी है." कड़वी हवा में संजय मिश्र बुंदेलखंडी मं" और रणबीर शौरी ओडिय़ा में अपनी बातें कहते हैं और लाचार किसान बने मिश्र की मजबूरी को दर्शकों तक पहुंचाने में भाषा आड़े नहीं आती और न फिल्म में यमदूत जैसी छवि वाले शौरी की भाषा से उनकी संप्रेषणीयता पर कोई खतरा दिखता है. देसी बोली और बानी इन दिनों सिनेमा के सिर चढ़कर बोल रही है. फिल्मी देसी बात भी भोत हार्ड है, भोतई हार्ड.

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