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सुध लेनी होगी सुरक्षा के कमजोर कड़ियों की

भारत की सीमाएं अभी भी दरारों से भरी हैं. समुद्र के रास्ते उभरे नए खतरे के मद्देनजर तटों की सुरक्षा दुरुस्त करने की जरूरत हो गई है.
सुध लेनी होगी सुरक्षा के कमजोर कड़ियों की समुद्री सुरक्षा का सवाल
इंडिया टुडेनई दिल्‍ली, 13 January 2009

भारत एक समुद्रतटीय देश है लेकिन हम सदियों से समुद्र की उपेक्षा कर केवल जमीन की तरफ देखते रहे हैं. इसकी वजह यह है कि हमलावर हजारों वर्षों से भारत पर जमीनी रास्ते से ही हमला करते रहे हैं.

यहां तक कि आज भी अपने तीन पड़ोसियों के साथ भारत की अनसुलझी सीमाएं राष्ट्रीय सुरक्षा संसाधनों को खाए जा रही हैं और चिंता का विषय बनी हुई हैं. लेकिन राष्ट्र की समृद्धि की कुंजी 7,600 किमी लंबा समुद्रतट है. भारत में 13 बड़े और 183 छोटे बंदरगाह हैं जो समुद्री द्वार कहलाते हैं. भारत का 90 प्रतिशत से अधिक कारोबार इन्हीं के जरिए होता है. इनके बिना भारत का आर्थिक चमत्कार घटित नहीं होता.

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है. यहां मछली पकड़ने वाली तीन लाख से अधिक नौकाएं हैं. इस तरह, समुद्री वाणिज्‍य, समुद्री सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच अटूट संबंध है. आतंकवादियों ने 26 नवंबर को इस संबंध का विध्वंसक इस्तेमाल किया. उन्होंने चोरी की एक मछलीमार नौका से भारत की आर्थिक राजधानी में घुस कर मौत का नंगा नाच नाचा. यह आर्थिक आतंकवाद की बदतरीन मिसाल है.

आतंकवादियों ने सुरक्षा की दोहरी परत-12 नॉटिकल मील समुद्रतट, जिसकी निगरानी राज्‍य पुलिस करती है और 12 से 200 नॉटिकल मील, जिसकी रखवाली भारतीय तटरक्षक बल करता है-को भेद दिया क्योंकि इन दोनों एजेंसियों के पास विशाल समुद्रतट पर गश्त के लिए साधन नहीं थे.

मरीन पुलिस की अवधारणा 1993 के मुंबई सीरियल धमाकों के बाद सामने आई. उन धमाकों के लिए विस्फोटकों की तस्करी समुद्र के जरिए की गई थी. लेकिन मरीन पुलिस की अवधारणा परवान नहीं चढ़ी क्योंकि नौ समुद्रतटीय राज्‍यों के अधिकारी समुद्रतटीय पोलिसिंग में संसाधनों का निवेश नहीं करना चाहते. वह भी जब समुद्र से खतरे बढ़ते जा रहे हैं. लिहाजा, अब जरूरत मेरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (एमडीए) या समुद्री जागरूकता की है. नेशनल मेरीटाइम एडवाइजर और सुनियोजित तटीय कमान के पास इस तरह की कोई व्यवस्था होनी चाहिए ताकि समुद्री मामलों से संबंधित कम-से-कम आठ विभिन्न मंत्रालयों के बीच कारगर सामंजस्य बिठाया जा सके.

मत्स्य पोतों को ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम, जो 100 नॉटिकल मील तक काम करता है, और लांग रेंज आइडेंटिफिकेशन तथा ट्रैकर सिस्टम, जो 700 नॉटिकल मील तक काम करता है, के जरिए उन्नत बनाने की जरूरत है. इसके साथ-साथ, तटरक्षकों की शक्ति को चार गुना और कर्मियों की संख्या दोगुना बढ़ाना होगा. भारत की जल सीमा में 12 नॉटिकल मील से 200 नॉटिकल मील तक निगरानी करने वाले तटरक्षक बल के पास केवल 74 पोत, 44 विमान और 8,000 कर्मी हैं. नौसेना से हर साल सेवानिवृत्त होने वाले 5,000 अनुभवी नाविकों में से ज्‍यादातर को राज्‍य मरीन पुलिस इकाइयों में नियुक्त करने पर विचार करना चाहिए.जमीनी सीमाएं भी समान रूप से भेद्य बनी हुई हैं. पाकिस्तान के साथ भारत की 3,323 किमी लंबी सीमा लगी हुई है. इसमें विवादास्पद नियंत्रण रेखा शामिल है. कुल 2,308 किमी सीमा पर बाड़ लगाई जानी थी. लेकिन लगभग 1,900 किमी सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा हुआ है और केवल 1,800 किमी पर रोशनी की व्यवस्था है. बांग्लादेश से भारत की 4,000 किमी सीमा लगी हुई है जिसमें से केवल 2,500 किमी पर बाड़ लगी है. इसलिए बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ होती है. वोट बैंक की राजनीति और नेता-अपराधी सांठगांठ के कारण सीमाओं के कुछ हिस्सों पर कभी बाड़ नहीं लगाई जाती या ग्रामीण जीरो लाइन से पीछे कभी नहीं जाते.

भारत की नेपाल के साथ 1,751 किमी और म्यांमार के साथ 1,643 किमी सीमा लगी हुई है. ये सीमाएं अभी भी खुली हुई हैं जहां से घुसपैठ और बंदूकों की तस्करी होती है. सीमा सुरक्षा बल के पास समस्त पश्चिमी और पूर्वी सीमा, जो 7,000 किमी से अधिक लंबी है, की निगरानी के लिए 157 बटालियनें हैं. उसका कहना है कि उसके पास कर्मियों का अभाव है. उसे तुरंत 69 और बटालियनों या कम-से-कम 69,000 और कर्मियों की जरूरत है.

भेद्य समुद्रतट से देश के आंतरिक भाग की तरफ बढ़ें तो भारत की अवसंरचना में उछाल दिखेगी. लेकिन इस अवसंरचना को उसका कमजोर पहलू कहा जा सकता है क्योंकि वह सुरक्षा में कभी निवेश नहीं करता. नागरिक उड्डयन सेक्टर को छोड़ दूसरी कोई भी सरकारी एजेंसी प्राइवेट बिजली परियोजनाओं, शॉपिंग मॉल्स, मल्टीप्लेक्सेज, आइटी पार्कों और पांच सितारा होटलों का सुरक्षा मूल्यांकन नहीं करती. अमेरिका के आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय ने 9/11 के बाद अहम्‌ अवसंरचना संरक्षण को संघीय, प्रादेशिक और स्थानीय सरकार की साझ जिम्मेदारी बना दिया है. इसमें निजी क्षेत्र की सक्रिय साझेदारी है.

भारत में इस खाई को तुरंत पाटा जाना चाहिए. मसलन, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल केंद्र सरकार की ज्‍यादातर केंद्रीय अवसंरचना की रखवाली करता है जिसमें हवाईअड्डे और बिजली संयंत्र शामिल हैं. उसके पास लगभग एक लाख कर्मी हैं लेकिन महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रक्षा के लिए 20,000 और कर्मियों की जरूरत है.सरकार को चाहिए कि वह सीआइएसएफ को प्राइवेट सेक्टर की अवसंरचना संबंधी बड़ी परियोजनाओं की खामियों के व्यापक आकलन और परियोजनाओं की अवधारणा के समय से ही उसमें सुरक्षा जोड़ने का अधिकार दे दे. अधिक कर्मियों की मांग वाली सुरक्षा की जरूरत में कमी लाने के लिए निगरानी कैमरों, इलेक्ट्रॉनिक पेरीमीटरों और मोशन डिटेक्टरों सरीखे उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है. ये मार्गनिर्देश भावी हमलों को रोकने में काफी कारगर साबित हो सकते हैं.

कार्य योजना

सीमा पर प्राथमिकता के आधार पर बाड़ लगाई जानी चाहिए.

सीमा सुरक्षा बढ़ाने और सरकारी तथा निजी अवसंरचना परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए सीआइएसएफ और बीएसएफ में कर्मियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए.

बड़े अहम
प्रतिष्ठानों की शिनाख्त और सुरक्षा की जानी चाहिए. कर्मियों की संख्या घटाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

परियोजनाओं
को मंजूरी देने से पहले सुरक्षा इंजीनियरिंग अनिवार्य बना दी जानी चाहिए.

तटीय कमान
और मेरीटाइम एडवाइजर को तटीय मुद्दे देखने वाले आठ मंत्रालयों के संपर्क में रहना चाहिए.

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