एडवांस्ड सर्च

Advertisement

यह गूढ़ ज्ञान लिए बिना न उतरें नेताओं की सोशल छवि चमकाने के धंधें में

सोशल मीडिया के महारथियों की चुनावी मौसम में पूंछ बढ़ जाती है, नेताओं के ऑफर भी जमकर मिलते हैं..ऐसे में इस धंधे से जुड़ी कुछ गूढ़ बातें जाननी जरूरी हैं.
यह गूढ़ ज्ञान लिए बिना न उतरें नेताओं की सोशल छवि चमकाने के धंधें में सोशल मीडिया
सुशांत झा 09 July 2018

लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है नेताओं की सोशल मीडिया पर सक्रियता वैसे-वैसे उफान मार रही है. जिन नेताओं के सोशल मीडिया हैंडिल पिछले चार सालों से 'धीमी गति का समाचार' बने हुए थे वो अब प्राइम टाइम न्यूज बनना चाहता है.

अब ऐसे में नौजवानों-नवयुवतियों की पूछ बढ़ी है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं या जिन्हें उसकी समझ है. हमने इस आलेख में इस धंधे से जुड़ी कुछ गूढ़ बातों को पकड़ने की कोशिश की है:

1. रेट क्या होना चाहिए? रेट फिक्स नहीं है-ये नेताओं की हैसियत और समझदारी पर तय है. हर धंधे की तरह डिमांड-सप्लाई का हिसाब है और इस पर भी तय करता है कि करनेवाला कितना मजबूर है या कितना समझौता-पटु है!

2. चूंकि यह एक अनिश्चित और अल्पकालीन कर्म है जिसका दीर्घकालीन और घातक असर भी हो सकता है-तो ऐसे में इसका एक ऑपर्च्यूनिटी कॉस्ट होता है. यानी इसका औसत रेट अन्य धंधों की तुलना में कम से कम तीन गुना होना चाहिए. हालांकि ये आदर्श है!

3. चार साल पहले एक अमीर नेता ने मेरे एक दोस्त को 30,000/प्रति माह ऑफर किया था तो जिसमें सीमित पोस्ट और ट्वीट शामिल थे. मुझे लगा कि ठीक-ठाक है.

4. इस साल एक नेता ने मेरे दूसरे दोस्त को 1 लाख ऑफर किया जिसमें ग्राफिक भी शामिल है. सीमित पोस्ट, सीमित ट्वीट, सीमित वीडियो और सीमित ग्राफिक्स.

5. यूपी-बिहार के कई नेता 20 हजार प्रति माह देते हैं जिससे ट्विटर और फेसबुक पोस्ट में घातक गलतियां दिखती हैं. दरअसल, कृषि-अर्थशास्त्र की भाषा में इसे 'आजीविका कृषि' कहा जाता है  यों ऐसे काम कमअक्ल किस्म के अंधभक्त और कंवारे पार्टी कैडर किया करते हैं जिन्हें लगता है कि वे नेताजी के साथ किसी महान उद्येश्य में लगे हुए हैं.

लेकिन यह जोश एकाध साल में ढीला हो जाता है जब शादी होती है या परिवार बढ़ता है. वैसे भी, पैसा का गुणवत्ता से सनातन और घनघोर संबंध है.

6. सूत्र बताते हैं कि देश के एक खनिज सम्पन्न प्रांत के मुख्यमंत्री का सोशल मीडिया प्रोफाइल एक अंतर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर मशहूर कंसल्टेंसी ने साल 2016 में 15 करोड़ सालाना पर लिया था. बाद में एक होशियार पत्रकार ने उस एंजेंसी को 5 करोड़ सालाना पर बाहर कर दिया! जाहिर सी बात है कि एक मुख्यमंत्री के काम के लिए एक टीम चाहिए होती है. वो व्यक्तिगत पोस्ट जैसा नहीं होगा.

7. हर नेता का फंडा अलग-अलग होता है. अत्यधिक बुजुर्ग किस्म के लोग इस माध्यम को नहीं समझते चूंकि यह माध्यम ही अभी ठुमक चलत रामचंद्र की भूमिका में है. नौजवान नेताओं, कुछ बुजुर्ग लेकिन मानसिक रूप से जवान नेताओं को इसकी समझ है-वहां किसी की बात बन सकती है.

8.  चूंकि यह छवि निर्माण का धंधा है जिसमें किसी सोशल मीडिया कर्मी की सारी बौद्धिक ऊर्जा लग जाती है, तो इसका रेट ज्यादा होना चाहिए. यह किसी नेता की अरबों रु. की ब्रांडिंग को हैंडल करने का काम है. इसका मूल्यांकन घंटे के हिसाब से करना उचित नहीं है.

9. ऐसे में इस धंधे में आना है तो घनघोर मोलभाव करिए. इसे लघु-ठेका ही समझिए. भारत में यह मोटे तौर पर अभी भी असंगठित क्षेत्र है जिसके नियम कायदे तय होने बाकी हैं.

***

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay