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लाखों शिव भक्तों की आस्था पर कलंक लगाते कुछ हुड़दंगी

हजारों-लाखों भक्तों की आस्था पर कुछ हुड़दंगियों की वजह से सवाल उठाना क्या ठीक है? कुछ कथित सेक्यूलर-लिबरल तो कांवडियों के हुड़दंग और आक्रामकता को सीधे 'भगवा रंग' और 'गुंडई' से जोड़ देते हैं. भगवा रंग हिंदुओं की आस्था का रंग है. इसे हिंसा का रंग बनाना एक तरह का अतिवाद ही है.
लाखों शिव भक्तों की आस्था पर कलंक लगाते कुछ हुड़दंगी कांवड़ यात्रा
सुशांत झा 10 August 2018

हमारे इलाके और दिल्ली के आसपास के कांवड़ यात्रा में फर्क है. मैं सुल्तानगंज से देवघर तो कांवड़ लेकर कभी नहीं गया लेकिन मेरे गांव से हर साल सैकड़ों लोग जरूर जाते हैं. कई तो पिछले पचास साल से जा रहे हैं. एक मुसलमान था उतिमलाल-लकड़ी का व्यापारी वो भी कई साल तक गया.

भोलेनाथ से संतान मांगने जाता था. उस जमाने में हिंदू भी ताजिए के जुलूस में अपनी औकात के हिसाब से एक रूपया या दो रुपया चढ़ावा देते थे. मेरे गांव में अभी भी एक विषहरा मंदिर है, जहां पर एक बाला 'पीर' स्थापित हैं. उनकी भी पूजा होती है. पता नहीं कब से स्थापित हैं. किसी को खास उनके बारे में नहीं पता.

लेकिन दिल्ली आकर पहली बार हमें लगा कि इधर की कांवड़ यात्रा और देवघर वाले में भारी फर्क है. आस्था की जगह आक्रामकता, शालीनता की जगह दंबगई और नियम-निष्ठा की जगह पैरों में मंहगे जूते पहली बार देखे.

और साथ में कानफाड़ू डीजे! एक यूपी के दोस्त ने मजाक में कहा कि बिहार में कच्ची सड़कें होंगी तो पैर नहीं जलता होगा और फफोले नहीं पड़ते होंगे. ये दिल्ली-हरियाणा और एनसीआर का इलाका है-गर्मी ज्यादा है. पैर जल जाते हैं-इसीलिए जूते पहनते हैं!

लेकिन डीजे? हंगामा? मारपीट? हालांकि पैर जलने और फफोले न पड़ने की बात तथ्यहीन है- हमलोग बचपन से सुल्तानगंज के रास्ते सुइया-पहाड़ की कहानी सुनते थे और सड़कें भी बन ही गई थीं.

जो लोग देवघर से आते थे वे अपने साथ आस्था, समपर्ण, तकलीफ और रास्ते भर लोगों द्वारा की जानेवाली स्वत:स्फूर्त सेवा की कहानी सुनते थे. पता नहीं कितने लोकगीत और कितनी लोककथाएं उस यात्रा के इर्दगिर्द रची गईं.

कितने स्थानीय लोक गायक पैदा हो गए. इधर दिल्ली में एक वीडियो तैर रहा है जिसमें कांवड़िये एक गाड़ी को पीट रहे हैं. कहते हैं कि किसी महिला से कहा-सुनी हो गई. महिला ने थप्पड़ मार दिया!

पता नहीं सचाई क्या है, लेकिन कांवड़ियों को गाड़ी तोड़ते हुए देखा जा रहा है- ये सच है. पता नहीं सुल्तानगंज से जाते हुए किसी कांवड़ियों ने कब किसी गांड़ी का शीशा तोड़ा होगा!

ये बात ठीक है कि देवघर की कांवड़ यात्रा की तुलना दिल्ली जैसे घने शहर से करना ठीक नहीं- जहां हर रोज कथित सभ्य लोग ही रोडरेज करते रहते हैं-लेकिन इतना जरूर है कि देवघर की कांवड़ यात्रा में जो आध्यात्मिकता, सात्विकता और समर्पण है- वो दिल्ली-एनसीआर वालों में नहीं है.

तो क्या एक गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े इलाके में अपने ईश्वर के प्रति ज्यादा समर्पण है और ज्यादा आध्यात्मिकता है? क्या आर्थिक रूप से समृद्ध पश्चिमी यूपी, हरियाणा और दिल्ली- एनसीआर में वो आध्यात्मिकता इसलिए 'मैसकुलिनीटी' में तब्दील हो गई है क्योंकि समाज का पुराना ढांचा टूट रहा है?

घनघोर शहरीकरण में जहां हर व्यक्ति पराया है, अलग वर्ग का दिखता है, ग्रामीण लोगो के लिए 'शहराती' है और झुंड में होने की वजह से वो हिंसक हो जाता है?

क्या ये कथित आधुनिकता लोगों को हिंसक बना रही है जिसके बारे में गांधीजी ने कहा था कि यह 'एक विचार' के तौर पर अच्छा प्रतीत होता है!

कहने का मतलब ये नहीं कि कांवड़ियों में आस्था बिल्कुल नहीं होती. कांवड़ियों का उपद्रवी वर्ग समूचे कांवड़ियों का बहुत ही छोटा सा हिस्सा है. लेकिन ये बात भी सच है कि एक भरे हुए घड़े से पानी निकालने के लिए एक छोटा सा छेद ही काफी होता है!

लाखों शिव-भक्तों की आस्था को ये कुछ मवाली किस्म के कांवड़िये मिनटों में पंक्चर कर डालते हैं. विश्लेषण के दूसरे अतिवादी बिंदु पर कुछ कथित सेक्यूलर-लिबरल खड़े हैं तो कांवडियों के हुड़दंग और आक्रामकता को सीधे 'भगवा रंग' और 'गुंडई' से जोड़ देते हैं.

भगवा रंग का हिंदू धर्म और परंपरा में एक खास स्थान है ऐसा लिखते समय लोगों की भावना का ख्याल रखा जाना चाहिए. कोई अगर नास्तिक है तो वो उसका चुनाव है, उसे किसी के मजाक उड़ाने का अधिकार नहीं है.

मैं जब देवघर और दिल्ली-एनसीआर की कांवड़ यात्रा का विश्लेषण करता हूं तो मुझे भारत के नक्शे पर पूर्वी और पश्चिमी इलाके खासकर उत्तर-पश्चिमी इलाके की तुलना बार-बार जेहन में आ जाती है, उत्तर-पश्चिमी भारत में जो एक खास किस्म की मैसकुलिनीटी है, अहंकार के हद तक पौरुष के प्रदर्शन की इच्छा है-वो पूरब में नहीं है.

शायद इसीलिए अंग्रेजों के जमाने से लेकर अब तक सेना में भरती होने वाले ज्यादातर लोग इधर के ही हैं. उस इलाके का विस्तार पाकिस्तान के पंजाब और आप चाहें तो अफगानिस्तान तक कर सकते हैं.

लेकिन पूरब में ऐसा आपको नहीं मिलेगा. धीरे-धीरे आपको मातृ-प्रधानता, शाक्त मत को मानने वाले और पूर्वोत्तर में स्त्री प्रधान समाज तक मिल जाएगा. काला जादू करनेवाली 'बंगालनों' के किस्से आपने सुने है?

ओशो के हवाले से कहें तो बुद्ध ने कभी कहा कि वे स्त्रैण स्वभाव के हैं! ज्यादातर चतुर-सुजान वो बात समझ नहीं पाए. उस संदर्भ में देवघर की कांवड़ यात्रा का विश्लेषण कीजिए आपको वो आक्रामक मैसकुलिनीटि और पौरुष का अहंकार वहां नहीं दिखेगा जो दिल्ली एनसीआर में दिख जाता है.

कुछ लोग इन हरकतों को हिंदुत्ववादी शक्तियों के उभार और बीजेपी के शासन से जोड़कर देखते हैं. ये आधा सच है और आधा तथ्यहीन है. आधा तथ्यहीन इसलिए कि कांवड़िये कांग्रेस के राज में भी उग्र थे और कल बीजेपी सत्ता से बाहर भी चली गई तो उनके रुख में बदलाव आने की संभावना कम ही है.

आधा सच इसलिए कि हिंदुत्व के उभार में जो कई सारे तत्व हैं, उनमें हिंदुओं का एक आक्रामक भीड़ के रूप में इकट्ठा होना, हिंसा पर उतारू होना पिछले कुछ दशकों की घटना है और जिसमें बढ़ोत्तरी हुई है.

बीजेपी का सत्ता में होना उसे अतिरिक्त बल देता है, लेकिन वो सम्पूर्ण कारण नहीं है. इस देश में पिछली कई शताब्दियों से बहुसंख्यक हिंदुओं पर गैर-हिंदुओं के शासन के बाद एक विराट हिंदू आकांक्षा पहली बार अपने कच्चे-पक्के स्वरूपों में अभिव्यक्ति ले रही है जिसका विद्रूप हमें कांवड़ियों के हुड़दंग में भी दिखता है और कथित गौरक्षकों की हिंसा में भी.

जब मैं पिछली कई सदियों की बात करता हूं तो उसमें करीब छह सौ साल के मुस्लिम शासन और डेढ़-दो सौ सालों का अंग्रेजी शासन भी है. आप गौर कीजिए ये हुड़दंग उसी इलाके में ज्यादा है जहां मुस्लिम शासन अपने वास्तविक, सघन और कई बार क्रूरतम स्वरूप में विद्यमान था.

सैकड़ों सालों के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि खासकर उत्तर भारत के हिंदू जहां उनकी एक भी पुरानी इमारतें या उपासना-स्थल दो-तीन सौ सालों से ज्यादा पुरानी नहीं बची हैं- पहली बार इतने उद्दाम, स्वतंत्र और कई बार अराजक तरीके से अपनी यात्राएं, जुलूस, धार्मिक आयोजन और मंदिर निर्माण कर पा रहे हैं.

ऐसा अंग्रेजी राज तक संभव नहीं था. ऐसा आजादी के बाद ही संभव हो पाया और वो बीजेपी के शासन में अपने उग्र स्वरूप में सामने है. ये बात सही है कि धार्मिक जुलूस या हिंसा के नाम पर अराजकता या हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन जब तक हम उसके मूल कारण में नहीं जाएंगे-उसे रोक पाना संभव नहीं है.

इसके अन्य कारण सरकारों की अनिच्छुकता, वोट बैंक, आदिम जमाने का पुलिस तंत्र और समाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में आये बदलाव हो सकते हैं, लेकिन अगर इसे सिर्फ भगवागुंडई कहकर सरलीकृत किया गया तो यकीन मानिए वो समस्या का समाधान तो बिल्कुल नहीं है.

ये सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि कांवड़ियों में जो उपद्रवी तत्व हैं, उन पर कानून सम्मत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और यात्रा के पूरे रास्ते पर सुरक्षा बलों की तैनाती होनी चाहिए.

सवाल हिंदुओं के धार्मिक और आध्यामिक नेताओं से भी है कि क्या उनका प्रभाव समाज में इतना भी नहीं है कि वे इन यात्राओं को शांतिपूर्वक चलाए जाने की अपील कर सकें? आखिर ऐसी आवाजें कहां हैं?

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप में सोशल मीडिया टीम का हिस्सा हैं.

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