एडवांस्ड सर्च

आम्रपाली ने 27 कंपनियां सिर्फ हेराफेरी के लिए बनाईं

हजारों खरीदारों को ठगने वाले आम्रपाली ग्रुप के कर्ताधर्ताओं ने 27 से ज्यादा कंपनियां चपरासी और निचले कर्मचारियों को बोर्ड में शामिल कर पैसा इधर से उधर करने के लिए बनाई थीं. इन कंपनियों का इस्तेमाल सिर्फ हेराफेरी के लिए होता था. इन्हें बनाने वालों में कंपनी के कर्ताधर्ता अनिल शर्मा, चंद्र वाधवा, अधिकारी और अनिल मित्तल शामिल हैं. नोटबंदी के दौरान कैश जमा करने में इन कंपनियों का इस्तेमाल किया गया.

Advertisement
aajtak.in
मनीष दीक्षित/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 30 July 2019
आम्रपाली ने 27 कंपनियां सिर्फ हेराफेरी के लिए बनाईं फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे

हजारों खरीदारों को ठगने वाले आम्रपाली ग्रुप के कर्ताधर्ताओं ने 27 से ज्यादा कंपनियां चपरासी और निचले कर्मचारियों को बोर्ड में शामिल कर पैसा इधर से उधर करने के लिए बनाई थीं. इन कंपनियों का इस्तेमाल सिर्फ हेराफेरी के लिए होता था. इन्हें बनाने वालों में कंपनी के कर्ता-धर्ता अनिल शर्मा, चंद्र वाधवा, अधिकारी और अनिल मित्तल शामिल हैं. नोटबंदी के दौरान कैश जमा करने में इन कंपनियों का इस्तेमाल किया गया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई फोरेंसिक जांच में कई और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. आम्रपाली ग्रुप की 47 कंपनियों में किसी न किसी तरह डायवर्ट फंड की रकम 5619 करोड़ रु. है. सौ करोड़ की प्रोफेशनल फीस निदेशकों को दी गई. यही नहीं 700 से ज्यादा फ्लैट कंपनी ने अपने कथित सप्लायरों को दे दिए. यही नहीं ग्लोबल वित्तीय फर्म जे.पी. मॉर्गन ने 20 फीसदी से ज्यादा रिटर्न पर 85 करोड़ रु. निवेश का करार किया. इसमें से 60 करोड़ रु का निवेश आम्रपाली लेजर वैली में फेमा नियमों को दरकिनार करके किया गया. 

इस प्रोजेक्ट में खरीदारों से प्रोजेक्ट की प्रगति के आधार पर पैसा लिया जा रहा था यानी ये कंस्ट्रक्शन लिंक्ड पेमेंट प्रोजेक्ट था. फोरेंसिक ऑडिटर्स के मुताबिक, "ज्यादातर समय पर खरीदारों ने उस रकम से ज्यादा रकम दी जो तब तक प्रोजेक्ट पर खर्च की गई थी. आम्रपाली जोडिएक डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड ने खरीदारों के पैसे को डाइवर्ट किया और इसमें जेपी मॉर्गन के किसी निवेश की जरूरत नहीं थी." 

नीलकंठ बिल्डक्रॉफ्ट और रुद्राक्ष इंफ्र नामक कंपनी के बोर्ड में ऑफिस ब्वॉय तक शामिल रहे और इसे जेपी मॉर्गन से लेन-देन में शामिल किया गया. इन 47 कंपनियों में कुछ वे कंपनियां भी शामिल हैं जिनका इस्तेमाल सिर्फ फर्जीवाड़े के लिए होता था.

फोरेंसिक रिपोर्ट कहती है कि जेपी मॉर्गन को फायदा पहुंचाने के लिए वैल्यूएशन में भी हेराफेरी की गई. हैरानी की बात ये है कि जेपी मॉर्गन के निवेश की जानकारी किसी खरीदार को नहीं थी. मॉरीशस रूट से आए विदेशी निवेश से जुड़ी दिलचस्प बात ये है कि न ही भारत से कोई मॉरीशस गया और न ही कोई मॉरीशस से भारत आया. लेकिन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हो गए और आम्रपाली को पैसा मिल गया. 

आम्रपाली ने बड़ी संख्या में फ्लैट 1000 रु. से लेकर 1400 रु. प्रति वर्गफुट की कीमत पर बेचे जो कि लागत मूल्य से भी कम था. ऑडिटर्स का कहना है कि इसमें साफ तौर पर दिखता है कि कंपनी ने बगैर हिसाब-किताब के खरीदारों से नगद में भुगतान लिया है. ऐसे सौदों का आकार 1000 करोड़ तक हो सकता है. 

बैंकों से लोन लेकर उसकी बंदरबांट भी आम्रपाली के डायरेक्टरों ने जमकर की. रिपोर्ट के मुताबिक, आम्रपाली ग्रुप को बैंक ऑफ बड़ौदा से 75 करोड़ रु., यूनियन बैंक ऑफ इंडिया से 50 करोड़ रु. और कॉर्पोरेशन बैंक से 25 करोड़ रु. का लोन नोएडा के सेक्टर 126 में ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए मिला लेकिन हासिल होते ही इसमें से 51 करोड़ रु. से ज्यादा की रकम समूह की 58 कंपनियों में डाइवर्ट कर दी गई.  

आम्रपाली समूह की कंपनियों के फोरेंसिक ऑडिट से मिली ये जानकारियां शुरुआती कही जा सकती हैं क्योंकि ये प्रक्रिया अभी भी चल रही है. फोरेंसिक ऑडिट में कई प्रक्रियाएं लंबी चलने वाली हैं. जाहिर है इनके नतीजों से और भी राज सामने आएंगे. 

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay