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अर्थात्: अब अकेले नहीं बनेगी बात

मोदी के सुधार एजेंडे में राज्य सबसे कीमती कड़ी हैं और अब तक यह कड़ी मजबूती से नहीं जुड़ी है. अलबत्ता महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों के बाद इसे जोडऩे का मौका जरूर आ गया है.

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अंशुमान तिवारीनई दिल्ली, 21 October 2014
अर्थात्: अब अकेले नहीं बनेगी बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया जल्द ही फलक से इसलिए उतर गया क्योंकि निवेश राज्यों में होना है और सिंगल विंडो क्लियरेंस सूबों की सरकारों से मिलेगा, केंद्र से नहीं. उद्योगों की सबसे बड़ी आस यानी गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) राज्यों के साथ असहमति के कारण ही अधर में टंगा है. आलू-प्याज की कीमतें कम होने को राजी नहीं हैं तो वजह यह है कि राज्यों ने मंडी कानून बदलने में रुचि ही नहीं ली.

स्वच्छता मिशन अगर केंद्र सरकार के विभागों का कर्मकांड बनकर रह गया तो इसलिए क्योंकि स्थानीय निकायों को अधिकार देना राज्यों की जिम्मेदारी है. मोदी के सुधार एजेंडे में राज्य सबसे कीमती कड़ी हैं और अब तक यह कड़ी मजबूती से जुड़ी नहीं है. अलबत्ता, महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के बाद इसे जोडऩे का मौका जरूर आ गया है.

इन चुनावों को लेकर आकलन अगर सही बैठते हैं तो पश्चिम और उत्तर के दो प्रमुख औद्योगिक राज्यों में बीजेपी सत्ता में या सत्ता की धुरी के करीब होगी. लंबे समय के बाद पहली बार केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी या उसके सहयोगी दल, उत्तर और पश्चिम और मध्य भारत के उन सभी प्रमुख राज्यों की सत्ता संभाल रहे होंगे, जो अगले एक दशक में ग्रोथ का इंजन बनने वाले हैं. इसके बाद अब मोदी के लिए तेज सुधारों को टालने कोई कारण नहीं बचा है.

केंद्र में बीजेपी की सरकार आने के बाद केंद्र-राज्य रिश्तों का बदला हुआ परिदृश्य कठोर आर्थिक सुधारों के लिए सबसे अच्छा संयोग है. केंद्र के साथ गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पंजाब और सीमांध्र की सत्ता बीजेपी या उसके सहयोगी दलों के पास है और महाराष्ट्र व हरियाणा में पार्टी की संभावनाएं उफान पर हैं. यह ऐसा अवसर है, जिसके लिए यूपीए सरकार दस साल के कार्यकाल में तरसती रही. सुधारों के कई अहम प्रयोग इसी से परवान नहीं चढ़े क्योंकि बड़े और संसाधन संपन्न राज्यों से केंद्र के राजनैतिक रिश्तों में गर्मजोशी नहीं थी.

महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात देश की चार सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की सूची से हैं. पुनर्गठन के बाद आंध्र प्रदेश पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से बाहर हो गया है. पश्चिम बंगाल या कर्नाटक शीर्ष पांच में जगह लेने वाला है. भारतीय राज्यों के इस क्लब फाइव में गुजरात बीजेपी के पास है और महाराष्ट्र निशाने पर है.

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश उभरते हुए राज्य हैं, जहां निवेश और ग्रोथ के बड़े अवसर बन रहे हैं. डन ऐंड ब्रैडस्ट्रीट का आकलन है कि भारत के 11 राज्य (महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, केरल, बिहार, ओडिसा और संयुक्ïत आंध्र) 2020 तक देश की जीडीपी में 76 फीसदी के हिस्सेदार होंगे. फिलहाल उनका हिस्सा 68 फीसदी है.

रोजगार, ग्रोथ और मेक इन इंडिया के सपनों को जमीन इन्हीं 11 राज्यों में मिलनी है लेकिन पिछले तीन माह के कार्यकाल में मोदी ने राज्यों से रिश्तों को नए सिरे से गढऩे पर कोई काम नहीं किया है इसलिए उनके प्रयासों का प्रचार हकीकत की जमीन में जड़ पकड़ता नहीं दिखता और अनमने निवेशक सुधारों के वादों से मुतमईन नहीं हो पा रहे हैं.

मोदी ने जब योजना आयोग की विदाई का ऐलान किया था तो राज्य सहमत थे क्योंकि योजना आयोग की समाप्ति के साथ उस स्कीम राज का खात्मा जुड़ा था जो विकास के निर्णय लेने में राज्यों की आजादी का गला घोंटता था. मोदी मुख्यमंत्री रहते हुए स्कीम राज को लेकर केंद्र की दबंगई के खुद बड़े विरोधी थे, इसलिए राज्यों को उम्मीद थी कि उनके आने के बाद केंद्र के साथ वित्तीय रिश्ते बेहतर होंगे और अधिकारों का हस्तांतरण बढ़ेगा.

लेकिन मोदी की सरकार तो नए स्कीम राज की शुरुआत करती दिख रही है जो पुराने और मनमाने ढांचे की पीठ पर लादा जा रहा है. यह व्यवस्था पहले से ज्यादा अपारदर्शी है. योजना आयोग के दौर में राज्यों के लिए एक फॉर्मूला तो था, एनडीए सरकार की स्कीमों में तो राज्यों की भूमिका ही तय नहीं है.

टैक्स (जीएसटी), जमीन (भूमि अधिग्रहण) और बिजली (कोयला खदानें और बिजली खरीद समझौते) तीन सबसे बुनियादी सुधार हैं, जिनके लिए सभी राज्यों को सहमत करना जरूरी है लेकिन प्रधानमंत्री तो अब तक अपनी पार्टी की राज्य सरकारों को ही सुधार के संवाद से जोड़ नहीं पाए हैं. यही वजह है कि मेक इन इंडिया के बावजूद माहौल में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता. केंद्र और राज्य सरकारें चेन्नै में नोकिया की मोबाइल फोन फैक्ट्री बंद होने से बेचैन नहीं हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों की वित्तीय रीढ़ टूटने पर दिल्ली और लखनऊ फिक्रमंद नजर नहीं आए. खदानों का आवंटन टलने से राज्यों  में निवेश ठप है, बिजलीघरों के पास उपलब्ध कोयले का स्तर 25 साल में सबसे कम है लेकिन केंद्र और राज्य एक साथ प्रयास करते नहीं दिखते क्योंकि मोदी पिछले तीन माह में आर्थिक फैसलों में राज्यों के साथ साझेदारी का कोई चैनल नहीं बना पाए हैं. यही स्थिति पिछली सरकार में थी इसलिए राज्यों ने निवेश और ब्रांडिंग के अलग मॉडल बना लिए थे, गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी जिसके सूत्रधार थे.

तेज ग्रोथ राज्यों की भी राजनैतिक मजबूरी है और पिछले कुछ वर्षों में इसकी कोशिश भी हुई है. 2012-13 के दौरान 26 में 22 राज्यों की विकास दर राष्ट्रीय जीडीपी की गति से ज्यादा तेज थी. केंद्र और राज्यों का राजनैतिक नक्शा सुधारों के पूरी तरह माफिक है, नई सरकार को संघवाद का नया रसायन बनाना है. प्रधानमंत्री मोदी राज्यों के लिए अधिकारों की मांग करते हुए दिल्ली आए हैं.

अलबत्ता दिल्ली में बैठकर उन्हें अपने यानी केंद्र के अधिकारों में कमी और राज्यों के रसूख में बढ़ोत्तरी करनी होगी. गठबंधन तोड़कर सियासत के शिखर को छूने वाले मोदी को गवर्नेंस और ग्रोथ के लिए गठबंधन बनाने होंगे और सत्ता के विकेंद्रीकरण का नया डिजाइन तैयार करते हुए यह याद (एंड्रयू कारनेगी की बात) रखना होगा कि यदि कोई सारा काम खुद करना और उसका श्रेय भी लेना चाहता है तो बड़े परिवर्तन मुश्किल हो जाते हैं.

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