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छत्तीसगढ़ः रमन सिंह से नाराज जनता पर मोदी मैजिक भी रहा बेअसर

रमन सिंह से नाराज जनता पर मोदी मैजिक भी नहीं चला. जांग्ला में जाकर 'आयुष्मान' की घोषणा करना भी नहीं आया काम.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 11 December 2018
छत्तीसगढ़ः रमन सिंह से नाराज जनता पर मोदी मैजिक भी रहा बेअसर रमन सिंह

छत्तीसगढ़ में भाजपा की स्पष्ट हार और कांग्रेस को मिला जनाधार मुख्यमंत्री रमन सिंह से नाराज उनके कैबिनेट और प्रशासन की नाराजगी साफ कहता है. किसानों के गुस्से और बेलगाम नक्सलवाद ने इस गुस्से को भड़काने का काम किया. पीएम का घोर नक्सलवादी इलाके जांग्ला में जाकर आयुष्मान योजना की घोषणा करना भी इस गुस्से को ठंडा नहीं कर पाया. अर्बन नक्सल भी मुद्दा नहीं बन पाया तो  1500 करोड़ के 50 हजार स्मार्ट फोन बांटना भी कुछ काम नहीं आया.

ये तीन वजहों ने रमन सिंह को किया चारो खाने चित्तः

1-नेता प्रतिपक्ष त्रिभुवनेश्वर शरण सिंह देव जिन्हें जनता प्यार से टीएस बाबा भी बुलाती है. आदिवासी इलाके सरगुजा के राजशाही परिवार के वारिस टी.एस. बाबा की रणनीति ने इस बार भाजपा की हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जुन से टी.एस. सिंहदेव की टीम ने छत्तीसगढ़ में घर-घर जाकर चुनावी घोषणा पत्र तैयार किया. अगस्त में हुई उनसे बातचीत के दौरान भी उन्होंने खम्म ठोकते हुए कहा था, ‘‘कांग्रेस ताल ठोककर जीतेगी. घर-घर जाकर हम जनता से उनके मुद्दे पूछकर घोषणा पत्र में दर्ज कर रहे हैं.’’ 

2-किसानों का गुस्सा भी रमन सिंह को ले डूबा. चाउर वाले बाबा के नाम से मशहूर मुख्यमंत्री से किसान सबसे ज्यादा फसलों के दाम को लेकर गुस्सा थे. राज्य में कई बार प्रदर्शन भी हुए. कांग्रेस ने मौका देखकर चौका जड़ा और चुनाव जीतने पर कर्जमाफी का ऐलान कर दिया.

3-छत्तीसगढ़ में 90 में से 29 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. वोट प्रतिशत की बात करें तो करीब 32 फीसदी वोट आदिवासियों का है. सरगुजा और बस्तर में कुल मिलाकर 17 सीटें थीं. 2014 में पूरे देश से अलग यहां पर आदिवासी सीटों पर कांग्रेस का कब्जा रहा था. लेकिन इस बार भाजपा के खिलाफ आदिवासियों का गुस्सा और भी उबाल पर रहा. वजह इन्हें न वनोपज में समर्थन मूल्य में राहत मिली और न ही उन्हें अन्य योजनाओं का लाभ. बड़ी बात ये है कि इस बार आदिवासी समुदाय का वोट और भी ज्यादा बंटा. पहला सपा और गोंडवाना गोमंतक गणतंत्र पार्टी का गठबंधन. पिछली बार जीजीपी ने 1.59 फीसदी वोट अपने पाले में किया था. ये बात अलग है कोई सीट नहीं जीती थी. दूसरी तरफ अजीत जोगी भी खुद को आदिवासी कहकर वोट मांग रहे हैं..बसपा के साथ आने से उनका पलड़ा कुछ तो भारी हुआ है. दूसरी तरफ सर्वआदिवासी समाज भी सीटें भले न उड़ाए लेकिन वोटों का कुछेक प्रतिशत जरूर उनके पाले में जाएगा. जानकारों की मानें तो आम आदमी पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के लिए आदिवासी चेहरा घोषित कर आदिवासी कार्ड खेल दिया है. इस तरह चार दल तो सीधे-सीधे आदिवासी वोटों पर नजर गड़ाए दिख रहे हैं.

4-केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने नक्सल मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाने का जो प्रयास किया उसका बिल्कुल उलटा असर राज्य पर पड़ा. अर्बन नक्सल के मुद्दे ने नक्सल प्रभावित राज्य में नक्सलियों के गुस्से को भड़काने का काम किया. इसका असर यह हुआ की वहां पर नक्सल हमले ताबड़तोड़ बढ़ें. आलम यह है कि चुनावी नतीजे घोषित होते वक्त भी दोरनापाल में नक्सलियों ने आइडी ब्लास्ट किया. इसमें एक सीआरपीएफ का एक जवान बुरी तरह घायल हो गया.

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