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इसलिए गलत है भारत के कोरोना वायरस पर ओली का बयान

कोविड-19 के 16,000 से ज्यादा जीनोम सीक्वेंस आइसोलेट बन चुके हैं इसके बाद भी वायरस की प्रचंडता की तुलना असंभव है

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aajtak.in
सोनाली आचार्जी 23 May 2020
इसलिए गलत है भारत के कोरोना वायरस पर ओली का बयान कोरोना संकट

सोनाली आचार्जी

आम जनता में म्यूटेशन या जैविक बदलाव की एक अलग ही समझ है. हॉलीवुड की फिल्म एक्स-मैन में ह्यू जैकमैन की अंगुलियों से लंबे-लंबे धातु के नाखून उगने लगे थे जो कि अंदर भी चले जाते थे और इससे जैकमैन एक ख्याली पात्र वॉल्वेराइन बन गया. लेकिन म्यूटेशन से कोविड की छोटी सी कांटों वाली गोल गेंद बढ़ती जाए और कांटे तीखे होते जाएं-ये कहीं ज्यादा डरावना है. आमजन की म्यूटेशन की ये समझ ऐसे नाटकीय बदलावों की कल्पना करके असली मुद्दे को भयानक बना लेती है.

लेकिन इसका बहुत थोड़ा हिस्सा ही सच है. कोविड-19 वायरस में बदलाव आ रहा है. लेकिन इसे साई-फाई फिल्मों में दिखाए म्यूटेशन जैसा बताना या 20 मई को नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली का अति साधारण बयान कि “भारतीय वायरस, चीनी और इटैलियन वायरस से ज्यादा खतरनाक है”- एक तरह से दशकों तक महामारी पर अनुसंधान या और इकट्ठा किए गए प्रायोगिक साक्ष्यों की अनदेखी करने जैसा है. बदयाव या म्यूटेशन पर आम जनता की समझ और विज्ञान की समझ में बहुत भारी फर्क है.

आपको बता दें कि पूरी दुनिया में इस वक्त कोविड-19 वायरस के 16,000 से ज्यादा जीनोम सीक्वेंस आइसोलेट्स बन चुके हैं. सिर्फ भारत में ही सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मोलीक्यूलर बायोलॉजी ने 100 आइसोलेट्स अलग कर लिए हैं.

ओली को अपने बयान में दम लाने के लिए भारतीय वायरस के बारे में बहुत सारी जानकारियां हासिल करनी होंगी और ये भी पुख्ता करना होगा कि जिन स्ट्रेंस की वे बात कर रहे हैं वे सचमुच भारत से लौटे शक्स के नमूनों से ही लिए गए हैं. नेपाल में प्रकाशित प्रकाशित इकलौता कोविड-19 वायरस का जीनोम सीक्वेंस 12 मार्च 2020 को वुहान से लौटे शख्स से जुड़ा है.

साथ ही ये साबित करना कि एक स्ट्रेन दूसरे के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है ये सिद्ध करना उतना ही कठिन है जितना सरल इसे कह देना है. इसके लिए महीनों के ट्रायल की जरूरत होती है और नेपाल में किसी ने इस दावे की सत्यता के लिए कोई ट्रायल नहीं किया है. ओली के दावे की हवा निकालते हैं आधिकारिक रूप से प्रकाशित आंकड़े. 21 मई तक भारत में दुनिया में कोरोना से होने वाली मौतों की दर सबसे कम और स्वस्थ्य होने की दर सबसे ज्यादा यानी क्रमश: 3.05 फीसदी औऱ 40.31 फीसदी है. दूसरी ओर इटली के आंकड़े कहीं ज्यादा भयावह हैं. वहां मृत्युदर भारत के मुकाबले पांच गुना ज्यादा यानी 14.24 फीसदी है. भारत में जांच का तंत्र कहीं ज्यादा दुरुस्त है. यहां 1.32 अरब लोगों पर 21 मई तक 2,61,5920 टेस्ट किए जा चुके हैं. नेपाल 20 मई तक में 2.8 करोड़ लोगों पर 1,10,566 टेस्ट ही हुए (इनमें से भी सिर्फ 35,494 आरटी-पीसीआर टेस्ट थे और बाकी रैपिड टेस्ट थे).

तो क्या म्यूटेशन हो रहा है?

हम लोगों में ज्यादातर लोगों ने कभी वायरस नहीं देखा, सिवाय उसके एनीमेशन के. वायरस को जिंदा देखना काफी मुश्किल है. वायरस पर भी इनसानों, जानवरों या पौधों की तरह क्रमिक विकास का जीवित रहने का दबाव होता है. ठीक बाक सब जीवित चीजों की तरह वायरस का भी एक ही मकसद होता है जीवित रहना. ऐसा लगता है कि वायरस में सुपरपॉवर जैसा म्यूटेशन हो रहा है जबकि सभी जीवित चीजों की ये खासियत होती है, तो ऐसा लगने के पीछे वायरस में बहुत तेजी से म्यूटेशन होना है. यह याद रखना भी उतना ही जरूरी है कि म्यूटेशन एक तरह से कॉपी या नकल के दौरान हुई गड़बड़ियां हैं-जो वायरस के किसी होस्ट कोशिका में खुद की कॉपी करने के दौरान होती हैं. कुछ गलतियों से मजबूत नकल होती है और कुछ से कमजोर. सीसीएमबी में जेनोमिक्स और एपीजेनेटिक्स के विशेषज्ञ राकेश मिश्रा कहते हैं, आरएनए वायरस डीएनए वायरस के मुकाबले तेजी से म्यूटेट होते हैं और कोविड-19 के अनेक आइसोलेट बन चुके हैं. एक रोगाणु का मकसद ही होस्ट को संक्रमित करना, अपनी ज्यादा कॉपी करना और उनको फैलाना होता है.

रॉफेल संजुआन और पिलार डोमिंगो-कलाप के 2016 के एक रिसर्च पेपर मैकेनिज्म ऑफ वायरल म्यूटेशन के मुताबिक, “किसी जीव की म्यूटेशन दर उसकी जेनेटिक जानकारियां अगली पीढ़ी तक जाने की संभावनाओं पर तय होती है. इस महत्वपूर्ण अध्ययन में यह भी पाया गया कि वायरस जो कि तेजी से म्यूटेट होते हैं- जो कि छोटे, सिंगल स्ट्रैंडेड आरएनए वायरस होते हैं.” कोविड 19 वायरस लंबा, डबल स्ट्रैंडेड आरएनए वायरस है.

एक और तथ्य है म्यूटेशन का तरीका-वायरस अपने होस्ट को मारने के लिए म्यूटेट नहीं होता है. अगर उसका होस्ट, उसके फैलने से पहले मर जाएगा तो वायरस का अस्तित्व खत्म हो जाएगा. साथ ही वायरस के जो म्यूटेशन आगे बढ़े हैं उनमें नए होस्ट को संक्रमित करने की बेहतर क्षमता या नए होस्ट के प्रतिरोधी तंत्र की ओर से बनाए एंटीबॉडीज से बचने की क्षमता होती है. यही वजह लागू होती है एचआइवी वायरस पर जिसके म्यूटेशन की वजह से उसकी वैक्सीन बनना मुश्किल हो गया. भारत में कोविड-19 पॉजिटिव निकलने की दर (टेस्ट किए गए लोगों में संक्रमित पाए गए लोग) इटली के मुकाबले (इटली में 7.15 फीसदी और भारत में 4.29 फीसदी) बहुत कम है.

लिहाजा ओली के उस सबसे खतरनाक वायरस वाले बयान की पुष्टि करना असंभव है. यहां तक कि ये और ज्यादा संक्रामक भी होता नहीं दिख रहा है. दरअसल म्यूटेशन वैक्सीन मार्केट और एपीडेमोलॉजिस्टों की चिंता है न कि राजनेताओं की. म्यूटेशन की मैपिंग से विज्ञानियों को संक्रमण की दर और पैटर्न भांपने में मदद मिलती है जिससे बीमारी के भविष्य के बारे में अनुमान जाहिर किए जाते हैं. फिलहाल, राजनेताओं के लिए असली चिंता का विषय उनके अपने स्वास्थ्य तंत्र की कोविड संक्रमित लोगों का पता लगाने, उनके टेस्ट और इलाज होना चाहिए. खतरनाक का आरोप लगाने से संक्रमण और मौतों की दर घटाने में मदद नहीं मिलेगी. सिर्फ बचाव और लक्षित स्वास्थ्य उपाय से ही यह हासिल किया जा सकता है. ओली को दिलासा देने वाली बात ये है कि जानवरों पर हुए अध्ययनों से पता चला है कि वायरस की वापसी दूसरे राउंड में उतने खतरनाक तरीके से नहीं होती (वायरस के जनक देश समेत).

दुनिया में पचास लाख कोविड-19 केसों के साथ यह एक महामारी बन चुकी है और यही समय है कि पूरी दुनिया इसे लेकर एकता दिखाए. भारत ने इसके प्रयास शुरू कर दिए हैं-ओली के इस बयान से तीन दिन पहले भारत ने नेपाल को टेस्ट किट की सौगात दी थी जिससे वहां 30,000 टेस्ट हो सकेंगे. 22 अप्रैल को भारत ने 23 टन दवाएं नेपाल को भेजी थीं. आखिर इस लड़ाई में हम सब एक हैं.

अनुवादक इंडिया टुडे हिंदी पत्रका, असिस्टेंट एडिटर मनीष दीक्षित

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