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सिद्धू साहब, आपकी पॉलिटिक्स क्या है?

क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू को यह समझना होगा राजनीति कोई टीवी शो नहीं, यहां केवल तालियां ठुकवाने से काम नहीं चलता.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 19 February 2019
सिद्धू साहब, आपकी पॉलिटिक्स क्या है? नवजोत सिंह सिद्धू

पूर्व आक्रामक बल्लेबाज, वाचाल कमेंटेटर और फिर उसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)  के सांसद नवजोत सिंह सिद्धू टीवी पर अपने जुमलों, कहावतों के लिए बेहद मशहूर सितारे रहे हैं. पर इन दिनों उनके सितारे गर्दिश में आते नजर आ रहे हैं. हालांकि, नवजोत सिंह सिद्धू का क्रिकेटीय जीवन हो या सियासी सफर,विवादों ने उनका पीछा कभी नहीं छोड़ा. अपने क्रिकेटीय जीवन में उन पर हत्या के प्रयास का मामला बना और उस पर उन्हें हाल में राहत मिली है. क्रिकेट के मैदान पर भी उनके आक्रामक तेवर दिखते ही थे और भारतीय टीम के कप्तान मो. अजहरूद्दीन से उनकी कभी नहीं बनी. उनका संन्यास भी विवादों से भरा रहा था, जब वह कप्तान से झड़प के बाद इंगलैंड का दौरा बीच में ही छोड़कर आ गए थे.

यही सिद्धू, छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए तो उस समय भी उन्होंने एक किस्म का विवाद ही खड़ा किया था. दरअसल, कांग्रेस के महाधिवेशन में सिद्धू ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की तारीफों में जो जुमले पेश किए, असल में वो पहले भी सुना चुके थे. जब सिद्धू भाजपा में थे, उस वक्त साल 2013 में सिद्धू ने नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा था कि नरेंद्र भाई के जन्मदिन पर यहां (दिल्ली) आना ठीक वैसा ही है, जैसा ''कोई मिट्टी का ढेला गुलाबों की क्यारी में आ गया हो. जैसे कोई तिनका नर्मदा में बहता-बहता शिवलिंग के ऊपर टिक जाए.''

कांग्रेस के 84वें अधिवेशन में सिद्धू ने दोबारा उसी शेर का इस्तेमाल किया, जो उन्होंने कभी नरेंद्र मोदी के लिए कहा था. उन्होंने कहा, ''सिद्धू कांग्रेस अधिवेशन में ठीक वैसा ही महसूस कर रहा है, जैसे कोई तिनका नर्मदा में बहता-बहता शिवलिंग के ऊपर टिक जाए. वैसा सिद्धू महाकुंभ में आकर महसूस कर रहा है.''

लेकिन वही सिद्धू, जो भाजपा का पंजाब में जट सिख चेहरा थे, भाजपा से निकलकर कांग्रेस में गए. क्यों गए...इस पर काफी बातें हुई हैं. पर पुलवामा में सीआरपीएफ पर आतंकवादी हमले पर अपने बयान से सिद्धू फंस गए. आतंकी हमले पर उन्होंने कहा था, ''इस तरह के लोगों (आतंकवादियों) का कोई देश, धर्म और जाति नहीं होती है. चंद लोगों की वजह से पूरे राष्ट्र (पाकिस्तान) को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.''

नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस में शामिल होने के बाद से ही कभी टीवी शो में आने की वजह से तो कभी अपनी किसी और हरकत की वजह से साल 2018 में पंजाब की राजनीति के केंद्र में बने रहे. खासतौर पर, पाकिस्तान के लिए अपने नए प्रेम के चलते उन्होंने करीब पांच महीने तक राष्ट्रीय सुर्खियों में जगह पाई. मसला चाहे पाकिस्तानी क्रिकेटर और सियासतदान इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके शपथ ग्रहण में जाना हो, पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष को गले लगाना हो, या फिर करतारपुर कॉरीडोर पर उनका रुख.

सिद्धू पर उनकी पूर्व पार्टी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सियासी हमले तेज किए तो उनकी पार्टी कांग्रेस में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी उनपर तंज कसा. पिछले साल अगस्त में इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के साथ उनके गले मिलने पर केंद्रीय मंत्री द्वारा उन्हें देशद्रोही करार दिए जाने के बावजूद सिद्धू नहीं झुके.

हाल ही में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में 70 से ज्यादा चुनावी रैलियों को संबोधित करने के बाद अपनी आवाज खोने की कगार पर पहुंचे चुके सिद्धू ने पाकिस्तानी संबंधों पर उनके जुड़ाव को लेकर हमलावर हुए लोगों के खिलाफ आक्रामक रुख जारी रखा.

पूरे साल सिद्धू के अपने साथी कैबिनेट मंत्रियों के साथ विवाद होते रहे और उन्होंने अधिकारियों को उनकी जगह दिखाने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ा, जिसके चलते वे विवादों का कारण बनते रहे. ऐसा कहा जाता है कि वह इस बात को लेकर निराश हैं, क्योंकि जनता के बीच उनकी प्रसिद्धि के बावजूद पंजाब की सत्तारूढ़ कांग्रेस और राज्य सरकार से उन्हें वह स्थान नहीं मिला, जिसके वह हकदार हैं.

सिद्धू ने हाल ही में हैदराबाद में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान अमरिंदर सिंह के नेतृत्व पर सवाल उठाकर एक नए विवाद को जन्म दे दिया था. इस विवाद के कारण कम से कम छह कैबिनेट मंत्रियों ने उनसे इस्तीफे की मांग की. विवाद तब थमा जब अमरिंदर ने मसले को ज्यादा तरजीह नहीं दी और सिद्धू ने अपने बयान को पलटते हुए अमरिंदर को ''पितातुल्य'' बताया.

थोड़ा पीछे चलते हैं. नवजोत सिंह सिद्धू 2004 में चुनावों से ऐन पहले भाजपा में शामिल हुए थे. उनके लिए अमृतसर की सीट भी पक्की थी. भाजपा यह मानकर चल रही थी कि कांग्रेस के गढ़ अमृतसर में कांग्रेस को मात देने के लिए कोई पंजाबी चेहरा चाहिए होगा, जो मशहूर भी हो. अमृतसर सीट पर 1991, 1996 और 1999 में कांग्रेस के रघुनंदन लाल भाटिया का कब्जा रहा था. भाजपा एक बार सिर्फ 1998 में ही यहां जीत हासिल कर पाई थी.

भाजपा को पंजाब में हिंदुओं की और उस पर भी बनियों की पार्टी माना जाता था. सिद्धू के आने से वह कमी दूर हो रही थी. भाजपा को लग रहा था कि अमृतसर में खेल सिर्फ खिलाड़ी सिद्धू ही कर सकते हैं. और ऐसा ही हुआ भी.

2004 में जब भारत उदय का नारा नाकाम हो गया, तो भी अमृतसर में सिद्धुइज्म चल निकला. सत्ताधारी कांग्रेस के नाक के नीचे से सिद्धू अमृतसर ले उड़े. दिसंबर, 2006 में सिद्धू को रोड रेज वाले पुराने मामले में तीन साल की जेल की सजा हुई. उन्होंने नियमों के मुताबिक लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. फिर सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अर्जी पर सुनवाई करते हुए सजा निरस्त कर दी. अगले बरस पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए. प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन सत्ता में लौटा. अमृतसर लोकसभा सीट पर भी उप-चुनाव हुए. तब सिद्धू ने पंजाब सरकार में वित्त मंत्री सुरिंदर सिंगला को 77 हजार वोटों से हराया.

उसके बाद से ही सिद्धू अपनी पार्टी से नाराज चलने लगे थे. उन्हें ऐसा महसूस होने लगा था कि पार्टी उनका इस्तेमाल वोट खींचने के लिए तो करती है मगर पद के मामले में उनकी अहमियत न के बराबर है. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस का बोलबाला रहा. मगर सिद्धू जीत में अंतर कम होने के बावजूद अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे.

सिद्धू ने जून 2013 में नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान में पठानकोट रैली से नदारद रहना मुनासिब समझा. तब के पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की अमृतसर रैली में भी वे गायब रहे. अरूण जेटली ने लोकसभा चुनाव में अपने लिए अमृतसर सीट की फरमाइश कर दी, जो मान भी ली गई. पर इससे सिद्धू को नाराज होना लाजिमी भी था. पर इसके बाद से नवजोत सिंह सिद्धू के तेवर तीखे होते चले गए. कभी उनके आम आदमी पार्टी में शामिल होने के चर्चे हुए तो कभी पंजाब भाजपा अध्यक्ष बनाने के. पर सिद्धू को भाजपा आलाकमान ने राज्यसभी की सीट ऑफर की और वह मान भी गए.

लेकिन उसके कुछ ही महीनो बाद सिद्धू ने भाजपा छोड़ दी और कांग्रेस का दामन पकड़ लिया. शायद कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह की छाया तले भी सिद्धू अपने लिए कुछ बड़ा चाहते थे. शायद, पंजाब के उप-मुख्यमंत्री का पद. लेकिन विधानसभा चुनाव कैप्टन ने अपने दम पर जीता था. सो कैबिनेट बनाते वक्त भी उनकी ही चलनी थी. प्रतिद्वंद्वी सिद्धू को पर्यटन मंत्रालय सौंपा गया.

सिद्धू टीवी पर आते रहे, बातें करते रहे, बयान देते रहे. पर पुलवामा हमले के बाद उनके बयान ने उनकी उस टेक को सहारा ही दिया है जिसमें उनकी छवि पाकिस्तान प्रेमी नेता की हो गई है. करतारपुर गलियारे में उनकी सक्रियता हो या इमरान के शपथ ग्रहण में उनका जाना और जनरल बाजवा को गले लगाना... सोशल मीडिया की यादद्दाश्त में सब कुछ है. सिद्धू ट्रोल हुए और अफवाहें उड़ रही हैं कि एक निजी टेलिविजन पर आऩे वाले कपिल शर्मा के शो में से उनका पत्ता साफ हो गया है.

बहरहाल, सिद्धू को टीवी पर तालियां ठुकवाने के लिए खड़काने वाली बातों के साथ राजनीति और कूटनीति को टीवी शो से अलग करना होगा. अगर वह पंजाब या राष्ट्रीय राजनीति में अपने लिए कोई बड़ा स्थान चाहते हैं तो उन्हें थोड़ी राजनीतिक कूटनीति सीखनी होगी. वरना उनकी छवि चर्चा में बने रहने के लिए विवादित और कभी-कभी अनर्गल बयान देने वाले की भी बनती जा रही है.

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