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रवींद्र नाथ टैगोर: ऐसे कवि जिनकी कविताओं से 3 देशों ने लिए राष्ट्रीय गान

बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ टैगोर ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था. वह नोबेल जीतने वाले पहले भारतीय थे. उनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया. बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रचियता भी टैगोर ही थे.

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aajtak.inनई दिल्ली, 07 August 2019
रवींद्र नाथ टैगोर: ऐसे कवि जिनकी कविताओं से 3 देशों ने लिए राष्ट्रीय गान रवींद्र नाथ टैगोर

उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार और कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की आज पुण्यतिथि है. आज ही के दिन 7 अगस्त 1941 को उनका निधन हो गया था. क्या आप जानते हैैं उनकी रचनाओं से दो देशों की राष्ट्रगान लिए गए. ये ही नहीं एक देश और है जिसका राष्ट्रगान भी उन्हीं के रचना से प्रभावित है. आइए जानें, उनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जो शायद आपको न पता हों.

भारत का राष्ट्रगान जन गण मन अधिनायक मूल रूप से बांग्ला भाषा में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखा गया था. इसके अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी उन्हीं की कविता से लिया गया जिसमें बांग्लादेश का गुणगान है. कहा जाता है कि श्रीलंका के राष्ट्रगान का एक हिस्सा भी उनकी कविता से प्रेरित है. इस तरह तीन देशों के राष्ट्रगान में उनकी कविता की छाप है. बता दें, गुरुदेव का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था.

रवींद्रनाथ अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे. बचपन में उन्‍हें प्‍यार से 'रबी' बुलाया जाता था. 8 साल की उम्र में उन्‍होंने अपनी पहली कविता लिखी, 16 साल की उम्र में उन्‍होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था.

गुरुदेव रवींद्र नाथ एक मानवतावादी विचारक थे. उन्होंने साहित्य, संगीत, कला और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अपनी अनूठी प्रतिभा का परिचय दिया. वो भारत ही नहीं एशिया के पहले ऐसे व्‍यक्ति थे, जिन्‍हें नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था. बताया जाता है कि नोबेल पुरस्कार भी गुरुदेव ने सीधे स्वीकार नहीं किया था. उनकी ओर से ब्रिटेन के एक राजदूत ने ये पुरस्कार लेकर उन्हें सौंपा. उन्हें 1913 में उनकी कृति गीतांजलि के लिए नोबेल दिया गया था.

51 वर्ष की उम्र में वे अपने बेटे के साथ इंग्‍लैंड जा रहे थे. समुद्री मार्ग से भारत से इंग्‍लैंड जाते समय उन्‍होंने अपने कविता संग्रह गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद करना प्रारंभ किया. रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं. गुरुदेव बाद के दिनों में चित्र भी बनाने लगे थे. रवींद्रनाथ ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी.

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