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जयंती: ऐसा रहा क्रांतिकारी सुखदेव का जीवन, ब्रिटिश सरकार की हिला दी थी नींव

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सुखदेव थापर एक ऐसा नाम है जो न सिर्फ अपनी देशभक्ति, साहस और मातृभूमि पर कुर्बान होने के लिए जाना जाता है, बल्कि शहीद ए आजम भगत सिंह के अनन्य मित्र के रूप में भी उनका नाम इतिहास में दर्ज है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 15 May 2020
जयंती: ऐसा रहा क्रांतिकारी सुखदेव का जीवन, ब्रिटिश सरकार की हिला दी थी नींव सुखदेव थापर

देश के सबसे बड़े क्रांतिकारी भगत सिंह के साथ सुखदेव और राजगुरु ने भी अपनी जान गंवाई थी. आज क्रांतिकारी सुखदेव की जयंती है. सुखदेव का भारत के उन क्रांतिकारियों में गिना जाता है, जिन्होंने कम उम्र में देश के लिए शहादत दी थी.

सुखदेव का पूरा नाम 'सुखदेव थापर' था. जब भी उनका नाम याद किया जाता है, तो भगत सिंह और राजगुरु के साथ उनका नाम जोड़ा जाता है. ये तीनों ही देशभक्त क्रांतिकारी आपस में अच्छे मित्र थे, तीनों से देश की आजादी के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था. 23 मार्च, 1931 को भारत के इन तीनों वीर नौजवानों को एक साथ फांसी दी गई थी.

जानें- सुखदेव के बारे में

सुखदेव का जन्म 15 मई, 1907 को लुधियाना, पंजाब में हुआ था. उनके पिता का नाम रामलाल थापर था. इनकी माता रल्ला देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं. जब सुखदेव तीन वर्ष के थे, तभी इनके पिताजी का देहांत हो गय था. जिसके बाद उनका लालन-पालन उनके ताऊ लाला अचिन्त राम ने किया था.

सुखदेव ने अपने बचपन से ही उन्होंने भारत में ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मों को देखा और इसी के चलते वह गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए क्रांतिकारी बन गए थे. बताया जाता है, वह लाहौर के नेशनल कॉलेज में युवाओं में देशभक्ति की भावना भरते और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने के लिए प्रेरित करते थे. इसी के साथ वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य थे. आपको बता दें, सुखदेव ने 1929 में जेल की भूख हड़ताल जैसी कई क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया था.

सुखदेव ने युवाओं में न सिर्फ देशभक्ति का जज्बा भरने का काम किया, बल्कि खुद भी क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया. उनका नाम 1928 की उस घटना के लिए प्रमुखता से जाना जाता है जब क्रांतिकारियों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए जे.पी.सांडर्स की हत्या कर दी. इस घटना को अंजीम देने के लिए उनके साथ भगत सिंह और राजगुरु भी साथ थे. जिसके बाद इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था और पूरे देश में क्रांतिकारियों की जय जयकार हुई थी.

सुखदेव ने अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर लाहौर में नौजवान भारत सभा शुरू की थी. यह एक ऐसा संगठन था जो युवकों को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित करता था. सांडर्स की हत्या के मामले को ‘लाहौर षड्यंत्र’ के रूप में जाना जाता है. इस मामले में राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को मौत की सजा सुनाई गई. 23 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे. शहादत के समय सुखदेव की उम्र मात्र 24 साल थी.

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