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कोरोना युग माने व्हाट्सऐप बुक

हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशकों में शुमार राजकमल प्रकाशन ने 25 मार्च यानि पहला लॉकडाउन शुरू होते ही लेखकों के फेसबुक लाइव सत्र शुरू कर दिए थे और अब तक 128 लेखकों/ वक्ताओं के 172 लाइव शो हो चुके हैं. इनमें कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल से लेकर अभिनेता-नाटककार सौरभ शुक्ल और पुराने ज़माने की पॉप गायिका उषा उथुप भी शामिल थीं.

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aajtak.in
शिवकेश मिश्र 13 May 2020
कोरोना युग माने व्हाट्सऐप बुक व्हाट्सएप किताबें

आप मुझे सुन पा रहे हैं?'' कोरोना की महामारी के इस दौर में आजकल हिंदी प्रकाशकों की ओर से शुरू ऑनलाइन/वीडियो संवाद/ वेबिनार के प्रारम्भ में लेखक/वक्ता अक्सर यह सवाल करते देखे जाते हैं. लॉकडाउन के मुश्किल दिनों में पाठकों के साथ अपना एक राब्ता कायम रखने की गरज से कई प्रमुख प्रकाशकों ने ऐसी पहल की हैं जिससे कि हिंदी के पुराने मिजाज के पाठक और लेखक भी बहुत अभ्यस्त नहीं रहे हैं. इसके बावजूद आधे घंटे से एक-डेढ़ घंटे तक फेसबुक पर चलने वाले इस लाइव और फिर बाद के कुछेक ही घंटों में एक-एक वक्ता को सुनने वालों की तादाद 15,000 -20,000 तक पहुँचने से पता चलता है कि घर की चारदीवारी में कैद पाठक सचमुच कुछ साहित्य तत्व-चर्चा चाहते हैं. या कुछ नहीं तो वे इस तरह के साहित्यिक उपक्रमो में व्यस्त होकर समय बिताना पसंद कर रहे हैं.

हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशकों में शुमार राजकमल प्रकाशन ने 25 मार्च यानि पहला लॉकडाउन शुरू होते ही लेखकों के फेसबुक लाइव सत्र शुरू कर दिए थे और अब तक 128 लेखकों/ वक्ताओं के 172 लाइव शो हो चुके हैं. इनमें कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल से लेकर अभिनेता-नाटककार सौरभ शुक्ल और पुराने ज़माने की पॉप गायिका उषा उथुप भी शामिल थीं.

लेकिन यह पता चलते ही कि 14 अप्रैल को पहला लॉकडाउन पूरा होते ही दूसरा शुरू होने को है, राजकमल प्रकाशन ने एक नया प्रयोग शुरू किया व्हाट्सएप्प बुक का. इसके पीछे सोच यह थी कि कुछ लोग कंप्यूटर फ्रेंडली नहीं हैं लेकिन स्मार्ट फ़ोन उनके पास जरूर हैं.

ऐसे पाठकों के लिए एक नए फॉर्मेट में 80 से 120 पन्नो तक की ई-बुक जल्दी से गईं. अपने डाटा बैंक से ब्योरे निकालकर इन्हे एकसाथ 25,000 पाठकों तक भेजा जाने लगा. इस प्रस्तुति को नाम दिया गया 'पाठ-पुनःपाठ'. और भेजी पूरी सामग्री को नाम मिला पाठाहार। इसे नई-पुरानी रचनाओं के मेल से तैयार किया जा रहा है. मसलन लॉकडाउन के 46वें दिन के पाठाहार में चन्दन पांडेय की कहानी 'भूलना' के अलावा दिवंगत युवा कथाकार शशिभूषण द्धिवेदी पर अविनाश मिश्र की डायरी 'शशिविषयक' समेत कुछ और प्रस्तुतियां यही कोई 70 पन्नों में थीं.

इस माध्यम को लॉकडाउन लागू होते ही जिन कुछ प्रकाशकों ने पढ़ लिया था, राजपाल एंड संस भी उनमे एक था. उसने अपनी लाइव फेसबुक प्रस्तुतियों में विषय विषय को थोड़ा और विस्तार दिया था. मसलन, कथा, कविता, आलोचना से लेकर इतिहास, मिथक और संविधान तक. दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने संविधान की पुस्तक को केंद्र में रखकर सवा घंटे से ज़्यादा देर तक आसान सी भाषा में बात की तो उन्हें भी 3,000 से ज्यादा श्रोता मिले. और मिथकीय विषयों के चर्चित लेखक देवदत्त पटनायक के सत्र को तो 50,000 से भी अधिक लोग सुन चुके हैं. राजपाल की फेसबुक प्रस्तुतियों को अब तक दो लाख से ज्यादा पाठकों-श्रोताओं ने सुना है.

प्रकाशकों को इन प्रयोगों पर पाठकों-श्रोताओं का सीधा फीडबैक भी मिल रहा है. राजकमल प्रकाशन के मुखिया अशोक महेश्वरी कहते हैं, ''ऐसे उपक्रमों के जरिये पाठकों को मुश्किल वक़्त में साहित्य से जोड़े रखने के पीछे हमारा मकसद था कि उनमे अवसाद न पैदा हो, अच्छे साहित्य के साथ वे अपना यह समय ठीक से काट सकें. और जिस तरह की प्रतिक्रियाएं हमें मिल रही हैं, उससे हमारा हौसला बढ़ा है.''

राजपाल एंड संस की प्रमुख मीरा जौहरी भी कहती हैं, ''छपी हुई साहित्यिक कृतियों के पाठक घट रहे हैं या नहीं, यह तो बहस का विषय है, लेकिन फेसबुक लाइव पर लेखकों से जिस पैमाने पर लोग जुड़ रहे हैं, उससे हमें उम्मीद तो बांधती ही है.'' जौहरी बताती हैं कि मशहूर काटकर काशीनाथ सिंह ने भी फेसबुक लाइव के उनके इस प्रयोग को सराहा है. ''मैंने उनके स्वस्थ्य की जानकारी लेने के लिए फ़ोन किया था तो उन्होंने कहा कि 'आप अच्छा कर रही हैं.'' राजपाल एंड संस को अपनी करीब एक दर्जन किताबों की छपाई अभी अनिश्चितकाल के लिए टालनी पड़ी है.

महेश्वरी एक और बात जोड़ते हैं. अगर लॉकडाउन अभी और बढ़ता है, जिसकी कि सम्भावना ज्यादा है, तो हम अब एकल प्रस्तुतियों के अलावा ज़ूम वगैरह के ज़रिये 3-4 की सामूहिक चर्चा की ओर बढ़ेंगे क्योंकि लगातार एकल प्रस्तुतियों से पाठकों के बोर हो जाने का खतरा है.''

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