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रोहिंग्याः भारत क्यों उनसे चाहता है छुटकारा

दुनिया भर के करीब 2,00,000 लोगों को शरण देने वाला भारत म्यांमार से भागकर आने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के लिए सख्त हो गया है. यही नहीं, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा तक बताया जा रहा है. वाकई इसकी वजहें यही हैं या कुछ और?

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aajtak.in
कौशिक डेका नई दिल्ली, 14 October 2017
रोहिंग्याः भारत क्यों उनसे चाहता है छुटकारा जाएं तो जाएं कहां म्यामांर से बांग्लादेश पहुंचे अपनी मां आलिमा खातून को उठाए अब्दुल करीम

तीस सितंबर को ऑक्सफोर्ड के बड़े कॉलेजों में शुमार सेंट ह्यू ने मेन गेट पर जानी-मानी शख्सियतों की तस्वीर में से एक तस्वीर हटा ली. इस नाकद्री की वजहें तो नहीं बताई गई हैं लेकिन जिक्र आंग सान सू की का है इसलिए यह अंदाजा वाजिब है कि यह म्यांमार सेना के खिलाफ रोहिंग्या मुसलमानों के जातीय सफाए के आरोपों की प्रतिक्रिया थी, जिससे लाखों लोग भागने पर मजबूर हो गए हैं. हालांकि सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक के.के. शर्मा कहते हैं कि पिछले दो साल में महज 200 रोहिंग्या शरणार्थी ही भारत आए हैं जिनमें सिर्फ 12 को इस साल रोका गया. संयुक्त राष्ट्र ने कड़े शब्दों में कहा कि हमले के बाद सेना की जवाबी कार्रवाई ''साफ-साफ बेहिसाब'' है और चेताया है कि रोहिंग्याओं के साथ म्यांमार का बर्ताव ''जातीय सफाये का आदर्श उदाहरण'' लगता है.

म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमनों के पलायन पर दुनियाभर में आक्रोश है क्योंकि पिछले पांच साल के दौरान करीब पांच लाख लोग वहां से भागे जिनमें ज्यादातर बांग्लादेश चले गए. हालांकि म्यांमार को भारत के रूप में एक दोस्त मिल गया है. सितंबर के पहले सप्ताह में म्यांमार यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सू की से कहा, ''रखाइन प्रांत में उग्रवादी हिंसा, खास तौर पर सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा और इसके कारण मारे जा रहे निर्दोष लोगों के प्रति आपकी चिंताओं को हम समझते हैं."

भारत ने इस आशा में म्यांमार सेना के साथ अच्छे रिश्ते बना रखे हैं कि वह पूर्वोत्तर में सक्रिय आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में मदद करेगी. इन आतंकवादियों मे से कई ने म्यांमार के जंगलों में ठिकाने बना रखे हैं. यह महज संयोग नहीं है कि पिछले एक साल में भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा में घुसकर पूर्वोत्तर में सक्रिय विद्रोहियों के खिलाफ दो बार ऑपरेशन किए.

केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से सभी राज्यों को 8 अगस्त को भेजे गए पत्र से यह स्पष्ट है कि भारत सरकार ने 25 अगस्त को हुई हिंसा से पहले ही रोहिंग्या मामले पर अपना रुख तय कर लिया था. गृह मंत्रालय ने उस पत्र में कहा कि रोहिंग्या प्रवासी भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा और देश के सीमित संसाधनों पर बोझ हैं. इसके साथ ही प्रशासन और खुफिया एजेंसियों से कहा गया कि, ''अवैध

म्यांमार सुरक्षा बलों की यह कार्रवाई मुस्लिम उग्रवादी संगठन अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) के हमलों के जवाब में है. एआरएसए ने अक्तूबर 2016 को कई सुरक्षा चौकियों पर हमला किया था, जिसमें कई पुलिसवाले मारे गए. फिर इस साल 25 अगस्त को भी उसके सुनियोजित हमले में 12 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे. दोनों ही मौकों पर म्यांमार के सुरक्षा बलों ने एआरएसए को जड़ से मिटाने के लिए बड़े पैमाने पर 'सफाई अभियान' चलाया जिसके कारण करीब 5,00,000 रोहिंग्या बांग्लादेश भागने पर मजबूर हो गए.

प्रवासियों की पहचानकर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया जल्दी शुरू करें." सरकार के मुताबिक, जम्मू, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान में 40,000 रोहिंग्या रह रहे हैं. इनमें से ज्यादातर 1982 में म्यांमार की नागरिकता से वंचित करने के कानून के बाद यहां आए.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के हालिया अनुमानों के मुताबिक भारत में 2,00,000 शरणार्थी रह रहे हैं और शरणार्थी आबादी के लिहाज से भारत 25वां सबसे बड़ा देश है. यहां तमाम तरह के शरणार्थी हैं—1959 में आए तिब्बती; 1971 में आए बांग्लादेशी; 1963 में आए चकमा; 1983, 1989 और फिर 1995 में श्रीलंका से आए तमिल; और 1980 के दशक के दौरान आए अफगान शरणार्थी. अफगानिस्तान, म्यांमार, सोमालिया, कांगो, इरिट्रिया, ईरान, इराक, सूडान और सीरिया समेत दुनियाभर से शरणार्थी भारत आए हैं. 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो ग्यूटरस ने शरणार्थियों को लेकर भारत के रुख की प्रशंसा करते हुए इसे दुनियाभर के लिए उदाहरण बताया था.

ऐसा पहली बार है कि केंद्र सरकार ने किसी शरणार्थी समूह को निर्वासित करने के अपने इरादे जाहिर किए हैं. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें 'अवैध आप्रवासी' बताया है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार म्यांमार को कैसे उन रोहिंग्या मुसलमानों को वापस लेने के लिए राजी करेगी जिन्हें वह अपना नागरिक ही नहीं मानता.

आरा ट्रस्ट, सेंटर फॉर रिफ्यूजी लॉ ऐंड फोस्र्ड माइग्रेशन स्टडीज की कार्यकारी निदेशक रोशनी शंकर कहती हैं, ''वे लोग भविष्य में हमारे लोगों के लिए खतरा हो सकते हैं, क्या महज इस वजह से हम पूरे समुदाय को वापस भेजने जा रहे हैं जबकि हमें बखूबी पता है कि वापस लौटने पर उन्हें जुल्म का शिकार होना पड़ेगा?" वे कहती हैं, ''हमने पहले कभी इस तरह की नीति नहीं अपनाई और यह भी साफ नहीं कि रोहिंग्याओं के खिलाफ ही ऐसा क्यों किया जा रहा है?"

शरणार्थियों से जुड़े किसी भी हालात में भारत की प्रतिक्रिया किसी संवैधानिक नीति से नहीं बल्कि राजनैतिक वजहों से तय होती रही है क्योंकि भारत दुनिया के उन कुछ देशों में है जहां न तो कोई राष्ट्रीय शरणार्थी संरक्षण ढांचा है और न ही कोई आव्रजन नीति. हमने यूएन रिफ्यूजी कन्वेंशन-1951 या उसके 1967 के प्रोटोकॉल पर दस्तखत भी नहीं किए हैं. न तो हमने 1954 के यूएन कन्वेंशन ऑन स्टेटलेस या 1961 के यूएन कन्वेंशन ऑन रिडक्शन ऑफ स्टेटलेसनेस की ही पुष्टि की है.

इसलिए भारत बाध्य नहीं है कि शरणार्थियों को उक्त संधियों में तय अधिकार दे. वह शरणार्थियों को दीर्घावधि वीजा देने का फैसला तदर्थ तरीके से ही लेता है. शंकर कहती हैं, ''ऐसी तदर्थ व्यवस्था के कारण भारत में एक स्पष्ट और सुसंगत शरणार्थी व्यवस्था नहीं बन पाई और इस वजह से विभिन्न सरकारों को अपने राजनैतिक विचारों के मुताबिक नीतियां अपनाने का मौका मिल गया."

अधिकतर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ भाजपा का रुख सुरक्षा चिंताओं की वजह से नहीं, बल्कि मुस्लिम विरोधी विचारधारा के कारण है. मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी ऐंड सेक्यूलरिज्म के निदेशक इरफान इंजीनियर कहते हैं, ''अगर तमिल शरणार्थी भारत में कोई सुरक्षा खतरा पैदा नहीं करते जबकि लिट्टे ने इस समुदाय से बड़ी संक्चया में लड़ाके भर्ती किए, तो भला रोहिंग्या सुरक्षा के लिए खतरा कैसे हो गए? सिर्फ इसलिए कि वे मुस्लिम हैं, उन पर भरोसा नहीं कर सकते?"

म्यांमार को छोड़कर सभी पड़ोसी देशों के लोग भारत में शरण के लिए सीधे सरकार से मांग करते हैं और उन्हें विदेशी क्षेत्रीय पंजीयन अधिकारी (एफआरआरओ) जरूरी दस्तावेज जारी करते हैं जबकि म्यांमार समेत सभी गैर-पड़ोसी देश यूएनएचसीआर के तहत आते हैं.

आयोग प्रत्येक व्यक्ति के शरण संबंधी आवेदन के मूल्यांकन के बाद आवेदक से पूछताछ करता है और पंजीकरण के लिए बायोमीट्रिक डाटा लेने के बाद ही शरणार्थी के रूप में आइडी कार्ड जारी करता है. इस पूरी प्रक्रिया में छह महीने से एक साल लग जाता है. सरकार फिलहाल रोहिंग्या समेत यूएनएचसीआर आइडी प्राह्रश्वत सभी शरणार्थियों को 'लंबी अवधि के वीजा' के लिए आवेदन करने की इजाजत देती है और हर मामले पर अलग-अलग फैसला किया जाता है.

शंकर कहती हैं, ''यूएनएचसीआर को सिर्फ नई दिल्ली से ही संचालन की इजाजत है और दुर्भाग्यवश हर शरणार्थी (रोहिंग्या समेत) औपचारिक रूप से शरण लेने में सक्षम नहीं हो पाता क्योंकि जब तक उनके आवेदन का मूल्यांकन हो रहा होता है, उनके पास दिल्ली आने का कोई रास्ता नहीं होता." यही कारण है कि देश में रह रहे 40,000 रोहिंग्या मुसलमानों में से महज 16,500 यूएनएचसीआर में पंजीकृत हैं.

शरणार्थियों बंदोबस्त को ज्यादा तरतीबवार बनाने के लिए सरकार ने 1955 के नागरिकता कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा. पिछले साल जुलाई में केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक संसद में पेश कर दिया. इसमें कहा गया कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीडऩ के शिकार हुए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई मजहब के गैर-कानूनी प्रवासियों को आने दिया जाएगा और उन्हें न तो कैद में डाला जाएगा और न ही वापस भेजा जाएगा.

हालांकि इस विधेयक में मुस्लिम शरणार्थियों को शामिल नहीं रोहिंग्या के प्रति अपनी मानवीय जिम्मेदारी से पल्ला नहीं छुड़ा सकता. स्कूल ऑफ लॉ ऑफ सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग के प्रोफेसर सूर्य देव इससे सहमति जाहिर करते हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने मानव अधिकार, बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन और अन्य कारोबारी उद्यमों के मुद्दे पर गठित अपने कार्यकारी समूहों का सलाहकार नामजद किया है. वे कहते हैं, ''अंतरराष्ट्रीय हलकों में हिंदुस्तान की बढ़ती आर्थिक और सियासी हैसियत के अनुरूप उसे निश्चित तादाद में रोहिंग्या मुसलमानों को स्वीकार करना चाहिए."

शरणार्थियों के मसले पर केंद्र का परस्पर विरोधी रुख उस वक्त भी सामने आया, जब 14 सितंबर को इसी केंद्र सरकार ने रोहिंग्याओं की बाढ़ से निपटने में सहायता के लिए बांग्लादेश को मानवीय सहायता भेजी. शंकर कहते हैं, ''हम बांग्लादेश को आर्थिक सहायता मुहैया करने को तैयार हैं पर खुद अपनी सीमाओं के भीतर ऐसा करने की आर्थिक व्यावहारिकता को लेकर फिक्रमंद हैं."

हालांकि मानवाधिकार एजेंसियों और कार्यकर्ताओं ने तमाम रोहिंग्या मुसलमानों को संदिग्ध आतंकी ठहराने की कोशिश के लिए सरकार की आलोचना की है, पर इस बात के भी काफी सबूत हैं कि दुनिया भर के जेहादी गुटों ने इस संकट का फायदा उठाया है. यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएससीआर) में दर्ज शरणार्थी भी खतरा बन सकते हैं, यह अक्तूबर 2016 में जाहिर हो गया जब बांग्लादेश में नयापाड़ा शरणार्थी शिविर के भीतर मदद के लिए बनाई गई अंसार पुलिस चैकी पर हमला बोल दिया गया. यह हमला नुरुल अवसार उर्फ रुहुल्लाह नाम के एक शख्स ने किया था जिसका नाम शिविर में बतौर शरणार्थी दर्ज था.

यही वजह है कि बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सीकरी रोहिंग्या को वापस भेजने के सरकार के फैसले की हिमायत करती हैं और कहती हैं कि हिंदुस्तान में रोहिंग्याओं को एआरएसए के हाथों कट्टर बनाए जाने की पूरी आशंका है.

एआरएसए ने 14 सितंबर को जारी एक बयान में कहा कि उसका अल कायदा, आइएसआइएस, लश्करे तैयबा या किसी भी दूसरे दहशतगर्द धड़े से कोई रिश्ता नहीं है. सुरक्षा विश्लेषक और आतंकवाद विशेषज्ञ इस पर भरोसा करने को राजी नहीं हैं, क्योंकि इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आइसीजी) की 2016 की एक रिपोर्ट कहती है कि एआरएसए का नेता अताउल्लाह अबु अम्मार जुनजुनी उर्फ हाफिज तोहार कराची में पैदा हुआ था और सऊदी अरब के एक मदरसे में गया था.

यहां तक कि उसका सरपरस्त अब्दुस कदूस बर्मी, जो रोहिंग्या मूल का ही एक और पाकिस्तानी है, लश्कर के सरगना हाफिज सईद के साथ बैठकों में भी शामिल हुआ था. आइसीजी के मुताबिक, एआरएसए की अगुआई सऊदी अरब में रोहिंग्या प्रवासियों की एक समिति करती है और यह आर्थिक तौर पर मजबूत और काफी संगठित मालूम देती है.

दिल्ली पुलिस के विशेष सेल ने 17 सितंबर को अल कायदा के लिए काम करने वाले एक शख्स समीउन रहमान को गिरफ्तार किया. 28 बरस का यह ब्रिटिश नागरिक रोहिंग्या मुसलमानों की भर्ती करके पूर्वी भारत में एक आतंकी मॉड्यूल स्थापित करना चाहता था. यह पहला मौका नहीं है जब अल कायदा के साथ रोहिंग्या मुसलमानों का जुड़ाव सामने आया है. 9/11 के बाद अमेरिकी फौजों को ऐसे कई वीडियो मिले, जिनमें अफगानिस्तान स्थिति अल कायदा के शिविरों में किया गया या न ही इसे नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका सरीखे दूसरे पड़ोसी देशों तक बढ़ाया गया.

यह हिंदुस्तान में रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर सरकार के विरोधी रुख का पहला इशारा था. बांग्लादेश से आए 'अवैध हिंदू घुसपैठियों' का बोझ उठाने से इनकार कर चुके असम में जबरदस्त जनाक्रोश और विरोध के बाद अब एक संयुक्त संसदीय समिति इस विधेयक की पड़ताल कर रही है. विधेयक के समर्थन में भाजपा के नेता और असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने यहां तक दावा किया कि राज्य में 55 लाख 'अवैध मुस्लिम घुसपैठियों' का मुकाबला करने के लिए असमिया हिंदुओं को 1,50,000 'अवैध बंगाली हिंदुओं' की दरकार है.

हालांकि ये आधिकारिक आंकड़े नहीं हैं, पर भाजपा नेता की यह अजीबोगरीब दलील रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ इस आम शिकायत को बेमानी बना देती है कि वे हमारे आर्थिक संसाधनों पर बोझ हैं. सुप्रीम कोर्ट के वकील उपमन्यु हजारिका कहते हैं, ''अगर 40,000 रोहिंग्या हमारे ऊपर आर्थिक बोझ हैं, तो कल्पना कीजिए कि 1.5 लाख हिंदू बांग्लादेशी असम सरीखे एक राज्य को कितना नुक्सान पहुंचा सकते हैं. केवल रोहिंग्या ही क्यों, सरकार को बांग्लादेश से आए उन तमाम घुसपैठियों को भी बाहर निकाल देना चाहिए जो आर्थिक वजहों से हिंदुस्तान में दाखिल हुए हैं."

दिल्ली स्थित भारतीय मानवाधिकार संस्थान के डायरेक्टर राहुल राज के मुताबिक, हिंदुस्तान जिम्मेदार वैश्विक ताकत होने के नाते म्यांमार के जेहादी प्रशिक्षण हासिल कर रहे थे.

2013 में जब यूपीए सत्ता में था, तथाकथित रोहिंग्या सोलिडैरिटी ऑर्गेनाइजेशन (आरएसओ) के लिए काम करने वाले एक शख्स खालि महमूद से दिल्ली पुलिस की पूछताछ में भी रोहिंग्या उग्रवादियों के पाकिस्तान के साथ जुड़ाव के सबूत सामने आए थे.

मानवाधिकार कार्यकर्ता यह तो मानते हैं कि 'राष्ट्र विरोधी' कामों में मुब्तिला किसी भी विदेशी के खिलाफ कार्रवाई करना सरकार के अधिकार में है, पर उन्हें लगता है कि पूरे समुदाय को दहशतगर्द करार दे देना नाइंसाफी है. देवा कहते हैं, ''अगर कुछ निश्चित रोहिंग्याओं के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की ठोस जानकारी मौजूद है, तो उन्हें दाखिल होने से रोकना और वापस भेज देना चाहिए. मगर पूरे तबके के लोगों पर सुरक्षा के लिए संभावित खतरा होने का ठह्रश्वपा लगा देना नाजायज है. सरकार जांच-पड़ताल की बेहतर व्यवस्था तो बेशक कायम ही कर सकती है."

8 अगस्त के आदेश के बाद हिंदुस्तान में रह रहे दो रोहिंग्या शरणार्थियों—मोहम्मद सलीमुल्लाह और मोहम्मद शाकिर—ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके सरकार से यह आश्वासन देने की मांग की कि उन्हें म्यांमार वापस नहीं भेजा जाएगा. इन दोनों शरणार्थियों के नाम यूएनएचसीआर में दर्ज हैं. जवाब में सरकार ने 16 सितंबर को 16 पन्नों का एक हलफनामा दाखिल किया जिसमें कहा गया कि सरकार 'उग्रवादी गुटों' के साथ रोहिंग्याओं के जुड़ाव और अवैध रास्तों से रकम आने के सबूत पेश करेगी.

हलफनामे में यह भी कहा गया कि सरकार के पास सुरक्षा एजेंसियों और दूसरे भरोसेमंद स्रोतों के इकट्ठा किए गए सबूत हैं जो बताते हैं कि कुछ रोहिंग्या प्रवासियों के तार पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों और दूसरे देशों से काम कर रहे ऐसे ही संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं. यह भी कहा गया कि सांप्रदायिक और फिरकावारान खूनखराबा भड़काने की आइएसआइएस और दूसरे ''उग्रवादी गुटों" की साजिशों में रोहिंग्या के शामिल होने की सूचनाएं भी हैं.

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