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आस्था, नई दुनिया और उम्दा किताब

हिंदोल सेनगुप्ता की बेहद सामयिक और प्रासंगिक किताब, हिंदू होने का अर्थ हिंदूपन की बात करती है हिंदुत्व की नहीं. मौजूदा वक्त में जब धर्म पर बात करना, धर्म को लेकर अपनी बात रखना मुश्किल हो गया है, तब, खासकर हिंदू धर्म की बात करते ही मामला संजीदा होने लग जाता है. यह किताब निजी तजुर्बों की किताब है.

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 24 May 2019
आस्था, नई दुनिया और उम्दा किताब फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे

नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता के लिए चुने जाने के ठीक एक दिन बाद जब एक किताब देर से सही आपके हाथ आए, जिसका शीर्षक 'हिंदू होने का अर्थ' हो, तो उस ओर ध्यान जाना लाजिमी है. देश भर में जिस लहर के साथ मोदी जीतकर आए हैं, वैसे में कई लोग हिंदुत्व के और अधिक आक्रामक होने की आशंकाएं जाहिर कर रहे हैं. पर असल में हिंदोल सेनगुप्ता की यह किताब हिंदुत्व को नए नजरिए से देखने का कोण मुहैया कराती है.

एक भाव यह है कि हिंदुत्व सार्वभौमिकता का संदेश देता है. दूसरा भाव यह भी है कि हिंदुत्व एक प्रकार के उन्माद का नाम है जो मुसलमानों को निशाना बनाता है. ऐसा विरोधाभास अकारण नहीं है. फिर भी, मैं हिंदुत्व का अर्थ गुणात्मक पद के रूप में लगाता हूं. इसका मतलब ''हिंदुपन" है, हिंदू धर्म नहीं. हालांकि हिंदू धर्म उसमें शामिल है. 

ऐसे में सेनगुप्ता की यह किताब बेहद प्रासंगिक किताब है, क्योंकि मौजूदा वक्त में धर्म पर बात करना, धर्म को लेकर अपनी बात रखना मुश्किल हो गया है. खासकर हिंदू धर्म की बात करते ही मामला संजीदा होने लग जाता है. किताब में कई सारे अध्याय हैं और सेनगुप्ता स्थापित करते हैं कि ईश्वरत्व सजीव और निर्जीव सबमें और सब ओर व्याप्त है, यह प्रज्ञा और आस्था का संगम है. मनुष्य प्रकृति का ही हिस्सा है, उसका विजेता नहीं क्योंकि संसार मानव के उपभोग के लिए ही नहीं रचा गया है (इसका अर्थ है कि सिर्फ मनुष्य ही नहीं, सभी जीवों और वनस्पतियों यहां तक कि भूमि, जलस्रोतों और वायुमंडल के भी अपने अधिकार हैं.)

हिंदोल का लेखन हिंदूपन के नए परिभाषाओं से रूबरू कराती है. किताब के कवर पर ही लिखा है 'प्राचीन आस्था, नई दुनिया और आप'. जाहिर है कि लेखक इतिहास की भूलभुलैया की बजाए मौजूदा वक्त में हिंदू धर्म और हिंदुत्व के वास्तविक मर्म को सहज-सरल तरीकों से बताने और जताने की कोशिश कर रहा है. 

इस किताब में सेनगुप्ता के निजी तजुर्बे हैं  और नए जमाने की सोच भी है. किताब बनारस के मंदिरों से लेकर जटिल विषयों तक सहजता से बताती है. किताब का पहला अध्याय है हिंदुओं के बारे में कैसे लिखा जाए? यह सवाल बेहद मौजूं है और ऐसा लगता है कि इस प्रश्न ने खुद सेनगुप्ता को काफी परेशान किया होगा. दूसरा अध्याय पूछता है हिंदू कौन है और तीसरा, क्या चीज है जो आपको हिंदू बनाती है. ये ऐसे बुनियादी सवाल हैं जो घोर आक्रामक और बेचैन हिंदुत्व के झंडाबरदारों और आंख मूंदकर हिंदू शब्द से ही घृणा करने वालों के लिए ही हैं और उन्हें जरूर पढ़ना चाहिए.

पर इस किताब का सातवां अध्याय वाकई थोड़े कम रिसर्च के आधार पर लिखा गया है पर जो मेरा पसंदीदा विषय है, जिसका शीर्षक है क्या हिंदू होने का अर्थ आपका शाकाहारी होना है? जो लोग इस आधार पर हिंदूपन को पारिभाषित करते हैं वो सिरे से गलत हैं. पर इस अध्याय में सेनगुप्ता पूरी तरह चूक गए हैं. वह मांसाहार के बाद सीधे गोवध पर आते हैं और उन्हें लगता है कि मांसाहार का अर्थ महज गोमांस भक्षण ही है. मछली खाना भी मांसाहार है और हिंदू जीवन शैली का हिस्सा है यह शायद सेनगुप्ता भूल गए हैं. दूसरी तरफ, बंगाल, असम बिहार जैसे इलाके हैं जहां मांसाहार, खासकर मछली खाने का रिवाज है. तो अगर सेनगुप्ता इनकी तरफ थोड़ा इशारा कर पाते तो किताब गहरी बन जाती.

फिर भी, हिंदू धर्म पर व्यापक और अलग नजरिए वाले इस काम के लिए सेनगुप्ता वाकई बधाई के हकदार हैं. वो भी बिना किसी अनावश्यक टीका-टिप्पणी के वैज्ञानिक तथ्यों के साथ अपनी बात कह जाते हैं. मदन सोनी ने किताब में ऊंचे दरजे का अनुवाद किया है. 

किताबः हिंदू होने का अर्थः प्राचीन आस्था, नई दुनिया और आप

पृष्ठ संख्याः 182

कीमतः 250 रुपए

प्रकाशकः मंजुल पब्लिशिंग हाउस

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