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अब और भी हों कड़े कानून

आतंकवादी हिंसा को अंजाम देने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देने के लिए कानूनी प्रावधानों को अब और भी सख्त बनाने की जरूरत है.
अब और भी हों कड़े कानून कसाब
इंडिया टुडेनई दिल्‍ली, 13 January 2009

आतंकवादियों से निबटने के कानून को सख्त बनाने के सवाल पर यूपीए सरकार दुविधा में थी. लेकिन मुंबई हमले के बाद उसने तेजी दिखाते हुए इस कानून की कुछ खामियों को दूर किया. संसद ने व्यापक सहमति से राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक 2008 पारित कर दिया है और गैरकानूनी गतिविधि (निवारक) अधिनियम (यूएपीए) में संशोधन किया है. इन संशोधनों से कानून लागू करने वाली एजेंसियों को कुछ राहत मिलेगी. लेकिन हमारे यहां आतंकवाद को रोकने, आतंकवादियों को दंडित करने और उनसे बचाव से संबंधित एक व्यापक कानूनी ढांचे का अभाव है. ऐसा लगता है, हमारे कानून अभी भी आतंकवादियों से एक कदम पीछे हैं.

आतंकवादी गतिविधि निरोधक अधिनियम (पोटा) की तरह दोनों अधिनियमों में कई प्रावधान समान हैं. पोटा, जिसे 2004 में खत्म कर दिया गया था, की तरह नए कानूनों में यह प्रावधान है कि आतंक के संदिग्धों को बिना किसी आरोपपत्र के 180 दिनों तक बंद रखा जा सकता है और उनकी पुलिस हिरासत 30 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है. लेकिन इसके साथ ही, नए कानूनों में आतंकवादी गतिविधियों के लिए रेडियोऐक्टिव, परमाणु या अन्य पदार्थों के इस्तेमाल का जिक्र पहली बार किया गया है. राजीव गांधी हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की थी कि यह स्थापित करना मुश्किल है कि ''राज्‍य-व्यवस्था को आतंकित करने के लिए'' योजनाबद्ध तरीके से हत्या की गई, जैसा कि टाडा के तहत कहा गया था. यूएपीए में इस मुद्दे पर गौर करते हुए आतंकवादी कार्रवाई की परिभाषा यह दी गई हैः ''आपराधिक बल के जरिए आतंकित करने की कोशिश या किसी सार्वजनिक कर्मचारी की जान लेना'' आतंकवादी कार्रवाई है.

नई चुनौतियों से पार पाने के लिए काफी जोर-शोर से गठित की गई राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) को मजबूत बनाए जाने की जरूरत है. उसे केवल आतंकवाद के मामलों की जांच के अधिकार दिए गए हैं. इस तरह, दंतहीन एनआइए के एक और महिमामंडित पुलिस बल बन जाने का खतरा है, जो दिल्ली पुलिस के विशेष सेल या मुंबई के आतंकवाद विरोधी दस्ते से बहुत अलग नहीं होगी. एनआइए को आतंकवाद से संबंधित सभी गतिविधियों-मसलन, फंडिंग, हवाला कारोबार, जाली नोट, ड्रग के अवैध धंधे और इंटरनेट तथा सैटेलाइट फोन जैसे संचार उपकरणों के दुरुपयोग-की जांच के अधिकार दिए जाने चाहिए.

बहरहाल, संसद में आतंकवाद से संबंधित नए कानून के पारित होने के समय जनता का जो मूड था, वह उस समय ठंडा पड़ गया जब विभिन्न भाजपा शासित प्रदेशों ने एनआइए का विरोध किया. उनका कहना था कि यह कानून संघीय राज्‍य के सिद्धांतों के खिलाफ है. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एनआइए का गठन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में राज्‍यों को ''किनारे करने की कोशिश है.'' दिलचस्प बात यह है कि केरल की माकपा सरकार ने भी केंद्र के खिलाफ मोदी के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया.अपनी नीतियों को लागू करते समय और आतंकवाद से लड़ने के लिए संगठन बनाते समय हमारी आजादी और सुरक्षा के अहम्‌ लक्ष्यों पर एक मान्य हद तक आंच नहीं आनी चाहिए. संशोधित यूएपीए में कम-से-कम दो खामियां हैं जिन्हें नागरिक अधिकार और कानूनी कार्यकर्ताओं से प्रशंसा और आलोचना, दोनों मिली है. पोटा के विपरीत, यूएपीए में किसी पुलिस अधिकारी के सामने अपराध के स्वीकार को सबूत के रूप में मान्यता नहीं दी गई है. दूसरे, जहां पोटा में अदालतों को हथियार के साथ पकड़े गए अभियुक्त के खिलाफ कुछ सबूतों को ''प्रतिकूल निष्कर्ष'' के रूप में लेने की जरूरत होती है, वहीं यूएपीए अदालतों को निर्देश देता है कि वे अभियुक्त को निर्दोष साबित होने तक दोषी मानें. यह भी कि, पोटा के तहत समीक्षा समिति हर मामले का आकलन कर सकती थी. दुरुपयोग  के खिलाफ यह सुरक्षा नए यूएपीए में गायब है.

कई लोगों का विचार है कि सरकार का यह दावा खोखला है कि नागरिकों के अधिकारों का हनन नहीं होगा. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील से अपील की है कि वे इस कानून को स्वीकृति न दें क्योंकि इससे पुलिस पकड़े गए संदिग्ध आतंकवादियों को आरोप दायर करने से पहले 90 दिनों की जगह 180 दिनों तक हिरासत में रख सकती है. एमनेस्टी इंटरनेशनल में एशिया पैसिफिक प्रोग्राम की उपनिदेशक मधु मल्होत्रा कहती हैं, ''जनता के बुनियादी मानवाधिकारों के हनन के लिए सुरक्षा सरोकारों का इस्तेमाल कभी नहीं करना चाहिए.''

हालांकि पुलिस के सामने किए गए अपराध स्वीकार को मान्य बनाने के सरकार के फैसले का भाजपा ने कड़ा विरोध किया है, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे सही दिशा में उठाया गया कदम मानते हैं. इस कदम के विरोधियों का तर्क है कि जहां सरकार सबूत के रूप में कसाब के बयानों और टेलीफोन टेपों का इस्तेमाल पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए कर रही है, वहीं उसके इकबालिया बयान भारतीय अदालतों में मान्य नहीं हैं.

भारतीय पुलिस प्रणाली में खामियों के कारण यातना रोजमर्रा की बात हो गई है जिससे स्वेच्छापूर्वक दिए गए इकबालिया बयान संदेह के घेरे में आ जाते हैं. ब्रिटेन में, जहां पुलिस के सामने दिए गए इकबालिया बयान मान्य हैं बशर्ते वे जोर-जबरदस्ती या लालच में न दिए गए हों, उनकी स्वीकार्यता के सवाल का फैसला मुकदमे के भीतर एक अलग ''मिनी मुकदमे'' में किया जाता है. यहां तक कि अमेरिका में भी, प्रक्रिया के उल्लंघन या दबाव में दिया गया इकबालिया बयान मान्य नहीं है.पुलिस को छूट देने के साथ एक खतरा जुड़ा है. वह यह कि इससे पुलिस का आत्मतोष बढ़ जाएगा और वह जांच में लापरवाही बरतेगी. इकबालिया बयान प्रायः पुलिस के लिए आसान होते हैं और वह इनकी आड़ में दूसरे सबूत इकट्ठा करने की जरूरत को नजरअंदाज कर देती है. इसलिए पुलिस बल में व्यापक सुधार लाने की जरूरत है ताकि वह जोर-जबरदस्ती करके इकबालिया बयान लेने की जगह वैज्ञानिक तरीके से जांच करे और सबूत जुटाए. अदालत में इकबालिया बयान से मुकरा जा सकता है. यदि हम पुलिस सुधार लाने में निरंतर प्रगति करते हैं, तो हम बिना प्रयास के ऐसे प्रावधान बना सकते हैं जिससे हिरासत में किए गए अपराध स्वीकार को सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है.

कार्य योजना

इकबालिया बयान अगर एसपी या उसके ऊपर के पुलिस अधिकारी के सामने पर्याप्त सुरक्षा तथा पर्यवेक्षण समिति की मौजूदगी में दिया गया हो तो अदालत में सबूत के रूप में वह मान्य होना चाहिए.

आतंकवादी मामलों में मृत्युदंड पाए दोषियों को राष्ट्रपति से क्षमादान नहीं मिलना चाहिए.

सरकार को यह पक्का करना चाहिए कि आतंकवाद विरोधी कानूनों को लागू करते समय संघीय राज्‍य के सिद्धांतों का हनन न हो.

एनआइए को सीबीआइ और आइबी, दोनों के अधिकारों से लैस करना चाहिए था, अमेरिका की एफबीआइ की तर्ज पर.

आतंकवाद विरोधी कानून में टेलीफोन और ई-मेल की निगरानी और आतंकवादी गतिविधियों के लिए गैरकानूनी फंड को रोकने के लिए वित्तीय कारोबार को नियंत्रित करने के प्रावधान होने चाहिए.

गवाहों की सुरक्षा पक्की करने के लिए गवाह संरक्षण के एक व्यापक कार्यक्रम का प्रावधान होना चाहिए. 

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