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सिख धर्म के विचारों और मूलतत्वों का सारांश जपजी

जपजी, गुरु नानक की जपजी का अंग्रेजी प्रस्तुतिकरण है जिसमें सिख धर्म के विचारों और मूलतत्वों का सारांश है.

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 16 April 2019
सिख धर्म के विचारों और मूलतत्वों का सारांश जपजी फोटो सौजन्यः किरण तिवारी

जपजी, गुरु नानक की जपजी का अंग्रेजी प्रस्तुतिकरण है जिसमें सिख धर्म के विचारों और मूलतत्वों का सारांश है. पहले-पहल इसका प्रकाशन सन् 1973 में हुआ और उसे गुरु नानक के श्रद्धांजलि स्वरूप फिर से सिख धर्म के संस्थापक की पांच सौ पचासवीं जयंती पर मुद्रित किया गया. यह किताब सिख और गैर-सिख पाठकों दोनों के लिए उपयोगी है जो गुरु नानक के विचार और उनके दर्शन को समझना चाहते हैं. 

जपजी या आमतौर पर जपजी साहिब के नाम से प्रसिद्ध रचना आदि ग्रंथ में मूल मंत्र के बाद पहली स्तुति है जो आदिग्रंथ का सार प्रस्तुत करती है. गुरु नानक का दर्शन, देश और काल की सीमाओं से परे भी प्रासंगिक है जो पूरी मानवता के लिए उपयोगी है. 

जपजी में गुरु नानक दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं: सत्य को कैसे हासिल किया जा सकता है? और असत्य के आवरण को कैसे हटाया जा सकता है? दरअसल ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जपजी की विषयवस्तु इन्हीं दो समस्याओं के गिर्द घूमती है. लेखक ने गुरु नानक के जवाबों की व्याख्या करने की कोशिश की है और उसे पाठकों के लिए सामान्य भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है.

डॉ. संगत सिंह ने जपजी के सार को एक संकलित लेख के रूप में बुनने का प्रयास किया है ताकि विषयवस्तु को स्पष्ट रूप से समझा जा सके. यह किताब दो अध्यायों में जपजी का विश्लेषण करती है. पहले अध्याय में जपजी की विषयवस्तु की एक ठोस और सरल व्याख्या है और पहली बार एक लेख के रूप में उसका संकलित स्वरूप प्रस्तुत किया गया है. 

जपजी खुद ही अपने पाठकों से बात करती है, अपना अर्थ बतलाती है और अपने विषय-वस्तु पर प्रकाश डालती है. इस पुस्तक में दूसरा अध्याय मूलमंत्र की एक व्याख्या है जिसमें स्तुति है और जो एकनाम सतनाम के महत्व को बताती है. जपजी के अलावा जो सुबह में शुभ मुहुर्त में गाया जाता है, इस किताब में रहीरा और सोहिता का भी संकलन है जिसे सिखों धर्मप्राण सिखों द्वारा गुरुद्वारों में सूर्यास्त और सोने के समय गाया जाता है, भले ही वे दुनिया में कहीं भी हों. ये गीत और अरदास जो सिखों की मानक प्रार्थना है, उन्हें भी इस किताब में स्थान दिया गया है.    

डॉ संगत सिंह का जन्म रावलपिंडी में हुआ था (वर्तमान के पाकिस्तान में) और उन्होंने पंजाब विश्वविद्लायलय से 1953 में इतिहास में स्नातकोत्तर और पीएचडी (1964) किया. डॉ संगत सिंह भारतीय विदेश सेवा में पॉलिसी प्लानिंग थिंकटैंक थे और उन्होंने करीब आधा दर्जन किताबों की रचना की. उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में शामिल है- द सिख्स इन हिस्ट्री (न्यूयॉर्क, 1995). उनकी किताबें पंजाबी और हिंदी में अनुदित हो चुकी हैं. 

किताबः जपजी

लेखकः डॉ. संगत सिंह

प्रकाशकः हिंद पॉकेट बुक्स

कीमतः 299 रु.

(किरण तिवारी सामाजिक कार्यकर्ता हैं और साहित्य में उनकी गहरी रुचि है)

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