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सूखा बुंदेलखंडः 'अबकी लगता है, बैरी पानी जान लेकर जाएगा'

तो इसी गांव की राधा कहती है, कई बार प्रधान हीरालाल से कह चुके हैं कि हैंडपंप लगवा दो. लेकिन वे साफ मना कर देते हैं.

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aajtak.in
संतोष पाठक 25 May 2018
सूखा बुंदेलखंडः 'अबकी लगता है, बैरी पानी जान लेकर जाएगा' बुंदेलखंड में पानी का संकट

चित्रकूट। बुंदेलखंड के पाठा के बीहड़ इलाके में बसे ग्रामों में डकैतों का खौफ अब छट रहा है, लेकिन ग्रामीणों की जिंदगी अब भी मुश्किल में है. यह वह इलाका है जहां सरकार अभी तक न पानी पहुंचा पाई है.

पाठा के लोग इतने प्यासे हैं कि उन्होंने सब काम छोड़कर सिर्फ पानी की तलाश शुरू कर दी है. सुनने वाला कोई नहीं. बीहड़ इलाके में डकैतों की दस्तक कम होने के बाद भी कोई अफसर दुखड़ा सुनने नहीं पहुंचा.

पाठा के कई इलाकों में पानी का संकट है. सकरौंहा गांव की कहानी हैरान करने वाली है. करीब 3500 की आबादी के सकरौंहा गांव पहुंचते ही वहां एक झोपड़ी में रह रहे गनेश बसोर ने अपना दुखड़ा सुनाना शुरू कर दिया.

गांव में पानी नहीं है. पीने के लिए बहुत दूर से पानी लाना पड़ता है. सरकार कुछ नहीं करती. गणेश कहता है, परिवार में पांच बच्चे हैं. गांव में पानी नहीं है. दो किलोमीटर दूर जाकर सरकारी स्कूल से पानी भरकर लाने में दिन बीत जाता है. इससे धंधा प्रभावित हो रहा है तो खाने का संकट खड़ा हो रहा है.

गणेश कहता है, बांस की डलियां बनाकर किसी तरह से जिंदगी कट रही है. अब पानी भरने जाएं या डलिया बनाएं.

छह बच्चों का पेट पालने के लिए बांस की डलियों पर आश्रित देवमति कहती है, दो किलोमीटर दूर सरकारी स्कूल में लगे हैंडपंप से पानी लाने में ही दिन का ज्यादातर हिस्सा बीत जाता है.

नहाना और जानवरों को पिलाना तो और भी मुश्किल है. पानी भरने में समय बीत जाता है और डलिया बनाने का समय नहीं मिल पा रहा है.

तो इसी गांव की राधा कहती है, कई बार प्रधान हीरालाल से कह चुके हैं कि हैंडपंप लगवा दो. लेकिन वे साफ मना कर देते हैं.

उनका कहना है कि जमीन के भीतर पानी नहीं. ये कोई पहला गांव नहीं है. पाठा के इलाके के अधिकांश गांवों में यही हालात हैं.

मानिकपुर के छेरिहा खुर्द के ग्रामीण महेश कहते हैं, गांव में पानी नहीं है. यहां कुआं बहुत दूर है. वहीं राखी गुस्से में कहती है, लगता है अबकी 'बैरी पानी जान लेकर जाएगा.'

स्थानीय पत्रकार अनुज हनुमत कहते हैं, 'पाठा इलाके की प्यास बुझाने के लिए पाठा पेयजल योजना शुरू की गई थी.

डेढ़ दशक में भी ये साकार नहीं हो पाई. जो पानी की टंकियां बनाईं गईं थीं उन तक पानी ही नहीं पहुंच पाया, क्योंकि पाइप बीच में ही फट गए. सरकार का करोड़ों रुपया पानी में बह गया.'

आलम ये है कि लोगों को मीलों दूर जाकर बैलगाड़ी से पानी लाना पड़ रहा है. प्रशासन के तमाम दावे हवा हवाई साबित हो रहे हैं. गांवों की स्थिति देखने से लगता है कि कागजों में पानी के टैंकर दौड़ रहे हैं.

लोगो का कहना है कि हमे अब इस प्रशासन और नेताओं से कोई आशा नहीं है. इस गांव में सरकार ने अपनी सामुदायिक संसाधन सेवियों को भी भेजा है.

बिहार से कुछ माह के लिए पाठा में आए समाज सेवी महिलाओं का दल समूह बना रहा है. दल की सदस्य विनीता कुमारी कहती हैं, इस इलाके में बहुत गरीबी है. पीने का पानी तक नसीब नहीं है.

सकरौंहा गांव के लोग स्कूल से पानी भरने आते हैं. कुछ घर तो ऐसे हैं जहां दो सदस्य हैं और दोनों बूढ़े हैं. उनको दूर से पानी भरकर लाना बहुत मुश्किल है.

यह कोई इकलौता गांव नहीं है. पाठा के दर्जनों गांव पानी संकट के इस बेजा त्रासदी को भोग रहे हैं.

सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो हालात अगले एक दो महीने में और विकट हो जाएंगे. मानिकपुर तहसील केअमचुरनेरुआ, किहुनिया, मनगवां, इटवां ग्राम पंचायतों में पानी सबसे ज्यादा किल्लत.

पाठा के छेरिहाखुर्द, शेखापुर , छिवलहा, चुरेह कशेरुआ जैसे आधा सैकड़ा गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.

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