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वो थे आजाद हिंद के नेताजी, जिनकी मौत बनी रहस्य

आजाद हिंद फौज के नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि व्यक्ति मर सकता है लेकिन उसके विचार नहीं, विचार उसकी मौत के बाद भी जिंदा रहते हैं और हजारों को प्रभावित करते हैं.  

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aajtak.in [Edited by: प्रियंका शर्मा]नई दिल्ली, 23 January 2018
वो थे आजाद हिंद के नेताजी, जिनकी मौत बनी रहस्य Netaji Subhash Chandra Bose

‘सुभाष चंद्र बोस’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में एक वो नाम हैं, जिसने अपने क्रांतिकारी तेवर से ब्रिटिश राज को हिलाकर रख दिया था. लोग उन्हें ‘नेताजी’ कहकर बुलाया करते थे. उन्होंने देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान दिया था. ‘देशभक्तों के इस देशभक्त’ नें अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे. आजादी की लड़ाई में अंग्रेजो के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले नेताजी का निधन 18 अगस्त 1945 में हुआ था.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके मौत का रहस्य उनके चले जाने के बाद भी रहस्य बना हुआ है. बहुत सी कमेटियां आईं, अपनी रिपोर्ट दीं, पर असल सच्चाई सामने नहीं आ सकी. प्रधानमंत्री बदलते रहे पर रहस्य पर से पर्दा न उठ सका. यकीनन केंद्र सरकार की तरफ से फाइल सामने के बाद उनके मौत की सच्चाई सामने आ सकती है.

नेताजी से जुड़े रहस्य और उनकी सच्चाई...

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था. उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था. जानकीनाथ कटक के मशहूर वकील थे.

प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 सन्तानें थी जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे. सुभाष उनकी नौवीं सन्तान और पांचवें बेटे थे .

कटक में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने रेवेनशा कॉलिजियेट स्कूल में दाखिला लिया. जिसके बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की. 1919 में बीए की परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी से पास की, यूनिवर्सिटी में उन्हें दूसरा स्थान मिला था.

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उनके पिता की इच्छा थी कि सुभाष आईसीएस बनें. उन्होंने अपने पिता की यह इच्छा पूरी की. 1920 की आईसीएस परीक्षा में उन्होंने चौथा स्थान पाया मगर सुभाष का मन अंग्रेजों के अधीन काम करने का नहीं था. 22 अप्रैल 1921 को उन्होंने इस पद से त्यागपत्र दे दिया.

सुभाष चंद्र बोस की पहली मुलाकात गांधी जी से 20 जुलाई 1921 को हुई थी. गांधी जी की सलाह पर वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए काम करने लगे.

भारत की आजादी के साथ-साथ उनका जुड़ाव सामाजिक कार्यों में भी बना रहा. बंगाल की भयंकर बाढ़ में घिरे लोगों को उन्होंने भोजन, वस्त्र और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का साहसपूर्ण काम किया था. समाज सेवा का काम नियमित रूप से चलता रहे इसके लिए उन्होंने 'युवक-दल' की स्थापना की.

भगत सिंह को फांसी की सजा से रिहा कराने के लिए वे जेल से प्रयास कर रहे थे. उनकी रिहाई के लिए उन्होंने गांधी जी से बात की और कहा कि रिहाई के मुद्दे पर किया गया समझौता वे अंग्रेजों से तोड़ दें. इस समझौते के तहत जेल से भारतीय कैदियों के लिए रिहाई मांगी गई थी. गांधी जी ब्रिटिश सरकार को दिया गया वचन तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए, जिसके बाद भगत सिंह को फांसी दे दी गई. इस घटना के बाद वे गांधी और कांग्रेस के काम करने के तरीके से बहुत नाराज हो गए थे.

अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष को कुल 11 बार कारावास की सजा दी गई थी. सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 को छह महीने का कारावास दिया गया था. 1941 में एक मुकदमे के सिलसिले में उन्हें कलकत्ता की अदालत में पेश होना था, तभी वे अपना घर छोड़कर चले गए और जर्मनी पहुंच गए. जर्मनी में उन्होंने हिटलर से मुलाकात की. अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के लिए उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया और युवाओं को 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' का नारा भी दिया.

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18 अगस्त 1945 को वे हवाई जहाज से मंचूरिया जा रहे थे. इस सफर के दौरान ताइहोकू हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें उनकी मौत हो गई. उनकी मौत भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बनी हुई है. उनकी रहस्यमयी मौत पर समय-समय पर कई तरह की अटकलें सामने आती रहती हैं.

आपको बतादें भारत सरकार ने RTI के जवाब में ये बात साफ़ तौर पर कही है कि उनकी मौत एक विमान हादसे में हुई थी.

वहीं कई सरकारी तथ्यों के मुताबिक 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचुरिया जा रहे थे और इसी हवाई सफर के बाद वो लापता हो गए. हालांकि, जापान की एक संस्था ने उसी साल 23 अगस्त को ये खबर जारी किया कि नेताजी का विमान ताइवान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसके कारण उनकी मौत हो गई.

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लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खुद जापान सरकार ने इस बात की पुष्टि की थी कि, 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में कोई विमान हादसा नहीं हुआ था. इसलिए आज भी नेताजी की मौत का रहस्य खुल नहीं पाया है.

आजाद हिंद के नेताजी सुभाष चंद्र ने कहा था कि व्यक्ति मर सकता है लेकिन उसके विचार नहीं, विचार उसकी मौत के बाद भी जिंदा रहते हैं और हजारों को प्रभावित करते हैं.

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