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सैर-सपाटाः अद्भुत हैं मलेशिया के बाटू गुफा मंदिर

मलेशिया का बाटू गुफा मंमदिर बहुत मशहूर है. वहां पहुंचकर आपको लगेगा कि किसी दक्षिण भारतीय मंदिर में पहुंच गए हैं. मलेशिया में रहने वाले तमिलों के बीच बाटू मंदिर बहुत श्रद्धा का केंद्र है. बता रहे हैं ट्रैवल ब्लॉगर दीपांशु गोयल

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aajtak.in
दीपांशु गोयलकुआलालम्पुर, 17 January 2020
सैर-सपाटाः अद्भुत हैं मलेशिया के बाटू गुफा मंदिर सभी फोटोः दीपांशु गोयल

दीपांशु गोयल

अगर आप मलेशिया के बाटू गुफा मंदिर के बाहर खड़े हों तो आपको ऐसा लगेगा है जैसे तमिलनाडु के किसी मंदिर में खड़े हों. दक्षिण भारतीय शैली से सजे गोपुरम, भगवान मुरुगन की विशाल मूर्ति और पूजा की सामग्री बेचने वाली दुकानें. ऐसा माहौल जो भारत के किसी दक्षिण भारतीय मंदिर में दिखाई देता है. लेकिन यह जगह भारत से हजारों किलोमीटर दूर मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर के पास है.  

बाटू गुफा मलेशिया में रहने वाले लाखों तमिल हिन्दुओं के लिए सबसे पवित्र तीर्थ है. ये गुफा मलेशिया में पर्यटकों की पसंदीदा जगहों में से एक है. कुआलालम्पुर जाने वाले पर्यटक इस गुफा मंदिर को देखने ज़रूर जाते हैं. 

गुफा मंदिर तक पहुंचने के लिए 272 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. ऊपर पहुंचकर दिखाई देती है चूना पत्थर की बनी विशाल गुफा, जो करीब 100 मीटर ऊंची है. 

ईश्वर में आस्था न भी हो तो इस गुफा के भीतर जाने पर कुछ अलग अहसास ज़रूर होता है. ऐसा लगता है कि जैसे पहाड़ को काटकर बनाए किसी विशाल हॉल में आ गए हों.  

गुफा के अंदर भगवान मुरुगन का मंदिर बना है. मुरुगन भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र हैं. इसके अलावा भी गुफा में बहुत से हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां लगी हैं और कई छोटे मंदिर भी बने हैं.  

विशेषज्ञ बताते हैं कि चूना पत्थर की ये प्राकृतिक गुफा करीब 40 करोड़ साल पुरानी है. पानी के कारण लगातार होते कटाव से इस तरह की गुफाएं बनती हैं. इस गुफा को सबसे पहले साल 1878 में अमेरिकी प्रकृति विज्ञानी विलियम होर्नाडे ने खोजा था.  

बाटू गुफा कैसे बनी हिंदू मंदिर  

गुफा की खोज के कुछ वर्ष बाद तमिल व्यापारी के. थम्बूसामी पिल्लै यहां आए. उन्हें गुफा के मुख्य द्वार का आकार भगवान मुरुगन के भाले के ऊपरी सिरे जैसा लगा. यही देखकर उनके मन में यहां मंदिर बनाने का विचार आया. 1891 में उन्होंने यहां भगवान मुरुगन की मूर्ति की स्थापना की. 

धीरे-धीरे यह जगह मलेशिया में रहने वाले तमिल हिन्दुओं के बीच तीर्थ की तरह प्रसिद्ध हो गई. 

1892 से यहां तमिल हिन्दूओं का त्योहार थाईपुसम मनाया जाने लगा. इसे जनवरी के आखिर या फरवरी के महीने की शुरुआत में मनाया जाता है. 

थाईपुसम त्योहार के समय इस मंदिर में भव्य कार्यक्रम होता है. भक्त कुआला लम्पुर के चाइनाटाउन में स्थित श्री महामरिअम्मन मंदिर से पैदल चलकर 13 किलोमीटर दूर बाटू मंदिर तक आते हैं. एक शोभायात्रा के रूप में नाचते-गाते लोग हुए बाटू मंदिर पहुंचते हैं. 

थाईपुसम के समय यहां लाखों लोग जमा होते हैं. यहां का थाईपुसम भारत के बाहर मनाए जाने वाले सबसे बड़े और लोकप्रिय हिन्दू त्योहारों में से एक बन गया है. 

अब तो यहां मनाए जाने वाले थाईपुसम की लोकप्रियता पूरी दुनिया भर फैल चुकी है. दुनिया भर से लोग इस त्योहार को करीब से महसूस करने के लिए कुआला लम्पुर आते हैं.

कैसे पहुंचें बाटू गुफा मंदिर तक 

बाटू गुफा कुआला लम्पुर से करीब 13 किलोमीटर दूर है. कुआला लम्पुर से यहां आने लिए टैक्सीबस या ट्रेन ली जा सकती है. 

(दीपांशु गोयल एक ट्रैवल ब्लॉगर हैं. उनका ट्रैवल ब्लॉग दुनिया देखो काफी पढ़ा जाता है. घुमक्कड़ प्रकृति के गोयल हमारे लिए यह सीरीज लिख रहे हैं. यहां व्यक्त राय उनकी निजी है और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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