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क्या विज्ञापन से मर्दवादी मानसिकता बदली जा सकती है

एक शेविंग कंपनी के विज्ञापन से सोशल मीडिया पर छिड़ी असली मर्द होने की परिभाषा पर बहस. पर ऐसी छोटी कोशिशों से बदली जा सकती है मर्दवादी मानसिकता बता रही हैं अनु रॉय‌‌:

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर 21 January 2019
क्या विज्ञापन से मर्दवादी मानसिकता बदली जा सकती है जिलेट का विज्ञापन

लेट्स बॉय बी डेम बॉयज. लेट मैन बी डैम मैन.

सोशल मीडिया पर इन दिनों शेविंग किट बनाने वाली कंपनी जिलेट का एक विज्ञापन सुर्ख़ियां बटोर रहा है. इसमें मर्दों को लेकर तय स्टीरियोटाइप सोच पर सवाल खड़े किए गए हैं. जिलेट के इस #thebestmancanbe कैम्पेन की तारीफ़ भी हो रही है तो वहीं इसकी जमकर आलोचना भी की जा रही है. आखिर रीयल मैन (असली मर्द) कौन होते हैं? इसको कैसे पारिभाषित किया जा सकता है? अमूमन समाज की सोच मर्दों को लेकर एक खास खांचे में फिट है.

रियल मैन यानि वास्तव में मर्द वो होते हैं जो, बचपन से ही अपने हमउम्र लड़को पर धौंस जमाते हैं. उनकी कमजोरियों (पढ़ें मासूमियत) के लिए बुली करते हुए उन्हें कभी, फ्रीक तो कभी लूजर कहते हैं. उनके मन में इस बात को बिठा देते हैं कि उनसे हर कोई नफ़रत करता है क्योंकि वो दुःखी होने पर रो देते हैं. वो लड़कियों से साथ खेलते हैं. उनमें वो आक्रामकता नहीं हैं, जो मर्दानगी के लिए जरूरी है.

जैसे-जैसे वो 'रीयल मैन' बड़ा होता है वो गुस्सा करना सीख लेता है. अपनी बात मनवाने के लिए चीख़ता-चिल्लाता है. उसे कभी दर्द भी होता है तो वो ज़ाहिर नहीं करता. सिर्फ घर में ही नहीं कॉलेज, ऑफिस, सड़क हर जगह अपनी अपनी मर्दानगी का सबूत लड़कियों को छेड़कर, तो उन्हें ग़लत तरीके से छूकर देता है. कभी-कभी तो मर्दानगी इतनी ताक़तवर हो जाती है कि अपने साथ काम करने वाली औरतों को महज़ ऐसी नज़रों से देख लेता है कि वो असहज़ हो जाती हैं.

सिर्फ इतना ही नहीं 'असली मर्द' वो भी होते हैं जो किसी भी रिश्ते में डॉमिनेटिंग पोजीशन में रहते हैं. चाहे बात शादी, सेक्स, बच्चे की हो आखिर फ़ैसला उन्हीं का होता है. 

लेकिन ये तो स्टीरियोटाइप परिभाषा है रियल मैन की. हक़ीक़त में तो असली मर्द वो होते हैं, जो समझते हैं कि कोई कमज़ोर नहीं है उनसे. वो किसी पर धौंस दिखने के बज़ाय उन लड़कों की मदद करते हैं, जो किसी भी वजह से पीछे छूटने लगते हैं. बात चाहे स्कूल, कॉलेज, या प्लेग्राउंड की हो, वो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते हैं.  

वो सड़क पर अपने दोस्तों को किसी लड़की को छेड़ने से रोकते हैं. वो समझाते हैं अपने दोस्त को कि यूं राह चलती लड़की को छेड़ना ग़लत है. वो ऑफिस में किसी महिला-सहकर्मी के साथ हो रहे किसी भी तरह के अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हैं. वो रिश्तों में बराबरी की बात करते हैं. घर में वो काम करते हैं पत्नी, बहन और मां के साथ मिलकर. वो पीरियड में उनके लिए चाय-कॉफ़ी बनाते हैं. कभी जो तबियत ख़राब हो जाये अपने साथी की, तो हाथ-पैर भी दबा देते हैं. वो बच्चों के डाइपर बदलने से ले उन्हें दूध पिलाने और कहानी सुना सुलाने की ज़िम्मेदारी भी बख़ूबी निभाते हैं.

वो दुखी होने पर रो लेते हैं माँ की गोद में सिर रख या अपनी हमसफ़र के काँधें से टिक कर. ये होती है ख़ूबसूरती मर्द होने की.

मगर इस दुनिया में बहुत कम ऐसे मर्द हैं. और जो ऐसे मर्द हैं उन्हें उनके मर्द साथी नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं. एक शेविंग का सामान बनाने वाली कंपनी का नया विज्ञापन शायद इसी स्टीरियोटाइप को तोड़ने की कोशिश करता दिखता है. विज्ञापन, जाहिर है विज्ञापन ही है. पर इसमें छिपे भाव अहम हैं. कि, बचपन से ही हम लड़कों के सामने ऐसे उदाहरण पेश करे कि वो आगे चल कर सबका सम्मान करें. बच्चे हमें देखकर बड़े हो रहे हैं, तो क्या हम उन्हें अपने से कमज़ोर पर धौंस जमाना, लड़कियों को छेड़ना, ऑफिस में बिना कंसेंट के उन्हें छूना, मार-कुटाई करना और चीख-चिल्लाकर अपनी बात मनवा लेना सिखा रहे हैं! 

मगर दो दिन पहले लांच हुए इस वीडियो को अमेरिका जैसे विकसित देश के मर्द भी कोस रहें हैं. उन्हें लग रहा है कि ये वीडियो उनकी मर्दानगी पर वार कर रहा है. उनके मस्क्युलिन होने को गलत रौशनी में दिखा रहा. ट्विटर से ले इंस्टाग्राम हर जगह विज्ञापन की मुखालफत हो रही है.

जाने-माने पत्रकार, लेखक और कई टीवी शो के जज 'पियर्स मॉर्गन' ने ने ट्विटर हैंडल पर इस विज्ञापन पर अपना विरोध दर्ज़ करवाते हुए ट्वीट किया है,

“Let boys be damn boys. Let men be damn men.” 

इस एक ट्वीट से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि, मर्द होने की पारंपरिक परिभाषा हमारे मन में कितने गहरे जड़ें जमा चुकी हैं. 

ज़रा सोचिये हज़ारों उत्पादों के विज्ञापन में औरतों को, परफेक्ट मां, खूबसूरत पत्नी, दिलकश गर्लफ्रेंड के रूप में दिखाया जाता है. लगभग हर तीसरे विज्ञापन में उन्हें ये बताया जाता है, कि फलां चाय पियो तो दुबली दिखोगी, फलां क्रीम लगाओ तो गोरी हो जाओगी, फलां मसाला इस्तेमाल करके तुम बेस्ट मां और पत्नी कहलाओगी. लेकिन कभी औरतों ने इन पर कोई विरोध नहीं ज़ाहिर किया, क्योंकि बचपन से ही लड़कियों को यही सिखाया जाता है. चाहे वो जो भी बन जाये आखिर में उन्हें ही घर संभालना है, वॉशिंग में मुस्कुरा कर कपड़े धोने हैं, घर को चमकाकर रखना है, घरवालों की हर ख़ुशी का ख़याल रखते हुए उन्हें परफेक्ट बनना है.

आज जब वही बाज़ारवाद इन मर्दों को ज़रा सा आईना दिखाने की कोशिश की है तो इस क़दर विरोध दर्ज़ करवाया जा रहा है. ये मर्दों को लेकर फ्यूडल सोच की गहराई को दिखाने के लिए काफी है. लेकिन जितना भी विरोध हो ख़ुशी इस बात की है मर्दों के लिए रेज़र और शेविंग क्रीम बनाने वाली एक कम्पनी ने स्टीरियो-टाइप के ख़िलाफ़ एक मुहिम तो छेड़ी. 

विज्ञापन के आख़िरी हिस्से में कही गयी बात कि, "जब तक हम मर्द खुद को और बेहतर करने के लिए चैलेन्ज नहीं करेंगे,  तब तक हमारी आने वाली पीढ़ियों को हम अपना सबसे अच्छा रूप कैसे दिखा पाएंगे." ये बात एक उम्मीद की लौ सी जगाती है कि, जो अब आगाज़ हुआ है, तो बात कभी न कभी अंजाम तक तो पहुंच कर रहेगी!

(अनु रॉय स्वतंत्र लेखिका हैं और महिला अधिकारों पर लिखती हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं और इंडिया टुडे का उनके विचारों से सहमति आवश्यक नहीं है.)

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