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शहरनामा: नदियों वाला शहर 'पूरैनिया'

ऐसे वक्त में जब कोई जिला अपनी स्थापना के 250 साल पूरे करने जा रहा है, वह भी एक ऐसा जिला जिसकी पहचान ही वृक्ष और नदियों से है, तो ऐसे अवसर पर उस जिला को अपनी नदियों की कथा तो बांचनी ही होगी. हमें ‘पूरैनिया से पूर्णिया’ तक के सफर में उन नदियों की भी कहानी सुनानी होगी, जिसने इस अंचल को कभी ‘पूर्ण-अरण्य’ बनाया था

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aajtak.in
गिरीन्द्रनाथ झापूर्णिया, 24 January 2020
शहरनामा: नदियों वाला शहर 'पूरैनिया' फोटोः गिरीन्द्रनाथ झा

शहरनामा/ गिरीन्द्रनाथ झा

(पूर्णिया जिले के 250 साल पूरे होने पर सीरीज का चौथा हिस्सा )

कहते हैं कि नदियां जिधर चल पड़ती है, रास्ता उधर ही बन जाता है. लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हम नदियों के रास्तों पर कंक्रीट के जंगल खड़े करने में जुट गए हैं. ऐसे वक्त में जब कोई जिला अपनी स्थापना के 250 साल पूरे करने जा रहा है, वह भी एक ऐसा जिला जिसकी पहचान ही वृक्ष और नदियों से है, तो ऐसे अवसर पर उस जिले को अपनी नदियों की कथा तो बांचनी ही होगी. अब जब पूर्णिया जिला अपनी स्थापना के 250 साल पूरे करने जा रहा है, उस वक्त हमें ‘पूरैनिया से पूर्णिया’ तक के सफर में उन नदियों की भी कहानी सुनानी होगी, जिसने इस अंचल को कभी ‘पूर्ण-अरण्य’ बनाया था.

दरसअल पुराने पूर्णिया जिला को नदियों के सहारे  समझने –बुझने की जरूरत है और इस जानकारी को हर व्यक्ति तक पहुंचाने की आवश्यकता है. ताकि जब भी कोई व्यक्ति किसी खाली पड़ी जमीन पर घर बनाने की सोचे तो एक बार यह जरूर पता कर ले कि 100-150 साल पहले यहां से कौन सी नदी बहती थी क्योंकि एक दिन जब उसी रास्ते नदी फिर से बहना आरम्भ कर देगी तो उस वक़्त क्या होगा? 

1911 में आइसीएस ऑफिसर ओ मैली ने पूर्णिया जिला का पहला गजेटियर प्रकाशित किया था तब पूर्णिया जिला की सीमा विशाल थी, दूर-दूर तक. 

हमने इस किताब के आधार पर पुराने पूर्णिया जिला की नदी-धार को समझने की कोशिश की है.

दरअसल, पुराने पूर्णिया जिला के विभिन्न नदियों की कहानी बड़ी रोचक है. पहले हमें इन नदियों की कहानियां सुनाई जाती थी लेकिन विगत दो-तीन दशकों में कोई किसी को नदी की कहानी नहीं सुना रहा है. ऐसे में हम नदी को पहचाना भूल गए. जब भी कोई नदी की कहानी सुनाने की बात करता है तो उस वक्त नेहरु जी का एक भाषण याद आता है जो उन्होंने 17 नवंबर, 1952 को सेंट्रल बोर्ड ऑफ इरिगेशन एंड पॉवर के रजत जयंती समारोह में दिया था. 

पंडित नेहरू ने कहा था,  “काश ! कोई ऐसा बुद्धिमान और ज्ञानी पुरुष होता जो हमारी नदियों की कहानी लिखता. यह कहानी कितनी रोचक होगी. अगर कायदे से लिखी जाए तो यह कहानी बड़ी शानदार होगी..."

नेहरू जी का यह भाषण पढ़ने के बाद जिस व्यक्ति की तस्वीर सामने आती है उनका नाम दिनेश मिश्र है. 

आज पूर्णिया की नदियों के बारे में लिखते हुए, दिनेश मिश्र का काम हमें सबसे अधिक मदद कर रहा है, जो आज भी नदियों पर लगातार काम कर रहे हैं.

एक अंग्रेज विद्वान फ्रांसिस बुकानन हुए. उन्होंने 1810 के आसपास पूर्णिया का व्यापक अध्ययन किया. हालांकि वे पेशे से चिकित्सक थे लेकिन वे प्रसिद्ध हुए सर्वेक्षक के तौर पर. उन्होंने पूर्णिया का विस्तृत और व्यापक सर्वेक्षण किया था. 

उनकी रिपोर्ट पढ़ते हुए एक नदी के बारे में पता चलता है- देवनी. यह महानंदा-कनकई नदी की एक उपधारा है. एक जमाने में यह ताकतवर नदी हुआ करती थी. फ्रांसिस बुकानन ने लिखा है कि इस नदी का स्रोत नेपाल में था जो अररिया होते हुए पूर्णिया की सीमा में दाखिल होती है और फिर किशनगंज की तरफ मुड़ते हुए महानंदा और कनकई में मिलती है. 

आज जब पूर्णिया के डगरुआ इलाके को आप देखेंगे तो लगेगा कि हमने किस तरह देवनी नदी को नजरंदाज कर दिया. यही नदी 2017 में रुठकर हमें बाढ़ के जरिए रुलाने लगी थी. 

ऐसी ही एक नदी थी- इच्छामति. कसबा के पूरब होते हुए पूर्णिया सिटी से दक्षिण तरफ यह बहती थी.

पूर्णिया ने जिस नदी को समझने में सबसे अधिक भूल की, वह है सौरा. बुकानन ने सौरा नदी को समीरा लिखा है. सौरा का उद्गम फणीश्वर नाथ रेणु के गांव औराही हिंगना से पूरब है. यहां अहमदपुर चौर है, जिसका क्षेत्रफल करीब 1500 एकड़ है. यहीं से सौरा का जन्म होता है. आगे निकलते ही बूढ़ी कोसी, कारी कोसी, दुलारदेई, पेमा, सीतावगजान, सरसुनी, कजला, कमला, कमताहा जैसी धाराएं सौरा की सहायक बन जाती है.

अहमदपुर चौर से निकलने के बाद सौरा अररिया-रानीगंज स्टेट हाइवे पर रजखोर से पश्चिम सड़क को पार करती है. इसी के समानांतर गीतवास के गांव के पास दुलारदेई नामक नदी है. सौरा और दुलारदेई के बीच तकरीबन एक दर्जन पुरानी धाराएं हैं. इन्हीं धाराओं से होकर ही कभी कोसी की प्रमुख धारा प्रवाहित होती थी, जिसका नाम कजरा है. 

एक समय में सौरा बारहमासा नदी थी लेकिन हम उस वक्त चौंक जाते हैं जब 1962 में पी सी राय चौधरी द्वारा संपादित पूर्णिया गजेटियर में पढते हैं 'it is now merely a dried up river.' यह पढ़ते हुए हम निराश होते हैं कि 60 के दशक में ही यह नदी पूर्णिया से रूठ गई लेकिन ठीक उसी वक्त हमें जब यह पता चलता है कि पूर्णिया जिला प्रशासन ने सौरा नदी को फिर से बारहमासा बनाने के लिए एक सुंदर योजना बनाई है तो लगता है कि पूर्णिया के बीच से फिर एक बार सौरा इठलाएगी. 

इंडिया टुडे के विशेष संवादाता मंजीत ठाकुर ने भी नदीसूत्र सीरीज में सौरा नदी के बारे में विस्तार से लिखा था. 

सौरा के पुराने रूप का जब भी कहीं वर्णन पढता हूं तो एक अंग्रेज किसान जॉय विक्टर की लिखी बात याद आती है. विक्टर ने अपना घर सौरा नदी के पूर्वी तट पर बनाया था, यानी आज के पूर्णिया का रामबाग इलाका. 

विक्टर अपनी एक डायरी में लिखते हैं कि "पूर्णिया के आसपास नदियों का जो नेटवर्क है, उसी के अनुसार इलाके में बसावट और खेती होती रहनी चाहिए. सौरा जबतक बहेगी पूर्णिया सुंदर दिखता रहेगा. "

पूर्णिया गजेटियर में ओ मैली कहते हैं कि चांप-चौर का इलाका (जहां पानी जमा रहता है) होने की वजह से जुलाई से सितंबर तक इस इलाके में वन्य जीवों और पक्षियों को अड्डा होता था. ठंड के मौसम में साइबेरियन पक्षी यहां आते थे. पूर्णिया के बसावट को नदी के अनुसार हमें समझना होगा.

बुकानन ने एक और नदी का विस्तार से जिक्र किया है जिसे आज हम परमान नदी के नाम से जानते हैं. बुकानन ने इस नदी को पंगरोयान कहा है. कहीं-कहीं इस नदी को बालकुंवर भी कहा जाता है. परमान की कहानी नेपाल से शुरु होती है. हिमालय से निकलकर यह बूढ़ी नाम की नदी के रुप में भारत – नेपाल सीमा पर स्थित जोगबनी से पश्चिम मीरगंज गांव में प्रवेश करती है. जैसे ही यह नदी मीरगंज में प्रवेश करती है, इसे परमान नाम से पुकारा जाने लगता है. 

परमान यही से ढेर सारी धार-और सहायक नदियों को अपने में समेटना आरंभ करती है. रजई-सोता जैसी सहायक नदियां इसके संग हो जाती है. 

12 अगस्त 2017 की रात जब पूर्णिया-किशनगंज सीमा को बाढ़ ने अपनी चपेट में लिया था उस वक़्त भी हम अपनी पुरानी नदी-धार  से अनजान थे और आज भी अनजान ही बने हैं. महानंदा बेसिन की नदियों के नाम भी हमें याद रखना चाहिए. 

हम केवल परमान की बात करते हैं जबकि उसके संग कनकई, बलासन, डोंग, बकरा, नागर, रतवा, नूना, रीगा, लोहंदरा, मलुआ, दास और सुघानों भी महानंदा की सहायक नदियाँ हैं. इन सभी नदियों की प्रकृति कटाव वाली है. 

अब आप सोचिए कि इन्हीं नदियों के पेट में यानी राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 31 के साथ कितने नए इलाक़े बस गए. 

1910 में आईसीएस ऑफ़िसर ओ मैली लिखते हैं कि 'महानंदा बेसिन की नदियां शिफ़्टिंग नेचर की है, मतलब एकतरफ़ काटकर दूसरी तरफ़ मिट्टी जमाकर बसा देना. ' इस अंग्रेज़ अधिकारी ने पुराने पूर्णिया जिला को कोसी समूह और परमान-कनकई -महानंदा समूह बाँटकर अध्ययन किया था. इसलिए ज़रूरत है कि शहर के मध्य से गुज़रने वाली नदी को समझा जाए. 

पूर्णिया की नदी कारी कोसी को भी समझना होगा. कारी कोसी के साथ हमने कैसा व्यवहार किया, इसके लिए हमें एक गांव को को समझना होगा. कारी कोसी के पेट में एक गांव है -इंदरपुर, जो इंद्रपुर का अपभ्रंश है. यहीं से हमने इस नदी का रास्ता मोड़ने का काम किया. जबकि पूर्णिया गजेटियर के अनुसार महाराज इंद्रनारायण राय ने कारी कोसी के तट पर गाँव बसाया था. यहाँ अब स्टेट हाईवे है. 

अब हमें इस सड़क के किनारे बड़हरा, काला बलुआ, लालपुर बस्ती मिलती है जबकि 1891 ये सभी इलाक़े नदी के तट थे. मतलब 129 साल में हमने नदी का रास्ता बदल दिया, अपने बसावट के लिए. ऐसे में नदी कुपित तो होगी. वहीं इसी मार्ग में एक ऐसा भी इलाक़ा है, जिसके साथ छेड़छाड़ नहीं हुई तो वहाँ आज भी कारी कोसी शांति से बहती है, वह है सिंघिया जंगल का इलाक़ा.  इस इलाक़े को आप 'पाकिस्तान टोला' की वजह से जानते ही होंगे. 

कारी कोसी और सौरा के मिलन की जानकारी भी हमें ऱखनी होगी क्योंकि कभी इन नदियों का बड़ा नेट्वर्क होता था. चम्पानगर के पूरब कारी कोसी बनभाग पहुंचती है. यहाँ यह नदी पहले पूर्णियाँ -सहरसा रेल मार्ग को पहले पार करती है फिर सड़क मार्ग पारकर दक्षिण की ओर निकल जाती है जो आगे चलकर सौरा में मिल जाती है.  

इन दिनों जब हम पूर्णिया जिले के 250 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाने की तैयारी में जुटे हैं उस वक्त हमें नदियों के बारे में भी बात करनी चाहिए. बुकानन, ओ मैली जैसे अंग्रेज़ विद्वानों ने इस इलाक़े के बारे में बहुत कुछ लिखा है. बुकानन ने An Account of the District of Purnea (1809-10) और ओ मैली ने District Gazetteer of Purnea लिखा था. अब इसे लोगों तक सरल भाषा में पहुंचाने का वक़्त है ताकि हम जान सकें कि जहाँ हम पिछले 50-100 साल से बसे हुए हैं, वहाँ कौन सी नदी बहती थी? आखिर पूर्णिया का नदी सूत्र क्या था!

(पेशे से किसान और लेखक गिरीन्द्रनाथ झा पूर्णिया के नजदीक चनका नाम के गांव में रहते हैं और ग्राम-सुधार की दिशा में काम कर रहे हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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