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सिनेमा-देखने की अलग नजर

आज वे पुरुषों से भरे एक सेट पर क्रू की मात्र तीन या चार महिलाओं में से एक होती हैं. टी-शर्ट, डेनिम शॉट्र्स और गुलाबी जूते में सजी पालित परंपरा से अलग दिखती हैं. अक्सर पूछा जाता है कि क्या वे कैमरा उठा सकती हैं.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 20 June 2019
सिनेमा-देखने की अलग नजर मधुरा पालित

इस वर्ष कान फिल्मोत्सव में कोई फिल्म न जाने से भारतीय सिनेमा की मौजूदा हालत शोचनीय लगी पर वहीं से भविष्य के अच्छे संकेत भी मिले. उच्च गुणवत्ता वाले ऑप्टिक्स सिनेमा लेंस के निर्माता एंजेनिएन्न्स ने कोलकाता स्थित सिनेमैटोग्राफर मधुरा पालित को वहां विशेष प्रोत्साहन पुरस्कार के लिए चुना. जब आमी ओ मनोहर (2018) के अंतिम शॉट को कान में उनके काम के नमूने के रूप में दिखाया गया तो गहरी दृष्टि और प्रकाश में प्रयोग के लिए उनकी खूब सराहना हुई.

पालित फ्रांस से लौट आई हैं और कई चीजों में व्यस्त हैं. कैमरे के पीछे की अभ्यस्त होने के कारण वे कहती हैं कि कैमरे के सामने आने को सोचकर वे थोड़ी घबराई थीं. ''मैं एक प्रेक्षक के रूप में बेहतर हूं. शायद दूसरों को कैमरे के सामने देखना मुझे ज्यादा सुखद लगता है.'' पालित जब सिनेमैटोग्राफी की पढ़ाई कर रही थीं तब उन्होंने नहीं सोचा था कि वे इस क्षेत्र में लैंगिक रूढिय़ों को तोड़ रही हैं. ''हट्टे-कट्टे पुरुष के ही सिनेमैटोग्राफर होने की धारणा'' ने उन्हें बहुत बाद में परेशान किया.

आज वे पुरुषों से भरे एक सेट पर क्रू की मात्र तीन या चार महिलाओं में से एक होती हैं. टी-शर्ट, डेनिम शॉट्र्स और गुलाबी जूते में सजी पालित परंपरा से अलग दिखती हैं. अक्सर पूछा जाता है कि क्या वे कैमरा उठा सकती हैं, तो छूटते ही वे कहती हैं, ''सिनेमैटोग्राफर से बस यही उम्मीद की जाती है?''

अपने लिए उन्होंने बहुत कम सीमाएं तय कर रखी हैं लेकिन अपने परिवेश की सीमाओं के अनुकूल ढलने को वे तैयार रहती हैं. एक फिल्म के बजट में कार रिग की गुंजाइश नहीं थी. उसकी शूटिंग के दौरान पालित ने पहाड़ी इलाके में चलती जीप से लटककर एक दृश्य फिल्माया. भला कौन-सी नायिकाओं से वे प्रेरणा लेती हैं? ''मैं रीड मोरानो को बहुत पसंद करती हूं. एक तस्वीर में वे चार महीने की गर्भवती होने पर कैमरे को थामे दिखती हैं. मेरे लिए यह किसी भी महिला की सबसे प्रेरक तस्वीर है.''

कोलकाता के सत्यजीत रे फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट की पूर्व छात्रा पालित पाथेर पांचाली (1955) के उस 'बहुचर्चित ट्रेन दृश्य' को ऐसा मानती हैं जो उनकी आंखों में तैरता रहता है और जिसने उन्हें बहुत प्रभावित किया. उनके माता-पिता फ़ोटोग्राफर हैं, ''जो काम को लेकर बहुत जोशीले हैं,'' इसलिए फिल्म के क्षेत्र की इस अलग विधा से उनका परिचय 'कम उम्र में' ही हो गया था.

अपने पुरस्कार के हिस्से के रूप में पालित को अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए एंजेनिएक्स लेंस उधार पर मिल सकता है, लेकिन डॉक्यूमेंट्री, टीवीसी, शॉर्ट फिल्में, फीचर फिल्में, कॉर्पोरेट फिल्में, म्युजिक वीडियो और पूरी तरह वीआर में फिल्माई गई एक फिल्म के अनुभव के साथ उनका रिज्यूमे बताता है कि इस युवा छायाकार ने कैमरे के पीछे से देखने का अपना नया अंदाज खोज लिया है.

  —मालिनी बनर्जी

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