एडवांस्ड सर्च

विश्व हिंदी सम्मेलन क्या पिकनिक मनाने की जगह है?

 विश्व हिंदी सम्मेलन में कौन जाता है...क्या इससे हिंदी को कुछ फायदा भी होता है. या सिर्फ इसके नाम पर कुछ लोग पिकनिक मनाने जाते हैं? हिंदी को कैसे संयुक्त राष्ट्र तक ले जाया सकता है और हिंदी माध्यम में पढ़ाई अलोकप्रिय क्यों है. इन सब पर टिप्पणी कर रही हैं डेनमार्क में बीस साल से रह रही अर्चना पैन्यूली, जो हिंदी की ख्यातिलब्ध साहित्यकार भी हैं. इस संस्मरण में मॉरीशस में हुए ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन पर उनकी टिप्पणियां बेहद दिलचस्प हैंः

Advertisement
Sahitya Aajtak 2018
अर्चना पैन्यूलीNew Delhi, 28 August 2018
विश्व हिंदी सम्मेलन क्या पिकनिक मनाने की जगह है? विश्व हिंदी सम्मेलन

ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन का अर्चना पैन्यूली का संस्मरणः

हिंद महासागर में एक आकर्षक द्वीप पोर्ट लुई, मॉरीशस में, विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के नेतृत्व में ग्यारवां विश्व हिन्दी सम्मेलन सम्पन्न हुआ. सम्मेलन का मुख्य विषय 'हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति' और उद्देश्य ' वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा की पहुंच बढ़ाना' का रहा. भारतीय दूतावास, डेनमार्क ने मुझे इस सम्मेलन में डेनमार्क के प्रतिनिधि के रूप में भेज कर यह सुनहरा अवसर दिया, जिसके लिए मैं दूतावास की अत्यंत आभारी हूँ। यह मेरे लिए विशेष  गर्व का विषय व मेरे लेखन कर्म की सार्थकता है.

मंत्री, संस्थापक, प्रतिनिधि, अध्यापक, साहित्यकार, भाषातत्वज्ञ, फिल्मकार, प्रकाशक, पत्रकारिता, प्रौद्योगिकी हर क्षेत्र से संबंधित भारत के हर राज्य और अनेक देशों से एक विशाल जनसमूह मॉरिशस के स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में एक छत तले एकत्र हुआ. उद्घाटन सत्र  के तुरंत बाद अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि सत्र रखा गया. दो मिनट का सामूहिक मौन रखा गया. मॉरीशस के प्रधानमंत्री घोषणा ने की कि मॉरीशस के साइबर टॉवर को अब अटल बिहारी वाजपेयी टावर के नाम से जाना जाएगा.  

तीन दिवसीय सम्मेलन के दौरान 'हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति' पर आठ उप-विषयों पर विचार-विमर्श हुआ. विभिन्न आयामों में हिन्दी की स्थिति पर जम कर चर्चा हुई. 18 अगस्त और 19 अगस्त को चार-चार विभिन्न विषयों पर तीन-तीन घंटे के समानांतर सत्र चले. प्रतिभागियों ने अपनी-अपनी रुचि से सत्रों का चयन लिया. सभी सत्र समानांतर चल रहें थे, सो सभी में भाग लेना संभव नहीं था.  मैंने 18 अगस्त को 'प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं का विकास' के सत्र में भाग लिया, जिसकी अध्यक्षता गृह राज्यमंत्री किरेन रिजीजू  ने की. सह अध्यक्ष अशोक चक्रधर थे. 19 अगस्त को मैंने 'प्रवासी संसार : भाषा और संस्कृति' में भाग लिया, जिसके अध्यक्ष डा कमल किशोर गोयनका और सह अध्यक्ष श्री गुलशन सुखलाल थे.

18 अगस्त को रात्रि भोजन उपरान्त अपने होटल में सुषमा स्वराज विदेश से आये चालीस प्रतिनिधियों से व्यक्तिगत तौर पर मिलीं. ढाई घंटे के सत्र में सभी प्रतिनिधियों ने एक-एक करके उन्हें बताया कि वे अपने-अपने मुल्कों में हिन्दी के उत्थान, प्रचार-प्रसार में क्या भूमिका निभा रहे हैं. सुषमा स्वराज ने सभी को बड़े धैर्य और दिलचस्पी से सुना. चीनी, जापानी, इण्डोनेशियन, जर्मनी, इटालियन, हंगेरियन, फिजी आदि विदेशियों के मुख से धाराप्रवाह अपनी राष्ट्र भाषा हिन्दी सुनना रोचक लगा. यह एक विलक्षण अनुभव था.

उनके कार्यों के सन्दर्भ में जानकार सुखद आश्चर्य हुआ. कोई हिन्दी का नया पाठ्यक्रम बना  रहा है, तो कोई हिन्दी व्याकरण की नई किताब लिख रहा है तो कोई हिन्दी का नया शब्दकोश तैयार कर रहा है तो कोई भारतीय संस्कृति और दर्शन फैला रहा है. कोई अपने देश के स्कूलों में हिन्दी को फ़्रांसिसी, जर्मनी और स्पेनिश भाषाओं का समकक्ष दर्जा दिलाने में प्रयत्नशील है.       

मुद्दे जो उठे

सुषमा स्वराज ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि हिंदी को बढ़ाने की जिम्मेदारी भारत की है, और जहां तक हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने का है, उसमें मुख्य समस्या यह है कि समर्थक देशों के सम्बन्धित व्यय वहन करना होगा. यदि सिर्फ भारत को व्यय वहन करना होता तो 400 करोड़ रूपए देकर भी हम उसे हासिल कर लेते. उन्होंने उम्मीद जताई कि जब योग दिवस के लिए भारत 177 देशों का समर्थन हासिल कर सकता है तो सयुंक्त राष्ट्र की भाषा के लिए 129 देशों का समर्थन भी वह हासिल कर लेगा. वैसे हम सभी भारतीयों के लिए यह गौरव की बात है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने ट्विटर पर हिंदी में अपना अकाउंट बनाया है और हिंदी भाषा में साप्ताहिक समाचार प्रसारित होने लगे हैं. स्वराज ने सम्मेलन लोगो पर बनी एनिमेशन फिल्म का हवाला देते हुए कहा कि भारत का मोर आएगा और डोडो को बचाएगा. इस फिल्म में दिखाया गया है कि मॉरीशस का राष्ट्रीय पक्षी जब डूबने लगता है तो भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर आकर उसे बचाता है, फिर दोनों नृत्य करते हैं. बहुतों को भारतीय मयूर और डोडो पक्षी की यह एनीमेशन क्लिप बचकानी लगी.      

'प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं का विकास' के सत्र में हिन्दी और भारत की अन्य भाषाओं को हाईटेक बनाने की जोरदार चर्चा हुई. गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजु ने कहा कि नई पीढ़ी के लिए भाषा का डिजिटल विकास होना अनिवार्य है. प्रौद्योगिकी अगली पीढ़ी के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है.  ई-शिक्षण, ई-पाठशालाएं आज समय की मांग हैं.  

सॉफ्टवेयर के निष्णात बालेन्दु दाधीच ने भाषाओं के भाषा का डिजिटलकरण  का प्रभावशाली प्रेजेंटेशन दिया.

'प्रवासी संसार : भाषा और संस्कृति' सत्र के दौरान महात्मा गांधी संस्थान के अध्यक्ष गुलशन सुखलाल ने कहा वे एक मॉरेशियन हैं, उन्हें गिरमिटिया न कहा जाए और न ही मॉरीशस में लिखे हिन्दी साहित्य को प्रावासी साहित्य कहा जाए. मॉरीशस में लिखा हिन्दी साहित्य इसी प्रकार है जो ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमेरिका, इंग्लैंड के निवासियों द्वारा लिखा साहित्य सिर्फ अंगरेजी साहित्य कहलाया जाता है, साहित्य की यह खेमेबाजी वहां नहीं है.  सुखलाल ने सम्मेलन के लोगो पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि सम्मेलन मॉरीशस में हो रहा है और सम्मेलन का लोगो तय करने के लिए उनकी राय नहीं ली गई. डोडो को तो विलुप्त हुए तीन सौ वर्ष से अधिक हो चुके हैं, इस लोगो का क्या तात्पर्य. मगर मैं यहाँ पर यह कहना चाहूंगी कि मॉरीशस द्वीप विलुप्त हो चुके डोडो पक्षी के अंतिम और एकमात्र घर के रूप में भी विख्यात है, सो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की व्याख्या निरर्थक नहीं थी.   

मुद्दे जो नहीं उठे  

सम्मेलन में कई मुद्दे उठे तो कई मुद्दे नहीं उठे. बहुत अधिक भीड़ थी, लगभग दो हजार हिन्दी विद्वान और प्रेमी थे. सभी का बोलने का अवसर मिलना नामुमकिन था, फिर भी कुछ वक्ता मंच पर फालतू की बकवास कर गये, कुछों के सारगर्भित विचार उनके अधरों पर ही ठिठके रहे.

बहरहाल तथ्य यह है कि मॉरीशस में हिन्दी बोलने वालों की संख्या निरंतर घट रही है. स्वयं मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ हिन्दी नहीं बोल पाए. हालांकि मेरी कई स्थानीय लोगों से मुलाकात हुई जो हिंदी बोलते हैं, मगर सरकारी आंकड़े बताते हैं मॉरीशस में हिन्दी बोलने वालों की संख्या निरंतर घट रही है, और आज यह वहां की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की क्षेणी में आ गई है. 

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक खबर के अनुसार, भारत में, विशेषकर हिन्दी बोलने वाले राज्यों में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में छात्रों का नामांकन पिछले पांच साल में दोगुना हो गया है. अगर यही हिसाब रहा तो 2050 तक अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में छात्रों का नामांकन बढ़कर 70 फीसदी तक हो जाएगा. देश में अंग्रेजी और फलेगी-फूलेगी. साहित्यकार हरजेन्द्र चौधरी ने इस सन्दर्भ में कहा कि भाषा भावुकता नहीं, यथार्थ है. जब तक कोई भाषा रोजगार की भाषा नहीं बनेगी लोग इसे अपनाएंगे नहीं. 

अगर यह मान लिया जाए कि अंग्रेजी, फ्रांसीसी, स्पेनिश भाषाएं अपने औपनिवेशिक शासन की वजह से विभिन्न देशों में छाई है, मगर मंदारिन, जापानी और अरबी भाषाएं तो अपनी संस्कृति के दम पर आगे बढ़ी हैं. व्याकरण सम्मत, विशिष्ट लिपि और विशाल शब्दकोश वाली हिन्दी, एक इतने बड़े राष्ट्र और समुदाय की भाषा होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर वह महत्व नहीं पा सकी जो अन्य भाषाओं को सहज ही मिल गया. इसके लिए हम सभी दोषी हैं. मैंने सम्मेलन में भारत से आये 20-25 प्रतिभागियों से पूछा कि उनके बच्चे किस माध्यम वाले स्कूलों में पढ़तें हैं. सभी का जवाब था - अंग्रेजी माध्यम में. हिन्दी माध्यम वाले स्कूलों में वे बच्चे हैं, जो अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों का खर्चा उठा नहीं सकते या सुदूर ग्रामीण इलाकों में जहां उन्हें अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल सुलभ नहीं हैं.

देखा जाए कि आज हमारी राष्ट्र भाषा का असली दारोमदार गरीबों के कंधों पर है. बॉलीवुड फिल्मों और हमारे धर्मग्रंथों, पूजा-पाठ ने हिन्दी को कुछ महत्व दे रखा है, नहीं तो हिन्दी चौपट हो रही है. जड़ें तो खोखली हो रही हैं और हम ऊपर ही ऊपर देख रहें हैं. अपना अस्तित्व बचाने के लिए कई सरकारी स्कूलों ने भी अंगरेजी माध्यम अपनाने का फैसला कर लिया है. 

सम्मेलन की व्यवस्था 

इसमें कोई शक नहीं कि सम्मेलन की व्यवस्था संभालने वाले आयोजक और कार्यकर्ता दिन-रात तन-मन से जुटे थे, पर ऐसा महसूस हुआ कि मॉरीशस इतनी बड़ी तादाद में प्रतिभागियों का प्रबंध करने में सक्षम नहीं था. मैनपावर की कमी लगी. सबसे अधिक गड़बड़ सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले लोगों के पंजीकरण में हुई. तकनीकी  गड़बड़ी से कईयों का पंजीकरण ऑनलाइन हो ही नहीं पाया, जिससे उन्हें दिक्कत हुई. रिसेप्शन काउन्टर पर बैठे आयोजकों को मालूम ही नहीं था कि किन्हें प्रतिनिधि सदस्य, विशेष आमंत्रित या फिर साधारण प्रतिभागी की श्रेणी में रखना है. अपनी-अपनी पंजीकरण हैसियत के अनुसार सभी को नारंगी, हरे, पीले और नीले रंग के बैज (बिल्ले) बंट रहें थे. बैज के रंग के निर्धारण का मानदंड समझ में नहीं आया, क्योंकि कई प्रतिभागी जो एक जैसी प्रष्ठभूमि के थे, एक जैसी हैसियत रखते थे, उन्हें अलग अलग रंग के बैज मिले. विभिन्न देशों से पधारे कुछ सरकारी प्रतिनिधियों को भी अलग अलग रंग के बैज मिले.  पंजीकरण करने वाले लोगों के पास इसका कोई जवाब नहीं था.

खैर बैज बिना गले में लटकाए कार्यक्रम में उपस्थित होने की अनुमति नहीं थी, और बैज के रंग के अनुसार हॉल में बैठने का स्थान और भोजन पांडाल में घुसने की इजाजत थी. नारंगी बैजधारी (प्रतिनिधि सदस्य), हॉल की अग्रिम सीटों पर विराजमान, फिर हरे बैज वाले (विशेष आमंत्रित), फिर सबसे अंत में नीले बैजधारी (सामान्य प्रतिभागी), जिनकी संख्या सबसे अधिक थी.

चाय-पानी और भोजन के दो पांडाल थे. नारंगी बैजधारी बेहतर पांडाल पर, जहां भीड़ कम, व्यवस्था अच्छी. इस पांडाल में हरे और नीले बैजधारियों का प्रवेश निषिद्ध था. दूसरे पांडाल, जो हरे और नीले बैजधारी, यानी सामान्य प्रतिभागियों के लिए था, में जो खाने के लिए लम्बी कतार, भीड़-भड़का रहती थी, कई बार प्रतिभागियों ने एक प्याली ठंडी चाय के लिए लम्बी कतार में लगना मुनासिब नहीं समझा. वे बिना चाय-पानी के रहे.

पिछले बीस वर्षों से डेनमार्क में रहने की वजह से मुझे इस तरह का भेदभाव अखर गया. यहां किसी भी स्तर के कार्यक्रम में कम से कम खाने-पीने की व्यवस्था सभी के लिए एक जैसी रहती है, भले ही दस पांडाल लगाने पड़ जाएं. चाहे राजा हो या रंक, कोई भेदभाव नहीं. कोई कहीं भी जाकर बैठ कर खा सकता है.

सम्मेलन की मां

सम्मेलन के अंतिम दिन, सोमवार, 20 अगस्त को समापन समारोह में भारत और मॉरिशस के कई मंत्रियों की भागीदारी रही.  सम्मेलन के दौरान हिन्दी के प्रसार के लिए आठ अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयी.

मॉरीशस के कार्यवाहक राष्ट्रपति परमशिवम पिल्लई व्यापुरी ने कहा है कि हिन्दी विश्व शांति को सुदृढ़ बनाएगी. पुरस्कार प्राप्तकर्ता अधिकतर विदेशी और भारत के अहिन्दी भाषी प्रदेशों के थे. हिन्दी उनकी मातृभाषा न होते हुए भी उन्होंने हिन्दी को गले लगाया है, सम्भवतः इसको ध्यान  में रख कर उन्हें सम्मान दिया गया। खैर फिजी से आये एक पुरस्कार प्राप्तकर्ता - नेमानी आदिवासाई इतने अधिक भावुक हो गये कि जब उन्हें पुरस्कार मिला तो वे लम्बे-चौड़े इंसान सुषमा स्वराज के चरणों पर पालथी मार कर बैठ गये. उनका कहना था कि फिजी सम्मान की अपनी प्रथा पालन करने के लिए नीचे बैठे.

 मुझे भी व्यक्तिगत तौर पर सुषमा स्वराज के व्यक्तित्व ने अत्यधिक प्रभावित किया. उनका हिन्दी भाषा पर अधिकार, उनकी भाषण देने की कला इतनी अधिक प्रभावशाली है कि जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है. यह मेरा अहोभाग्य कि सुषमा स्वराज जैसी विदुषी से संवाद का मुझे अवसर मिला. हिन्दी जगत में अपने-अपने क्षेत्र के महारथी, स्वनामधन्य अशोक चक्रधर, डॉ कमल किशोर गोयनका, डॉ विमलेश कांती, डॉ हरिमोहन, नरेंद्र कोहली, चित्रा मुद्गल, डॉ आनन्द वर्धन शर्मा आदि को देखने-सुनने का मौक़ा मिला. मेरी साहित्यिक सहेलियाँ - नीदरलैंड से आयी डा पुष्पिता अवस्थी, अमेरिका से आयी मृदुल कीर्ति, संयुक्त अरब अमीरात से आयी पूर्णिमा वर्मन और भारत से पधारी डॉ विजया सती, आदि से आत्मिक भेंट हुई.

सम्मेलन में मेरी मुलाक़ात कई ऐसे लोगों से भी हुई जिनका हिन्दी से कोई मतलब नहीं था. ऐसा लगा वे अपने परिवार व दोस्तों के साथ एक साहित्यिक पिकनिक में मॉरिशस में आए हैं. भारत में बहुत सारे टूर ग्रुप निर्मित हो गये हैं जो लोगों को इकट्ठा कर दुनिया की सैर करवाते हैं. सभी को सम्मेलन में भाग लेना मुफ्त नहीं पड़ा. कई लोग अच्छा-खासा धन व्यय करके, अपने खर्चे से सम्मेलन में हिस्सा लेने आए. हवाई टिकट, होटल वगैरह का व्यय उठाने के अतिरिक्त उन्होंने सम्मेलन में पंजीकरण शुल्क पांच हजार रुपया शुल्क भी अदा किया.  खैर इस सन्दर्भ में मेरा मानना है कि हमें सिर्फ हिन्दी विद्वानों और साहित्यिक हलकों के महारथियों को ही सम्मेलन में एकत्र नहीं करना है. इन सम्मेलनों में साधारण नागरिकों की उपस्थिति अति अनिवार्य हैं. अगर यह सम्मेलन उन्हें हिन्दी के प्रति कुछ प्रेरित कर पाया तो सम्मेलन की असली कामयाबी यही है.

मौरिशस के वोइला होटल में सम्मेलन के कई प्रतिभागी टिके थे, जिनमें हंगरी से आये डा पीटर शागि और स्वीडन से आये डा हाइन्स वार्नर भी थे. 

डॉ पीटर शागि ने लेटिन-यूनानी-संस्कृत का तुलनात्मक अध्ययन किया, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा से पीएचडी की, और बुडापेस्त विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाने जा रहे हैं. संस्कृत विद्वान डॉ हाइन्स वार्नर उप्पसला विश्वविद्याल, स्वीडन में इंडोलोजी और हिन्दी के प्रोफेसर हैं. मैंने जब उनसे पूछा उन्होंने यह सब मंच पर क्यों नहीं बोला तो उनका जवाब था - मौका ही नहीं मिला.

(अर्चना पैन्यूली हिंदी साहित्यकार हैं और डेनमार्क में रहती हैं, यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं और उनसे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay