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शॉर्ट फिल्मेंः देखन में छोटन लगे

डिजिटल जमाने में शॉर्ट फिल्मों को मिला सहारा और सराहना, बड़ी शख्सियतों के जुड़ने से दर्शक भी बढ़े

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aajtak.in
नवीन कुमारमुंबई, 13 June 2020
शॉर्ट फिल्मेंः देखन में छोटन लगे शॉर्ट में गंभीर बातें

मनोरंजन की दुनिया में शॉर्ट फिल्मों को अब एक सशक्त माध्यम के रूप में देखा जाने लगा है. इसमें समाज से जुड़े उन विषयों और मुद्दों को पेश किया जा रहा है जिसे सेंसर बोर्ड की वजह से फीचर फिल्मों में लाना कठिन होता है.

समाज और परिवार से जुड़े उन पहलुओं में ऑडिएंस को अपना अक्स दिखता है.

ऑडिएंस के मिल रहे प्यार ने आज डिजिटल प्लेटफार्म पर शॉर्ट फिल्मों को बड़ा बाजार दे दिया है. कल तक शॉर्ट फिल्में बनाना घाटे का सौदा माना जाता था. क्योंकि, इन फिल्मों का न तो कोई खरीदार होता था और न ही इसे दिखाने के लिए प्लेटफार्म. लेकिन अब ऐसी फिल्मों से नामचीन स्टार भी जुड़ने लगे हैं. काजोल सरीखी अदाकारा जो करण जौहर और घरेलू प्रोडक्शन की फिल्मों में ही काम करना पसंद करती हैं, ने बलात्कार जैसे विषय पर आधारित 'देवी' शॉर्ट फिल्म का हिस्सा बनना स्वीकार किया.

बलात्कार जैसे मुद्दे ने काजोल को यह फिल्म करने के लिए प्रेरित किया. काजोल के शब्दों में, 'आज के दौर में महिलाओं पर कई तरह की घटनाएं घट रही हैं, ऐसे में 'देवी' की समाज को आइना दिखाने में अहम भूमिका होगी.' इसमें नौ उत्पीड़ित महिलाओँ की कहानी को 13 मिनट में कहा गया है. प्रियंका बनर्जी निर्देशित यह फिल्म महिला अत्याचार पर लचर व्यवस्था के खिलाफ सवाल भी उठाती है.

दूसरी ओर, निस्वार्थ भाव से घर और परिवार को संभालने वाली होममेकर की अपनों के नजर में क्या अहमियत है उसे संवेदनशील तरीके से पेश किया गया है 17 मिनट की 'घर की मुर्गी' शार्ट फिल्म में. इसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाली अश्विनी अय्यर तिवारी ने निर्देशित किया है. इससे पहले वे निल बटे सन्नाटा, बरेली की बर्फी और पंगा जैसी फिल्मों को निर्देशित कर चुकी हैं. लेकिन उनकी इस फिल्म को उनके राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता निर्देशक पति नितेश तिवारी ने लिखा है.

बकौल अश्विनी, 'घर की मुर्गी की सीमा बत्रा आम महिलाओँ का प्रतिनिधित्व करने वाला किरदार है. इसकी कहानी देश की हर महिला से प्रेरित होकर लिखी गई है. इसलिए इस किरदार से मैं खुद को भी अलग नहीं देख पाती हूं.'

अश्विनी अपने पति नितेश के बारे में कहती हैं कि वे होममेकर को अच्छी तरह से समझते हैं, यही वजह है कि उन्होंने काफी संवेदनशील कहानी लिखी है. 'घर की मुर्गी' शॉर्ट फिल्म एक होममेकर महिला के बारे में है जो अपने बारे में न सोचते हुए पूरे परिवार के लिए दिन-रात काम करती है. लेकिन जब वो अपने लिए एक महीने की छुट्टी पर जाना चाहती है तो परिवार के हर सदस्य की क्या स्थिति होती है वो सब आज किसी भी मध्यम परिवार में देखने को मिल जाता है.

अश्विनी के शब्दों में, 'समाज और परिवार का हर व्यक्ति होममेकर का सम्मान और धन्यवाद करे. होममेकर सुपरहीरो है. घरेलू महिला सच में सुपरवुमन है.' होममेकर सीमा बत्रा की प्रभावशाली भूमिका करने वाली साक्षी तंवर भी कहती हैं, 'अपने परिवार के लिए घर का काम करने वाली महिलाओं की अहमियत को समझना जरूरी है.'

मध्यम परिवार में ही एक महिला के अंदर दबी इच्छाओं को अपनी 20 मिनट की शॉर्ट फिल्म 'एक कदम' से बाहर लाने का प्रयास युवा लेखक-निर्देशक राजीव उपाध्याय ने भी किया है. इसमें दिखाया गया है कि इस महिला का आत्मबल तब बढ़ जाता है जब वो अपने पति के लिए अकेले बाजार जाकर दवा खरीद लाती है. वो अपने व्यक्तित्व को खोज लेती है और उसे अकेले सिनेमा देखने जाने में हिचक नहीं होती है.

बकौल राजीव, 'रेणुका शहाणे यह शॉर्ट फिल्म करने के लिए इसलिए तैयार हो गईं कि अनुराधा के किरदार में वो खुद को देख रही थीं.' राजीव ने बताया कि फेस्टिवल में उनकी फिल्म देखने के बाद कई दर्शकों ने कहा कि अनुराधा में उनकी मां दिखती हैं.

'एक कदम' को चित्रा भारती फिल्म फेस्टिवल 2020 में बेस्ट फिल्म का अवार्ड और एक लाख रूपए नकद के अलावा बेस्ट ऐक्ट्रेस का अवार्ड रेणुका शहाणे को 25 हजार रूपए नकद इनाम के साथ मिला. शहीद मेला फिल्म फेस्टिवल में इसने 13 अवार्ड बटोरे. 'रिबन' फीचर फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने और एडिटिंग करने वाले राजीव की 'एक कदम' को कई शॉर्ट फिल्म महोत्सवों के लिए चयन किया गया है.

समाज और परिवार में विषयों की कमी नहीं है. उस पर युवा लेखक, ऐक्टर और डाइरेक्टर अदीब रईस ने भी अपनी पैनी नजर डाली है और दिल को छू लेने वाली शार्ट फिल्म 'बातें' बनाई है. इसमें सुप्रिया पिलगांवकर, शिवानी रघुवंशी, संकल्प जोशी और अदीब भी हैं. बकौल अदीब, '20 मिनट की मेरी फिल्म खुदकुशी, डिप्रेशन, रैंगिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आधारित है.'

आज हिंदी फीचर फिल्मों में कंटेंट हीरो है तो शॉर्ट फिल्मों के लिए भी यही मायने रखता है. कंटेंट दमदार नहीं है तो ऐसी शॉर्ट फिल्म को ऑडिएंस तुरंत खारिज कर देते हैं. कंटेंट के दम पर ही 'पीरियड एंड ऑफ सेंटेंस' ने ऑस्कर अवार्ड जीत लिया.

उत्तर प्रदेश के जिले हापुड़ की एक लड़की की कहानी पर बनी यह डॉक्युमेंटरी शॉर्ट फिल्म महिलाओं के पीरियड (मासिकधर्म) पर आधारित है.

आज शॉर्ट फिल्मों की भीड़ इसलिए है कि उसमें मोबाइल से बनी एक-दो मिनट वाली शॉर्ट फिल्में भी हैं.

मोबाइल पर बनी शॉर्ट फिल्मों के लिए भी फिल्म फेस्टिवल होते हैं. अच्छे कैमरे वाले मोबाइल के अलावा सस्ते में डिजिटल कैमरे बाजार में उपलब्ध हैं जिससे बेहतरीन शॉर्ट फिल्में बनाई जा रही हैं.

राजीव कहते हैं, 'यूट्यूब और ओटीटी प्लेटफार्म के कारण शॉर्ट फिल्मों के लिए रिलीज की समस्या नहीं है. वूट, जी-5, सोनी लिव, नेटफ्लिक्स, अमेजोन, एमएक्स प्लेयर, हमारा मूवीज, रॉयल स्टैग के अलावा और कई चैनल हैं जिस पर सिर्फ शॉर्ट फिल्में दिखाई जाती हैं. फिल्म की लागत निकल जाती है. लेकिन अभी भी लेखन को लेकर चुनौती है.

दो मिनट से लेकर बीस मिनट की कहानी इतनी दमदार होनी चाहिए जो ऑडिएंस को बांध कर रख सके.' फिल्म ट्रेड पंडित अतुल मोहन का कहना है, 'डिजिटल ने शॉर्ट फिल्मों का बाजार बड़ा कर दिया है. इसमें नामचीन ऐक्टर्स भी काम करने लगे हैं. उनके लिए पैसे से ज्यादा हर मीडियम में अपने प्रशंसकों को खुश रखना मायने रखता है. इसलिए उन्हें इसमें काम करने में परेशानी नहीं होती है. वो एक-दो दिनों में शूट कर लेते हैं. इसकी कहानी ऑडिएंस पर सीधे जो असर करती है.'

शॉर्ट फिल्मों का सबसे बड़ा प्लेटफार्म रॉयल स्टैग बैरल सेलेक्ट लार्ज शॉर्ट फिल्म्स है जो न सिर्फ शॉर्ट फिल्मों को खरीद रहा है बल्कि उसे ऑडिएंस तक पहुंचाने का प्लेटफार्म भी देता है.

इंडस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक 'देवी' की लागत लगभग 25 लाख रूपए है. इसमें काजोल के अलावा नेहा धूपिया, श्रुति हसन, शिवानी रघुवंशी, नीना कुलकर्णी, संध्या म्हात्रे, रमा जोशी, मुक्ता बर्वे, रशस्विनी दयामा ने दमदार भूमिका की है. इसे रॉयल स्टैग का प्लेटफार्म मिलने से बड़ी संख्या में ऑडिएंस मिला.

सोनी लिव पर 'घर की मुर्गी' के अलावा 'एक कदम' और 'बातें' को भी हजारों में ऑडिएंस मिले हैं. 'देवी' को लेकर यह विवाद भी रहा कि उसका कंटेंट एक और शॉर्ट फिल्म 'फोर' से मिलता है. 'फोर' तीन बलात्कार पीडिता पर आधारित है.

विवाद के बावजूद 'देवी' को ऑडिएंस ने पसंद किया. क्योंकि, विषय झकझोरने वाला है.

अब लोकतांत्रिक तरीके से शॉर्ट फिल्में बन रही हैं और अच्छी कहानी की वजह से शॉर्ट फिल्म बनाने के लिए पैसों की कमी नहीं है. शॉर्ट फिल्मों के अच्छे बाजार को देखते हुए ऐक्ट्रेस विद्या बालन ने रॉनी स्क्रूवाला के साथ शॉर्ट फिल्म 'नटखट' बनाई है. इसमें वे खुद मुख्य भूमिका में हैं.

निर्देशक शान व्यास ने अनुकंपा हर्ष के साथ इसकी कहानी लिखी है. इसकी खासियत है कि यह शॉर्ट फिल्म एक साथ कई सामाजिक मुद्दों पर बात करती है. इसमें समाज, पैतृक व्यवस्था, लैंगिक असमानता, बलात्कार, घरेलू हिंसा, पुरुषों के अवैध संबंधों पर रोशनी डाली गई है. इसमें मां-बाप की परवरिश को लेकर भी संदेश है जो झकझोरने वाला है. इस समय यह सबसे महंगी शॉर्ट फिल्म मानी जा रही है. क्योंकि, इसमें वीएफएक्स का इस्तेमाल हुआ है.

2 जून को न्यूयार्क में आयोजित वी आर वन-ए ग्लोबल फिल्म फेस्टिवल में इसका वर्ल्ड प्रीमियर हुआ. अतुल कहते हैं, 'कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिसे सेंसर बोर्ड की वजह से फीचर फिल्मों में उठाने में फिल्ममेकर को परेशानी आती है. लेकिन शॉर्ट फिल्मों में सेंसर का झंझट नहीं है. सेल्फ सेंसर से काम चल जाता है और मुद्दों को कहना आसान हो जाता है.

शॉर्ट फिल्में अब घाटे का सौदा नहीं है. कम पैसे में फिल्में बन जाती हैं. यूट्यूब सरीखे कई डिजिटल प्लेटफार्म हैं जहां ऐसी फिल्में रिलीज हो जाती हैं. यूट्यूब से पैसे भी मिल जाते हैं. शॉर्ट फिल्में कम बजट में बन जाती हैं. अच्छी कहानी हो तो कहना ही क्या है.' समाज और आम आदमी के रिश्तों को लेकर बन रही है शॉर्ट फिल्में और उसे नए जमाने के दर्शक भी मिल रहे हैं.

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