एडवांस्ड सर्च

Advertisement

मेरा मकसद है के महफिल रहे रोशन यूं ही...

गोपालदास नीरज ने शुद्ध हिंदी में क्या गाने लिखे हैं. रोमांटिक हों, सैड सांग हों, पैट्रियॉटिक हों या स्पिरिचुअल. जी करता है बस सुनते रहो.
मेरा मकसद है के महफिल रहे रोशन यूं ही... गोपालदास नीरज
शिवकेश 20 July 2018

सन पचासी का वक्त था. एग्रीकल्चर में बारहवीं पास करने के बाद ग्रेजुएशन में एडमीशन न मिलने पर गांव पर गाय-भैंस बल्कि अहमियत के हिसाब से कहें तो बगिया में भैंस-गाय चरा रहा था. कमेंटरी आती होती तो अक्सर रेडियो लेता जाता. उसी दौरान गीतों की एक पुस्तक कहीं से हाथ लग गई, यह याद नहीं कि कौन लाया था उसे. अब मैं उसे ले जाने लगा था.

किन्हीं 'गोपालदास नीरज' की थी. सैकड़ों साल पुराने आम के पेड़, साथ में बेल, जामुन, बांस. पर सबसे ज्यादा करौंदे और दूसरी कटीली झाड़ियां. गांव का नाम ही कटेल था. ढोर अपना दूब चरते रहते और मैं गीतों के लयताल की थाह लेकर धीरे-धीरे गाता रहता.

उसी संकलन के एक लंबे गीत कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे पर कुछ अटक-सा गया. मुखड़ा तो था ही, उस वक्त की मेरी समझ के हिसाब से उसके अंतरे मेरा ज्यादा ध्यान खींच रहे थे: नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई; क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा...और इसके आखिरी अंतरे की पूरी इमेजरी ने मुझे जैसे जकड़ लिया: मांग भर चली कि एक जब नई नई किरन...गांव सब उमड़ पड़ा, बहक उसे नयन-नयन, और हम अजान-से, दूर के मकान से पालकी लिए हुए कहार देखते रहे.

जीपों-बसों की उपलब्धता बढ़ने के साथ वह पालकी-मियानों की विदाई का दौर था पर फिर भी कभी-कदार उनमें दूल्हे या दुल्हनें जाती दिख जाती थीं.

मैं लाठी बगल में रखे, आंखें बंद किए, बैठकर तरन्नुम में धीरे-धीरे वही गा रहा था, बार-बार.

तभी भैंस ने एकाएक तेज दौड़ लगाई और मुझे रौंदती चली गई. थोड़ी देर बाद मुझे माजरा समझ में आया. दरअसल वह एक नीलगाय देखकर भागी थी.

अब मैं किताब एक ओर रखकर दर्द से तड़पता हुआ अपनी देह सहला रहा था.

कल कवि गोपालदास नीरज के निधन पर वह वाकया मुझे याद आ गया. संयोग से उन्हें पहली बार देखने का मौका 13-14 साल पहले दिल्ली के हैबिटाट सेंटर में मिला. स्टेज पर उन्हें अकेले बिठाया गया था.

कारवां गुजर गया...अब नीरज खुद गा रहे थे और एक अंतरा गाने के बाद, मशहूर कथक नृत्यांगना उमा शर्मा अपनी गहरी आंखों, भाव भरे चेहरे और अनुशासित घुंघुरुओं से उसके कथ्य को इनैक्ट करतीं. पूर्णिमा के आसपास की वह रात स्टेन ऑडिटोरियम के दर्शकों के लिए यादगार बन चुकी थी.

बाद में एक दफा स्टोरी करते हुए सिनेमा के नए गीतकारों से बात कर रहा था. चक दे इंडिया और खोसला का घोंसला जैसी फिल्मों के पटकथा लेखक-गीतकार जयदीप साहनी की सुई आकर नीरज पर अटक गई. काश! मैंने उसे रिकॉर्ड किया होता.

जयदीप के कहने का लब्बोलुआब यह था कि यार हम यहां गानों में वर्चुअली एक-एक शब्द के लिए लड़ते-झगड़ते हैं कि शुद्ध हिंदी के शब्द मत डालना, बोरिंग हो जाएगा. और नीरज जी को देखो, शुद्ध हिंदी में क्या गाने लिखे हैं बंदे ने. रोमांटिक हों, सैड सांग हों, पैट्रियॉटिक हों या स्पिरिचुअल. जी करता है बस सुनते रहो.

ध्यान से सुनने पर एक बार नीरज का वही अंतरे वाला पहलू समझ में आया. पिछले दो-तीन दशक से सिनेमा के गाने मुखड़े और अक्सर कैचवर्ड तक ही सिमटते गए हैं. इससे उलट सत्तर के दशक के उनके गानों के अंतरे सुनते ही बनते हैं.

तेरे खयालों में उलझा रहा हूं, जैसे कि माला में धागा. प्रेम पुजारी का गाना फूलों के रंग से; दुख मेरा दूल्हा है बिरहा है डोली, आंसू की साड़ी है आहों की चोली, प्रेम पुजारी का ही रंगीला रे; शर्मीली (1971) फिल्म का गाना खिलते हैं गुल यहां.

अंतरे में उतरती रूमानियत देखिए, झीलों के होठों पर, मेघों का राज है, फूलों के सीने में ठंडी-ठंडी आग है. इसी फिल्म में बिरह देखिए, सबके आंगन दिया जले, मोरे आंगन जिया, हवा लागे शूल जैसी, ताना मारे चुनरिया (मेघा छाए आधी रात).

लाल पत्थर (1971) के गाने रे मन सुर में गा के अंतरे में संगीत और अध्यात्म को घुलते-मिलते देखिए: जीवन है सुख-दुख का संगम, मध्यम के संग जैसे पंचम.

नीरज जैसे रचनाकार हमेशा अपनी मौज में जीते और जीने को प्रेरित करते हैं. उनकी रूहें कभी नहीं मरा करतीं.

***

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay