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शहरनामाः धान, जापान और पूर्णिया

बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अन्नों की संकर नस्लों ने हमारे पर्यावरण के साथ क्या खिलवाड़ किया है, वह एक अलग विमर्श है. पर पूर्णिया जिले के गठन के ढाई सौ साल पूरे होने के मौके पर गिरीन्द्रनाथ झा याद कर रहे हैं धान की देशी नस्लों को. उनकी खुशबू और उनके साथ जुड़ी यादों को. साथ ही जिक्र आता है जापान का भी. पढ़िए खास सीरीज का यह खास लेख

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aajtak.in
गिरीन्द्रनाथ झापूर्णिया, 05 February 2020
शहरनामाः धान, जापान और पूर्णिया फोटोः गिरीन्द्रनाथ झा

शहरनामा/ गिरीन्द्रनाथ झा

(पूर्णिया जिले के 250 साल पूरे होने पर सीरीज का छठा हिस्सा )

देश के अलग-अलग हिस्सों की अपनी अलग-अलग कहानी होती है. हर कहानी का अपना नायक होता है, अपनी नायिका होती है. लेकिन इन सबके बीच जो चीज साझा है, वह है माटी और फसल. हर इलाके की माटी अपने क्षेत्र के लोगों को अन्न देती है. आज जब हम विकास की दौड़ में खेतिहर जमीन को रिहायशी इलाके में तब्दील करते जा रहे हैं, ऐसे में देश का एक सीमांत जिला जो अपनी स्थापना के 250 साल पूरे करने जा रहा है, वहां की माटी की कहानी और उस माटी से निकलने वाली अन्न की बात हम सुनाने की कोशिश करेंगे. 

1770 में पूर्णिया जिला की स्थापना होती है, तारीख थी 14 फरवरी. जश्न में डूबे इस शहर ने खेतिहर जमीन को बचाने की हर संभव कोशिश की है. 

यह इलाका धान के लिए मशहूर है, हालांकि धान के पुराने नस्ल अब गायब हैं और उसकी जगह पर हाइब्रिड नस्ल ने जगह बना ली है. ऐसे में शहरनामा में पूर्णिया के उन धान प्रजातियों के नाम पर थोड़ी बातचीत, जिसके उच्चारण में ही खुशबू है. 

दरअसल, हम जब किसी शहर या गांव को याद करते हैं तो स्थान, भवन, नदी या शख्सियतों की ही बात करते हैं लेकिन हम फसलों की बात उस अंदाज में नहीं करते हैं, जिस अंदाज में हम लोगबाग की करते हैं. 

बाबूजी की पुरानी डायरी पलटते वक़्त पता चलता है कि पूर्णिया जिला में पहले धान का नाम बहुत ही प्यारा हुआ करता था, मसलन 'पंकज' 'मनसुरी', 'जया', 'चंदन', 'नाज़िर', 'पंझारी', 'बल्लम', 'रामदुलारी', 'पाखर', 'बिरनफूल' , 'सुज़ाता', 'कनकजीर' , 'कलमदान' , 'श्याम-जीर', 'विष्णुभोग' आदि. 

धान के रंग के आधार बहुत ही प्यारे प्यारे नाम रखे जाते थे. 

यहां किसानों के दुआर पर धान रखने के लिए बखारी हुआ करता था. मुझे याद है जब बचपन में धान की तैयारी होती थी तो घर के सामने महिलाएं एक गीत गाती थीं. 

‘सब दुख आब भागत, कटि गेल धान हो बाबा, 

आब भरबे बख़ारी में धान हो, 

छूटी जेते बंधक में राखल गहना हो रामा..." 

पूर्णिया जिला के किसानों  की जिन्दगी को जब आप नजदीक से देखेंगे तो पाएंगे कि वे गांव घर में ही दुनिया की सारी खूबियों को समाकर रखते आए हैं. पहले उनका अपना एक अन्न बैंक होता था. गोदाम संस्कृति तो अब आई है लेकिन अन्न रखने की उनकी अपनी शैली है, जिसे बखारी कहते हैं. 

किसानी कर रहे लोग सालभर के लिए अन्न जमाकर रखते हैं. इस बखारी में धान की अलग अलग प्रजातियों को रखा जाता था. जब गोदाम संस्कृति का आगमन गांव में नहीं हुआ था तब बड़े-बड़े किसान तो अपने घरों के सामने कई बखारी बनाकर रखते थे, जहां गांव के छोटे और सीमांत किसान अपना अन्न रखते थे. गांव के आपसी समन्वय को इस छोटी-सी बात से आप समझ सकते हैं. 

इन्हीं बखारी में कभी पूर्णिया जिले में धान के किस्म-किस्म के नस्ल रखे जाते थे. लेकिन नब्बे के दशक से अचानक ये नाम गुम हो गए और इनकी जगह बना हाइब्रिड नस्ल के धान के बीज का बाज़ार जिसे अंकों में पहचाना जाने लगा, जैसे 1121 बासमती, 729, 1010 आदि. 

धान की बात करते हुए जापान को भी याद किया जाना चाहिए. 

धान को लेकर जानकारी इकट्ठा करने लगा तो पता चला कि जापान की दो प्रमुख कम्पनियां होंडा और टोयोटा का अर्थ धान होता है. होंडा का मतलब मुख्य धान खेत और टोयोटा का मतलब बम्पर फसल वाले धान के खेत. जापान में एक हवाई अड्डा है- नरीटा, इसका अर्थ है लहलहाता धान खेत. गूगल करिएगा तो पता चलेगा कि दुनिया का 90 प्रतिशत धान एशिया में ही उगाया और खाया जाता है. 

धान के पौधे को हर तरह की जलवायु पसंद है. नेपाल और भूटान में 10 हजार फुट से ऊंचे पहाड़ हों या केरल में समुद्रतल से भी 10 फुट नीचे पाताल-धान दोनों जगह लहराते हैं. ऐसे में जापान ने धान और धान के खेतों की जो ब्रांडिंग की है इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

धान को लेकर पूर्णिया की बात करते हुए जापान का जिक्र इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि धान को पूर्णिया अंचल में भी पूजा जाता है, नवान्न करते हुए और धनरोपनी करते हुए हम धान की आराधना करते हैं. ठीक उसी तरह जापान के ग्रामीण इलाक़ों में धान-देवता इनारी का मंदिर होता ही है. जापान में एक और देवता हैं, जिनका नाम है- जीजो. जीजो के पांव हमेशा कीचड़ में सने रहते हैं. कहते हैं कि एक बार जीजो का एक भक्त बीमार पड़ गया, भगवान अपने भक्तों का खूब ध्यान रखते थे. उसके खेत में जीजो देवता रात भर काम करते रहे तभी से उनके पांव कीचड़ में सने रहने लगे. 

पूर्णिया जिला में भी धान को खूब स्नेह दिया जाता रहा है. 

हमारे यहां तो धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है. धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है. बौद्ध  साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध के पिता का नाम था- शुद्धोदन यानी शुद्ध चावल. 

वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. इस कहानी को पढ़कर लगता है शायद इसी वजह से 70 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के पूर्णिया अंचल में एक पुरानी नस्ल की धान का नाम 'सुज़ाता' रखा गया होगा. इस धान का चावल बहुत ही सुगन्धित हुआ करता था.

यह सब गूगल और गाम के लोगों के बातचीत के आधार पर लिख रहा हूं.  हमारे गांव के भोला ऋषि बताते हैं कि पहले हर कोई गांव में धान को लेकर गर्व करता था. हमारे यहां इस तरह का धान होता है तो हमारे यहां इतना सुंदर...तब लोग एक-दूसरे को खेत और अनाज के ज़रिये भी जाना करते थे. 

भोला ने बातचीत में धीमे से बताया- हम सब वैसे रोज ही मोटा चावल खाते हैं लेकिन मेहमान को महीन चावल खिलाते हैं, एकदम कनकजीर! "

यह सब पूर्णिया जिला के 250 साल पूरे होने पर इसलिए भी याद किया जा रहा है क्योंकि इसी बहाने हम माटी से इश्क करें, एकदम कनकजीर और चंदनचूर धान की तरह.

(पेशे से किसान और लेखक गिरीन्द्रनाथ झा पूर्णिया के नजदीक चनका नाम के गांव में रहते हैं और ग्राम-सुधार की दिशा में काम कर रहे हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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