एडवांस्ड सर्च

भोपाल में अतिरिक्त

भोपाल में हाल ही संपन्न हफ्ते भर के साहित्य और कला के आयोजन विश्व रंग ने सुर्खियां खूब बटोरीं. पर इसके आयोजन पर विवाद भी हुए 

Advertisement
aajtak.in
शिवकेश मिश्र भोपाल, 15 November 2019
भोपाल में अतिरिक्त विश्वरंग समारोह में अभिनेता रजत कपूर

भोपाल में हाल ही संपन्न हफ्ते भर के साहित्य और कला के आयोजन विश्व रंग ने सुर्खियां खूब बटोरीं. उद्घाटन का दीया जलने से पहले ही सोशल मीडिया पर प्रगतिशील कवियों-लेखकों का एक धड़ा यह कहते हुए टूट पड़ा कि इसमें कॉर्पोरेट का करोड़ों रुपया लगा है; लिटफेस्ट अब धंधा बन चुके हैं; इस उत्सव के कोई विचार नहीं; मकसद साहित्येतर है, इसमें दक्षिणपंथियों को ज्यादा तवज्जो दी गई है, आदि-आदि. 

यहां तक कि एक-दूसरे के खिलाफ पशु प्रतीक भी काम में लिए गए. इसकी योजना बनाने में शामिल रहे कुछ अहम नामों ने भी ऐन मौके पर अपने को किनारे कर लिया. विरोध में उठे इस तरह के तेवरों ने टैगोर अंतरराष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव शीर्षक वाले इस जलसे के केंद्रीय आयोजक संतोष चौबे को सकते में ला दिया. चौबे साहित्य, संस्कृति और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मध्य प्रदेश के एक प्रमुख नाम हैं. वे उच्च शिक्षा से संबद्ध एआइएसईसीटी ग्रुप ऑफ युनिवर्सिटीज के कुलाधिपति हैं. इसी ग्रुप के भोपाल स्थित रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने यह आयोजन किया था. वे दर्जन भर साहित्यिक-सांस्कृतिक इकाइयों के अध्यक्ष, संयोजक या संरक्षक हैं. 

साल में कविता पाठ, लोकार्पण, पुस्तक चर्चा और ऐसे बीसियों आयोजन वे भोपाल और अन्यत्र भी करते रहते हैं और खुद के केंद्र में होने को ‘एंज्वॉय’ करते हैं. साहित्यिक हलकों के कुछ लोग उन्हें ‘नितांत आत्ममुग्ध व्यक्ति’ भी कहते हैं. वे बोलते भी खूब हैं. लेकिन इस मौके पर फेसबुक पर एकाध जगह अपना पक्ष रखने के अलावा उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा. बाद में उन्होंने भी अपना पक्ष रखा (जो रिपोर्ट के आखिर में है).

खैर, 3-4 दिन चले इतर आयोजनों के बाद आठ नवंबर को प्रदेश के पुराने विधानसभा भवन मिंटो हॉल में मुख्य जमावड़ा शुरू होते ही आयोजन ने माहौल बना लिया. तीन दिन में हिंदी केंद्रित साठ सत्र. दर्जन भर से ज्यादा विदेश के हिंदी शिक्षक और उतने ही प्रवासी भारतीय लेखक. (दावा तो वैसे भारत सहित ‘तीस देशों के 500 से अधिक प्रतिनिधि हस्ताक्षरों’ के आने का था). 

चूंकि आयोजन का एक तार टैगोर से भी जुड़ा था, सो दो दिन के बड़े व्याख्यान सत्र टैगोर के साथ गांधी, इकबाल और फैज को जोडक़र रखे गए थे. लेकिन चर्चाओं और रचना पाठ के सत्रों में जो बात ठीक से रेखांकित हो सकी, वह थी हाशिए के लोगों की आवाज. इनमें दलित साहित्य, कश्मीर, प्रवासी लेखन और थर्ड जेंडर की आवाजों ने कहीं ज्यादा शिद्दत से अपनी बात रखी.

 

थर्ड जेंडर साहित्य उत्सवों में एक ताजा प्रविष्टि है. और इसमें भी मुखर स्वर बंगाल का है, जिसकी अगुआई एक कॉलेज की प्रिंसिपल मानोबी बंधोपाध्याय कर रही हैं. मुख्य हॉल में 500 से ज्यादा श्रोता थर्ड जेंडर के आधा दर्जन कवियों-वक्ताओं की संवेदनाएं साझा करने को मौजूद थे. खासकर पंजाब की उच्च शिक्षित, रूसी शिक्षा प्राप्त और शास्त्रीय गायक धनंजय चौहान ने गर्म चिमटे से जलाए जाने, एक रात में बीस लोगों के रेप करने, पंजाब विवि से निकाले जाने और फिर उसी विश्वविद्यालय में पहले ट्रांसजेंडर के रूप में ससम्मान प्रवेश पाने की कथा सुनाई तो हॉल देर तक तालियों से गूंजता रहा.

प्रवासी भारतीय लेखकों के सत्र में रोना ही इस बात का था कि ‘बताइए, प्रवासी लेखकों को एक कोटे में यानी आरक्षित श्रेणी में रखकर दोयम दर्जे का बता दिया जाता है. साहित्य को तो संपूर्णता में रखकर देखा जाना चाहिए. हम तो भारतीय धरोहर को सीने से लगाए घूमते हैं. और यहां के साहित्यकार हमारे साथ ऐसा बर्ताव करते हैं.’ ब्रिटेन की उषाराजे सक्सेना और जय वर्मा के बाद हालांकि दिव्या माथुर ने स्पष्ट किया कि प्रवासी लेखक रहता है विदेश में और सोचता है भारत की; और यह कि विदेश में रोप दिए जाने से पौधा विदेशी नहीं हो जाता. 

प्रवासी लेखकों की प्रमुख आवाज तेजेंद्र शर्मा ने थोड़ा इतर विचारधारा के पहलू को छुआ: ‘‘प्रवासियों की कहानियां स्वनामधन्य आलोचकों को खुश करने के लिए विचारधारा के दबाव में नहीं लिखी जातीं. यहां दाएं और बाएं हाथ का कोई चक्कर नहीं.’’

बतौर मेजबान, थोड़ी देर के लिए ही सही, प्राय: हर सत्र में पहुंचने की ललक रखने वाले चौबे इसमें भी पहुंचे, प्रवासी लेखकों को एक स्पष्ट संदेश के साथ: ‘‘मैं चाहता हूं आप लोग कथादेश की प्रतियां अपने-अपने देश में ले जाएं. इस आग्रह को आप मेरी मार्केटिंग टेक्नीक भी कह सकते हैं.’’ 

दरअसल, विश्व रंग के मौके पर रिलीज होने वाले तमाम साहित्य में यही सबसे महत्व का काम है. इसमें करीब 200 साल की प्रवासियों को रेखांकित करती कहानियां और 70 आलोचकों की टिप्पणियां हैं. इसमें समकालीन आलोचक डॉ. धनंजय वर्मा ने कहानी के रूप और कथ्य पर बात की है. 

चौबे इस बात से थोड़ा दुखी थे कि कथादेश पर जिस तरह से चर्चा होनी चाहिए थी, वैसी नहीं हुई. पर प्रवासी लेखकों के मंच पर ही उन्होंने एक और महत्वाकांक्षी योजना स्पष्ट कर दी: ‘‘विश्व रंग के बाद अब हम कथा विश्व के आयोजन के बारे में सोच रहे हैं. उसे भी करेंगे.’’

नागरिकता और विस्थापन पर कविता वाले सत्र में पाठ तो हुए ही, पर एक साथ अगल-बगल बैठे तीन चेहरों पर कुछ अलग-अलग भी साफ पढऩे में आ रहा था: कश्मीरी पंडित महाराज कृष्ण संतोषी, घाटी के निदा नवाज और बीच में बैठे मनोहर बाथम, जो कि कश्मीर में सीमा सुरक्षा बल के अफसर के रूप में रहे हैं. तीन चेहरे तीन प्वाइंट ऑफ व्यू की तरह थे.

इसी सिलसिले में जब ‘केंद्रीय परिदृश्य में हाशिए के स्वर’ की बात आई तो राजस्थान के जयप्रकाश कर्दम ने सीधे-साफ शब्दों में जो कहा, उसे सिर्फ सुना ही जा सकता था, किसी के पास उसका कोई जवाब न था. ‘‘वसुधैव को कुटुंब बताने वाले जाति और फिरकों में बंटे फिरते हैं...किसी दलित को पान चबाने पर तो किसी को मूंछ रख लेने पर ही पीट दिया जाता है. मुझे भी स्कूल में कुछ टीचर और छात्र ‘ओए चमट्टे’ कहकर बुलाते थे. वे शब्द आज भी कानों में चुभते हैं....साहित्य का मूल्य है मानवीयता का निर्माण करना, पर शोषण की मानसिकता को कैसे बदला जाए? कहा जाता है कि दलित साहित्य में आक्रोश का स्वर होता है. सवाल है, मुझे आप गाली देंगे तो मैं क्या करूंगा? जो सहा सो कहा. ऐसा नहीं कि उनमें कड़वाहट ही है पर यह कड़वाहट प्रेम की अनुभूतियों को उभरने नहीं देती. ईश्वर, प्रकृति और प्रेम पर केंद्रित मुख्य धारा के साहित्य में दलित साहित्य दरकिनार है...हम किसी ईश्वर पर विश्वास नहीं करते कि कोई हमारे जीवन को बदल देगा. हम तमसो मा ज्योतिर्गमय में नहीं अप्प दीपो भव में विश्वास करते हैं.’’

विश्व रंग के ऐसे ही सत्रों ने कुछ मायनों में इसे सार्थकता दी. हां, एक पहलू श्रोताओं का भी था. मुख्य हॉल में तो उनकी संख्या पर्याप्त होती थी पर चार छोटे सभागारों में चलने वाले सत्रों में वक्ता और उनके कुछेक परिचित ही होते थे. वैसे, इंतजाम में लगे विश्वविद्यालय के लोग इस पर नजर रखते थे और श्रोता कम होने पर कुछ छात्रों को बुला लिया जाता था. चौबे श्रोताओं की कमी की बात तो नहीं मानते पर इतना जरूर कहते हैं कि ‘‘हां, विषय से जुड़े श्रोताओं का थोड़ा अभाव रहा होगा.’’

पर कजाखस्तान से आईं कवयित्री दरीगा कोकोएवा तो मुशायरे में हजारों श्रोताओं की एक साथ ‘वाह-वाह’ की उत्तेजक प्रतिक्रिया से हतप्रभ थीं. एक खास लहजे वाली हिंदी में वे कहती हैं, ‘‘मैं मशहूर कवि तो नहीं हूं मगर मेरा मन चाहता है कि हमारे देश में भी ऐसा ही कुछ हो. कजाखस्तान लौटकर हिंदी विभाग के छात्रों के साथ इस तरह का एक कार्यक्रम बनाना चाहती हूं.’’

भोपाल तो सांस्कृतिक नगर है पर विश्व रंग ने यहां साहित्यिक आयोजनों के मायने में एक बड़ी लकीर खींच दी है. खर्च भी खासा हुआ होगा. एक करोड़ रु.? चौबे स्पष्ट करते हैं, ‘‘हिसाब अभी लगाना है, पर हां, इतना तो हुआ ही होगा.’’ उनकी माने तो इस आयोजन से हिंदी भाषा का डोमेन बढ़ा है और अनुवाद तथा टेक्नॉलजी के जरिए इसका दायरा और बढ़ाया जाना चाहिए. 

अब वे स्पष्ट करते हैं कि विरोध जिन्होंने भी किया हो, पर वे किसी को विरोधी नहीं मानते. ‘‘वे सभी मित्र ही हैं. उनकी दिक्कत  यह थी कि वे प्रोग्राम के डिजाइन को ठीक से समझ नहीं पाए क्योंकि उन्हें टेक्नॉलजी ठीक से नहीं आती. तीन दिन के कार्यक्रम में आपका नाम नहीं तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरे आयोजन में ही आपका नाम नहीं है. और यह किसी जन संगठन का नहीं एक शिक्षण संस्थान का आयोजन था. इसमें कांग्रेस सरकार के कई मंत्री भी आए और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी. यह संसदीय लोकतंत्र है. और आप भी अगर संवाद करने निकले हैं तो दूसरों को अछूत मानेंगे तो कैसे संवाद करेंगे?’’

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay