एडवांस्ड सर्च

प्रेमचंद की परंपरा के महत्वपूर्ण रचनाकार थे स्वयंप्रकाश

सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार स्वयंप्रकाश का निधन हो गया है. उन्हें मुख्य रूप से कहानीकार के तौर पर जाना जाता है. स्वयंप्रकाश 5 उपन्यास लिख चुके हैं और उनके 9 कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. स्वयंप्रकाश को प्रेमचंद की परंपरा का महत्वपूर्ण कथाकार माना जाता है. पढ़िए, राजपाल ऐंड संस से प्रकाशित लेखक स्वयंप्रकाश की किताब "धूप में नंगे पांव" का अंशः

Advertisement
aajtak.in
मोहम्मद वक़ास नई दिल्ली, 10 December 2019
प्रेमचंद की परंपरा के महत्वपूर्ण रचनाकार थे स्वयंप्रकाश फोटो सौजन्यः सोशल मीडिया

जिस दिन एम.ए. का अंतिम पेपर था, राजस्थान रोडवेज में अचानक किसी बात पर हड़ताल हो गई और इस बात से बेखबर मैं सुमेरपुर बस स्टैंड पर बैठा सिरोही जाने वाली बस का इंतजार करता रहा. पेपर दस बजे से था और सुमेरपुर से बस से सिरोही पहुंचने में कम से कम एक घंटा लगता था. 

जब सवा नौ बज गए और कोई बस नहीं आई तो मैंने पूछताछ की. हड़ताल का पता चला तो मैं थोड़ा घबराया लेकिन अभी ट्रकों की उम्मीद बाकी थी. मैं बस स्टैंड से चलकर चुंगी नाके चला गया क्योंकि वहां से ट्रक मिलने  की संभावना ज्यादा थी. जब पौने दस बजे तक कोई ट्रक नहीं दिखाई दिया तो मैंने सोचा कि उगमराज या डॉक्टर पुरोहित को फोन करके अनुरोध किया जाए कि वह अपनी मोटरसाइकिल पर मुझे सिरोही छोड़ दें. 

उधर सिरोही में भार्गव साहब, दुर्गा प्रसाद जी और मेरे अन्य मित्र परेशान हो रहे थे कि पेपर शुरू हुए इतनी देर हो गई और स्वयं प्रकाश का कोई पता नहीं है. इसी समय एक जर्जर ट्रक धीमी गति से आता दिखाई दिया. मेरे हाथ देने से ट्रक रुक भी गया, वह जा भी सिरोही रहा था, उसने मुझे बैठा लिया लेकिन रास्ते में पालड़ी गांव में एक ढाबे के सामने खड़ा हो गया. 

ड्राइवर -खलासी ने बताया कि वह खाना खाएंगे. मैंने हाथ जोड़कर उन्हें समझाया कि मेरी परीक्षा है, समय पर नहीं पहुंच पाया तो मेरा पूरा साल खराब हो जाएगा, इससे तो आज अगर वे पालड़ी की बजाय सिरोही में खाना खा लें, मेरी तरफ से, तो बड़ी मेहरबानी होगी. 

उन्होंने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुझे वहीं छोड़ ढाबे में घुस गए. मैं मायूस होकर हाईवे पर आ गया और आते-जाते वाहनों को हाथ देने लगा. कुछ देर बाद वही जर्जर ट्रक आया और खलासी ने आवाज लगाई, "चलिए".  मैं कुछ समझ नहीं पाया कि हुआ क्या है और समझने का समय कहां था? 

मैं फुर्ती से ट्रक में चढ़ गया. ड्राइवर ने ट्रक ऐसे भगाया कि मैं बार-बार दाहिने -बायेंं गिरने लगा लेकिन साढ़े ग्यारह बजे उसने मुझे सिरोही के तीन बत्ती चौराहे पर उतार दिया. यहां से कॉलेज का पंद्रह मिनट का रास्ता था. आमतौर पर चार-पांच ऑटो इस चौराहे पर हमेशा खड़े मिलते हैं लेकिन उस दिन एक भी नहीं था. मैं तेज-तेेेज चलते और बीच-बीच में दौड़ लगाते हांफता -कांपता पौने बारह बजे कॉलेज पहुंचा. 

दुर्गा प्रसाद जी अपनी इन्वीजिलेशन ड्यूटी छोड़कर मेन गेट पर खड़े मेरा रास्ता देख रहे थे. मुझे देखते ही उन्होंने अपने नीले विजय सुपर स्कूटर में किक मारी और मुझे बगैर एक भी शब्द पूछे, बोले परीक्षा हॉल तक ले गये. वहां फौरन मुझे कॉपी-पेपर पकड़ाया गया और आंखों के सामने पहले प्रश्न के कुछ शब्द आते ही मैं उसका उत्तर लिखने लगा. 

कुुुछ समय बाद भार्गव साहब आये और हस्बमालूम सभी परीक्षार्थियों के बीच टहलते हुए मेरे पास आकर एक मिनट रुके, धीरे से मेरी पीठ पर हाथ रख कर चले गए. एक आदमी को बनाने में किस-किस व्यक्ति का कैसा-कैसा योगदान रहता है.  

दस बजे की परीक्षा में किसी परीक्षार्थी को बारह बजे प्रवेश की अनुमति देना भार्गव साहब के लिए भी सरल नहीं रहा होगा. और उन ड्राइवर या खलासी का आभार कैसे व्यक्त किया जाए जिन्होंने मेरी खातिर अपना खाना छोड़ दिया. क्या मैं इनलोगों की  मानवीयता और कृपा को कभी भूल सकता हूं?

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay