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गृह मोर्चे पर स्थिति संभालें चिदम्‍बरम

गृह मंत्रालय और संबंधित एजेंसियों को चुस्‍त दुरुस्‍त बनाने की जरूरत है. सबसे ज्‍यादा जरूरत यह है कि भारत बड़े आतंकवादी हमलों से निपटने के लिए एक समग्र आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था कायम करे.
गृह मोर्चे पर स्थिति संभालें चिदम्‍बरम गृहमंत्री पी चिदम्‍बरम के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
इंडिया टुडेनई दिल्‍ली, 13 January 2009

हमारे केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिंदबरम बखूबी जानते हैं कि मई, 2009 में होने वाले आम चुनावों की वजह से उनके पास उपलब्धि के नाम पर  कुछ कर दिखाने के लिए बहुत कम समय बचा है. यदि वे ऐसा कर पाते हैं तो यह एक लिहाज से संयोग ही होगा. वजह यह है कि मुंबई हमलों के बाद भारत को जिस चीज की जरूरत है, वह है कार्रवाई करने की और वह भी तुरंत. महज एक महीना पहले ही गृह मंत्रालय की कमान थामने वाले चिदंबरम ने 6 जनवरी को आंतरिक सुरक्षा को लेकर बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में कहा कि उनकी फौरी प्राथमिकता दिनोदिन अत्याधुनिक होते जा रहे आतंकवादी खतरों से निबटने के लिए तैयारियों के स्तर को बढ़ाना है. लेकिन उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी आतंकवादी खतरे या हमले के बाद तुरंत और निर्णायक कार्रवाई करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

देश में आत्मविश्वास का फिर से संचार करने के लिए ये दोनों कदम बहुत महत्वपूर्ण हैं. मुंबई हमलों के बाद इस आत्मविश्वास को जबरदस्त धक्का लगा था. लेकिन चिदंबरम ने अपने और अपनी सरकार के लिए जो कड़ा एजेंडा तैयार किया है, उस पर अमल करना शुरू करने के साथ-साथ उन्हें अपने मंत्रालय के कामकाज की और अधिक बारीकी से समीक्षा करने की जरूरत है.

आतंक के खिलाफ लड़ाई को अगर विजय की मंजिल तक ले जाना है तो केंद्रीय गृह मंत्रालय को बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रबंधन को जो रोग लगा हुआ है, यह मंत्रालय उसका सटीक उदाहरण है. मुंबई हमलों से छह महीने पहले दिल्ली, जयपुर, बंगलुरू अहमदाबाद और गुवाहाटी में बम विस्फोट हुए, जिनमें 215 लोग मारे गए और 1,000 घायल हुए. इन  हमलों के बाद हमेशा की तरह ही 'सुरक्षा को लेकर समीक्षा' की खातिर कई बैठकें हुईं, जिनमें एक से दूसरे अधिकारी पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चलता रहा और किसी की जवाबदेही तय नहीं की गई. इसके साथ ही राज्‍यों को ये रटे-रटाए निर्देश भेज दिए गए कि वे अपनी सुरक्षा कड़ी करें और इसके बाद यह जानने की जरूरत नहीं समझी गई कि इस मामले में क्या प्रगति हुई है.मुंबई हमलों के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि गृह मंत्रालय को अपने दृष्टिकोण में क्रांतिकारी बदलाव लाने की जरूरत है. इस समय इसके अंतर्गत कई मामले आते हैं. आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद के अलावा इसके कामकाज में जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्‍यों में बगावत, वामपंथी उग्रवाद, सीमा प्रबंधन, आप्रवासन, विदेशी पैसा, केंद्र-राज्‍य संबंध, केंद्रशासित क्षेत्र, भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) और केंद्रीय अर्द्ध-सैनिक बलों का प्रबंधन, पुलिस आधुनिकीकरण और नीति नियोजन शामिल हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में यह मंत्रालय इस कदर विशालकाय बन गया है, जिसे संभाल पाना मुश्किल हो गया है. नतीजा यह है कि उसने पुलिस के आधुनिकीकरण सरीखे महत्वपूर्ण सुझवों को लटकाए रखा है, वह न तो केंद्र में और न ही राज्‍य स्तर पर खुफिया एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र की लड़ाई सुलझने की दिशा में कोई कदम उठा पाया है. इसके अलावा वह आतंकवाद विरोधी कोई कारगर नीति तैयार करने में भी नाकाम रहा.

9/11 के बाद अमेरिका में जॉर्ज बुश प्रशासन ने फैसला किया था कि उसे एक महत्वपूर्ण होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट की जरूरत है, जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति की राय में, ''अमेरिका अधिक सुरक्षित बनेगा क्योंकि हमारे राष्ट्र में एक ऐसा विभाग होगा जिसका मकसद अमेरिकी होमलैंड की रक्षा करना है.'' बुश ने फैसला किया कि अमेरिका की सीमा, परिवहन क्षेत्र, बंदरगाहों और महत्वपूर्ण स्थलों को सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ एक विभाग होगा. इसके अलावा उसके पास  विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त देश की खुफिया सुरक्षा जानकारी को जुटाने और उसका विश्लेषण करने, सर्वप्रथम आकांक्षियों को प्रशिक्षित कर उन्हें हथियारों से लैस करने और संघीय स्तर पर आपात काल के प्रबंधन का काम होगा.

जाहिर है, अमेरिका की अपने देश की सुरक्षा समीक्षा से भारत भी बहुत कुछ सीख सकता है. इस तथ्य के मद्देनजर कि भारत में नौकरशाही में ज्‍यादा बाधाएं पैदा करने की प्रवृत्ति है, समस्या का समाधान शायद यह है कि गृह मंत्रालय के दूसरे कार्यों से आंतरिक सुरक्षा को अलग कर दिया जाए. अमेरिका का होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट पुलिस आधुनिकी-करण, वस्तुओं की प्राप्ति और अन्य कार्यपालक काम नहीं करता. इसलिए अगर भारत में भी आंतरिक सुरक्षा के लिए पूर्णकालिक कैबिनेट मंत्री बना दिया जाए तो शायद समस्या सुलझने में मदद ही मिलेगी. इसका गृह मंत्रालय से किसी प्रकार का संबंध नहीं होगा.

गृह मंत्रालय की कुर्सी संभालने के थोड़े दिन बाद ही चिंदबरम ने एक नेशनल इनवेस्टिगेटिव एजेंसी का गठन करवाने की कार्रवाई शुरू कर दी. यह एजेंसी देश भर में आतंकवादी मामलों की पड़ताल करेगी, गृह मंत्री ने मल्टी-एजेंसी सेंटर (मैक) को पुनः सक्रिय कर और उसे जवाबदेह बनाकर खुफिया एजेंसियों के बीच जानकारी का साझ करना और बेहतर समन्वयन स्थापित करना भी पक्का किया. आतंक को रोकने के लिए अब पूरा जोर गुप्तचर संस्थाओं के बीच अधिक समन्वय और जानकारी के आदान-प्रदान पर ही दिया जा रहा है. चिदंबरम ने लाल-फीताशाही को दरकिनार करते हुए अर्ध सैनिक बलों के लिए अरसे से लंबित और बेहद जरूरी उपकरण बुलेटप्रूफ जैकेट और राइफलें मंगाने की भी मंजूरी दी है.
निश्चय ही इन कदमों से बहुत अंतर पड़ेगा. लेकिन गृह मंत्रालय में बुनियादी ढांचागत और कार्मिक बदलाव लाना भी उतना ही जरूरी है. और बदलाव की शुरुआत इसके शीर्ष पर बैठे लोगों से हो सकती है. मंत्रालय में आठ विशेष और अतिरिक्त सचिवों तथा 20 संयुक्त सचिवों में से सिर्फ दो ही पेशेवर रूप से पुलिस अधिकारी हैं. सचिव मधुकर गुप्ता से शुरू करें तो लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर आइएएस अधिकारी ही बैठे हैं जिन्हें सुरक्षा मुद्दों से निबटने का जरा भर अनुभव नहीं है. कश्मीर, उत्तर-पूर्व, नक्सलवादियों और सीमा प्रबंधन सरीखे महत्वपूर्ण मामले संभालने वाले सभी अधिकारी प्रशासनिक सेवा से आए हैं. आधुनिकीकरण के कार्यक्रम को सबसे अधिक नुक्सान इसलिए पहुंचा है कि उसके प्रभारी अधिकतर अधिकारियों में इस मामले में ज्ञान और फील्ड अनुभव का अभाव है. इस असंतुलन को तुरंत ठीक किए जाने की जरूरत है. आतंरिक सुरक्षा विभाग को विशेषज्ञों की ऐसी संस्था में तब्दील किए जाने की जरूरत है जो आतंकवाद, बगावत और सीमा पर अवैध घुसपैठ से निबटने में सक्षम हो.

इसके अलावा, प्राथमिकता वाले कई दूसरे मुद्दे भी हैं, जिन्हें जरूरी है कि गृह मंत्रालय देखे. फिलहाल ऐसी कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है, जो अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर कर सके. राष्ट्रीय सुरक्षा में वृद्धि, नागरिक पहचान के प्रबंधन और ई-प्रशासन की सुविधा के उद्देश्य से सन्‌ 2002 से देश के वैध नागरिकों को बहुपयोगी राष्ट्रीय पहचान पत्र (एमएनआइसी) जारी करने के प्रयास शुरू किए गए थे. तब 5,000 करोड़ रु. के अनुमानित बजट वाली इस महत्वपूर्ण योजना के पहले चरण में अभी तक सरकार सिर्फ 12 लाख पहचान पत्र ही जारी कर पाई है. पासपोर्ट, राशन कार्ड या किसी और दस्तावेज की बजाए इन कार्डों को ही पहचान का बुनियादी दस्तावेज माना जाना चाहिए.

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह परियोजना कई मंत्रालयों  के अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में उलझकर रह गई है. इन मंत्रालयों में सूचना और प्रौद्योगिकी, गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग शामिल हैं. एक निश्चित समयावधि में सभी नागरिकों को एमएनआइसी जारी कर दिए जाने चाहिए. राशन कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस अथवा पैन कार्ड की बजाए यह कार्ड नागरिक की पहचान स्थापित करने का पुख्ता दस्तावेज होना चाहिए.मुंबई हमलों के दौरान पुलिस और सुरक्षाकर्मियों की जवाबी कार्रवाई में सुस्ती एकदम नजर आई थी. जरूरत इस बात की है कि वर्तमान पुलिस बलों को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए तत्काल पैसा मुहैया कराया जाए. गृह मंत्रालय ने 2008-09 में राज्‍य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए 1,300 करोड़ रु. का प्रावधान रखा है. पिछले पांच वर्ष में यह राशि बढ़कर करीब-करीब दोगुनी हो गई है. यह पैसा एक से दूसरी जगह पर पुलिस जवानों की आसानी से आवाजाही, आधुनिक हथियारों, संचार प्रणाली, प्रशिक्षण, बुनियादी सुविधाओं, अपराध विज्ञान की प्रयोगशालाओं, खुफिया शाखाओं की मजबूती, सुरक्षा उपकरणों, थाना भवनों का निर्माण करने और निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के लिए आवासीय भवन बनाने में खर्च किए जाने के लिए रखा गया है.

समस्या यह है कि राज्‍यों या फिर कहें कि केंद्र की किसी तरह की जवाबदेही नहीं है. इस तथ्य की जांच करने या यह देखने के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है कि राज्‍य उस पैसे को लेकर क्या कर रहे हैं. गृह मंत्रालय को अपना वार्षिक लेखा-जोखा करना चाहिए, जिसके अंतर्गत वरिष्ठ अधिकारी खुद उन राज्‍यों में जाकर पड़ताल और निरीक्षण करें कि राज्‍य आधुनिकीकरण के लिए दिए गए पैसे का किस तरह उपयोग कर रहे हैं. इससे मंत्रालय में विभिन्न सचिवों और संयुक्त सचिवों के स्तर पर जवाबदेही की व्यवस्था भी लागू होगी.

जिम्मेदारी तय करने की दोषरहित व्यवस्था लागू करने की भी जरूरत है. मुंबई पर आतंकवादी हमलों के बाद विभिन्न एजेंसियों और अधिकारियों की प्रतिक्रिया जानी-पहचानी थी-आइबी से लेकर रॉ और नौसेना और कोस्ट गार्ड (तट रक्षक) तक ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू कर दिया. अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि किससे और कहां पर गलती हुई. अब तक जवाबदेही निर्धारित कर दी जानी चाहिए थी और कुछ लोगों की गर्दन भी नाप दी जानी चाहिए थी. कायदे से तो एक समयबद्ध जांच आयोग गठित कर दिया जाना चाहिए था जो यह देखता कि कहां गलती हुई और हमला रोका क्यों नहीं जा सका. इसके अलावा उसे यह भी सोचना चाहिए था कि ऐसे हमलों को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है. अमेरिका में  9/11 के बाद ऐसा ही हुआ था.किसी को भी न बख्शते हुए आयोग को उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो अपने कर्तव्य के पालन में शिथिल पाए गए. इसके अंतर्गत आइबी, रॉ, महाराष्ट्र पुलिस, नौसेना और कोस्ट गार्ड समेत सारी एजेंसियां आएंगी. यहां तक कि जरूरत पड़ने पर राजनीतिकों से भी जवाब तलब किया जाना चाहिए. जब तक कड़े कदम नहीं उठाए जाते, गृह मंत्रालय एक से दूसरे संकट में फंसता रहेगा और भारत इसका खामियाजा भुगतता रहेगा.

 कार्य योजना

सौंपें
विशेषज्ञों और पुलिस विभाग के उन अधिकारियों को गृह मंत्रालय में गृह सचिव समेत महत्वपूर्ण विभागों का जिम्मा, जिन्हें सुरक्षा और आतंकवाद से निबटने का खासा अनुभव हासिल हो.

अमल करें पुलिस सुधारों को लेकर आई रिपोर्टों पर और साथ ही बहुउद्देशीय राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करें.

पक्का करें विभिन्न गुप्तचर एजेंसियों के बीच तालमेल की व्यवस्था और यह स्पष्ट संदेश दें कि आंतकी हमलों को हर कीमत पर रोका जाए अन्यथा किसी न किसी की गर्दन जरूर नापी जाएगी.

लालफीताशाही को आंतरिक सुरक्षा के लिए खरीदारी में दरकिनार करने की जरूरत है.

बरखास्त करें उन अधिकारियों को जो आतंकवादी हमले रोक पाने में लापरवाही बरत रहे हों.

अलग करें आंतरिक सुरक्षा को, गृह मंत्रालय के दूसरे कार्यों से.

विशेषज्ञों की राय

चोटी के पूर्व पुलिस अधिकारी और खुफिया विशेषज्ञ देश की सुरक्षा में आमूल परिवर्तन चाहते हैं.

जी.सी. सक्सेना
पूर्व रॉ प्रमुख

1. आतंकवाद से निबटने का एकल केंद्र होना चाहिए, जो खुफिया जानकारी जुटाने, उसे बांटने और समन्वय  के लिए जिम्मेदार हो.
2. महत्वपूर्ण स्थानों पर अच्छी तरह प्रशिक्षित और उपकरणों से लैस क्यूआरटी हो.

के. सुब्रमण्यम
सुरक्षा विशेषज्ञ

1. आंतरिक सुरक्षा के मामले देखने के लिए एक पूर्णकालिक कैबिनेट मंत्री होना चाहिए.
2. गृह मंत्रालय में राष्ट्रीय सुरक्षा के विशेषज्ञ अधिकारियों का एक समर्पित कॉडर हो.

गोपाल शर्मा
पूर्व डीजीपी, जम्मू-कश्मीर

1. छह महीने के भीतर सभी भारतीय नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र दिया जाए.
2. विशेष कार्य बलों में सुधारकर उनमें योग्यता और विशिष्टता लाई जाए. 

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