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दूरसंचार विभाग: घोटालों से सनी राजनीति

एक अनूठे घटनाक्रम में सरकार ने पहले तो दूरसंचार विभाग पर छापे मारने की अनुमति दी मगर प्रधानमंत्री तुरंत दूरसंचार मंत्री के बचाव में उतर आए. राजनीति और कंपनियों के बीच प्रतिद्वंद्विता के इस बनते-बिगड़ते मिश्रण ने यूपीए के लिए परेशानी खड़ी कर दी है.
दूरसंचार विभाग: घोटालों से सनी राजनीति दूरसंचार मंत्री ए. राजा
शंकर अय्यरनई दिल्‍ली, 03 November 2009

" "पारंपरिक बुद्धि का यही मानना है कि राजनीति अर्थव्यवस्था की दिशा निर्धारित करती है. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए ने इस कहावत को सिर के बल खड़ा कर दिया है. अर्थशास्त्र या कहिए कि व्यवसाय का छद्म अर्थशास्त्र गठबंधन राजनीति की दिशा निर्धारित कर रहा है. अन्यथा क्या वजह है कि कोई सरकार अपने कार्यकाल में लिए एक फैसले में सीबीआइ को मामला दायर करने की इजाजत दे और बाद में संबंधित मंत्री के बचाव में उतर आए. यह तो कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता. दूरसंचार विभाग पर छापे और देश भर के 19 संस्थानों में तलाशी अभियान संभवतः तथ्यों और कानूनी तर्कों पर आधारित है.

विपक्ष का ए. राजा के इस्‍तीफे की मांग
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन है और सामान्य तौर पर अपने कैबिनेट सहयोगी के खिलाफ मामला चलाने के लिए उनकी मंजूरी मिल जानी चाहिए थी. लेकिन 22 अक्तूबर को दूरसंचार विभाग पर छापों के अगले ही दिन मनमोहन सिंह का कहना था कि कोई घोटाला है ही नहीं. इसे अब तक का 'सबसे बड़ा घोटाला' करार देकर दूरसंचार मंत्री ए. राजा के इस्तीफे की मांग कर रहे विपक्ष के आश्चर्य का उस समय कोई ठिकाना नहीं रहा, जब मनमोहन सिंह अपने सहयोगी के बचाव में आ खड़े हुए और उन्होंने थाइलैंड में पत्रकारों से कहा, ''विपक्ष जो कहता है, वह सब सच तो नहीं होता.''

कहीं कांग्रेस का घोटाला तो नहीं?
जो चीजें सामने नजर आ रही हैं, जरा उन पर गौर कीजिए. भाजपा का कहना है कि यह 60,000 करोड़ रु. का घोटाला है. सीबीआइ इसे 22,000 करोड़ रु. का घोटाला मानती है. लेकिन प्रधानमंत्री का, जिनके प्रति सीबीआइ जवाबदेह है, कहना है कि कोई घोटाला ही नहीं है. इस बीच द्रमुक को हैरानी है कि कहीं यह कांग्रेस का घोटाला तो नहीं है. हां, सबसे अजीब बात इस मामले के समय को लेकर है, जिससे जरूर कौतूहल पैदा होता है. द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री से अपनी नाराजगी जताने में जरा भर भी संकोच नहीं किया. दरअसल, छापों के अगले ही दिन संसद में द्रमुक के नेता टी.आर. बालू ने श्रीलंकाई शरणार्थियों के मुद्दे पर हुई बैठक के बाद प्रधानमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं पर व्यंग्य कसते हुए कहा भी, ''क्या हम सहयोगी दल हैं? क्या अब भी इसे गठबंधन कहेंगे?''

नहीं हुई थी स्‍पेक्‍ट्रम की नीलामी
दिनांक 21 अक्तूबर, 2009 को दायर की गई प्राथमिकी (जिसमें दूरसंचार विभाग के अज्ञात अधिकारियों, व्यक्तियों/कंपनियों पर सरकार को धोखा देने के लिए षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया गया है) के मुताबिक, स्पेक्ट्रम को सस्ती कीमत पर बेचा गया और इसकी नीलामी नहीं की गई, और यह कि पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर कुछ कंपनियों को तरजीह दी गई. फर्जी यूएएस लाइसेंसों के आवंटन पर संदेह 2 नवंबर, 2007 से किया जा रहा है. स्पेक्ट्रम का आवंटन मंत्रियों के एक समूह की निगरानी में हो रहा था और संचार मंत्री का दावा है कि ''लाइसेंस मुद्दे की प्रक्रिया की सूचना प्रधानमंत्री को दी गई थी.'' चूंकि मामला तब अदालत में था इसलिए राजा ने तत्कालीन सॉलिसीटर जनरल (महाधिवक्ता) गुलाम वाहनवती से सलाह मांगी थी, जो अब महान्यायवादी हैं.जाहिर है, इसका कोई फायदा नहीं हो सका. घोटाले की कहानी इस संदेह से उपजती है कि कंपनियों को सस्ते लाइसेंस दिए गए और उन्होंने अपनी इक्विटी को भुनाया. मिसाल के तौर पर, स्वान और यूनिटेक नाम की कंपनियां को 1,658 करोड़ रु. की रकम का भुगतान करने के बाद लाइसेंस मिले. इसके बाद ही स्वैन ने यूएई की एतीसालात को 45 फीसदी हिस्सेदारी की एवज में 4,500 करोड़ रु. की साझीदार के रूप में शामिल करने के लिए नई इक्विटी जारी की, जबकि यूनिटेक ने नार्वे की कंपनी टेलेनर को 6,120 करोड़ रु. मूल्य की इक्विटी जारी की. रातोरात उद्यमियों ने बाहर निकले बिना अपने संलग्नकों को 2 अरब डॉलर की संपत्ति में बदल दिया, जिससे मिलीभगत अथवा 'तुम मेरा काम करो, मैं तुम्हारा' अपनाए जाने का शक हुआ. लेकिन नियमों के मुताबिक, प्रमोटरों को अपने शेयर  बेचने की मनाही है. इसके अलावा पैसा नए इशू जारी करके जुटाया गया. संयोग से विदेशी सहयोगियों को लाने वाली अकेला ये दो कंपनियां ही नहीं थीं. टाटा टेलीसर्विसेस ने जापान की प्रमुख दूरसंचार कंपनी डो को मो को 2.7 अरब डॉलर के निवेश के साथ 26 फीसदी हिस्सेदारी के लिए राजी कर लिया. इस तरह लाइसेंस का मूल्य बढ़कर 10 अरब डॉलर हो गया.

विदेशी विनिवेश का मामला
दरअसल, लगभग हर ऑपरेटर ने अपनी हिस्सेदारी को विदेशी कंपनियों और विदेशी संस्थागत निवेशकों के पक्ष में विनिवेश किया. राजा सवाल उठाते हैं, ''देश को यह जानने का हक है कि अपने शेयर विदेशी निवेशकों को सौंपकर इन कंपनियों के प्रमोटरों ने कितना पैसा कमाया है.'' आवंटनों का मुद्दा राजा को लिखे पत्रों में प्रधानमंत्री ने उठाया था और यह सरकार तथा संसद के भीतर चर्चा का भी मुद्दा रहा है. मौजूदा ऑपरेटरों का कहना है कि स्पेक्ट्रम की नीलामी की जानी चाहिए थी, लेकिन राष्ट्रीय दूरसंचार नीति (एनटीपी) 1999 के जरिए अपने बच निकलने के मामले में वे चुप्पी साध जाते हैं, जब सरकार ने लाइसेंस फीस में 15 वर्षों से देय लगभग 50,000 करोड़ रु. के बकायों को माफ कर दिया था और उसकी जगह मुनाफे में हिस्सेदारी वाली एक व्यवस्था अपनाई थी. लाइसेंस के तहत एक कंपनी (खिलाड़ी) को महज 4.4 मेगाहर्ट्‌ज का अधिकार था लेकिन 2001 और 2003 के बीच ऑपरेटरों को किसी तरह की मंजूरी के बिना ही अतिरिक्त 2.2 मेगाहर्ट्‌ज प्रदान कर दिए गए.

स्पेक्ट्रम सस्ते बेचने के आरोप से बौखलाए राजा
विडंबना यह है कि राजा ने ही अतिरिक्त स्पेक्ट्रम की कीमत का मुद्दा उठाया था और अतिरिक्त स्पेक्ट्रम के लिए समुचित मूल्य फॉर्मूला तैयार करने के उनके अनुरोध पर टीआरएआइ काम कर रही है. स्पेक्ट्रम सस्ते बेचने के आरोप से बौखलाए राजा ने प्रधानमंत्री और सीबीआइ को पत्र लिखकर 1999 से अतिरिक्त स्पेक्ट्रम के आवंटन को जांच के दायरे में शामिल करने का अनुरोध किया है. विपक्ष ने इसे घोटाला बताने में जरा भी देर नहीं की, जबकि असलियत यह है कि दूरसंचार नीति में दो बड़े बदलाव-एनटीपी 99 और यूएएस लाइसेंस व्यवस्था-क्रमशः 1999 और 2003 में राजग शासन की ही देन है, जिससे उस पर पूंजीपतियों से दोस्ती गांठने के आरोप भी लगे. इसमें कोई शक नहीं कि खनिज, जमीन और स्पेक्ट्रम जैसी राष्ट्रीय संपदा का अच्छा मूल्य निर्धारित होना चाहिए. लेकिन यह उपभोक्ताओं के हितों के अनुकूल होना चाहिए, यह निहित स्वार्थों की सुविधानुसार नहीं होना चाहिए. सारा ध्यान नियामकों पर है, जिन्होंने अपने आकलन में जन संसाधनों को निजी कंपनियों के लाभ में बदल दिया है.दिलचस्प यह भी है कि 19 अक्तूबर को यानी छापों से दो दिन पहले आर्थिक मामलों से संबंधित कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने यूनिटेक वायरलेस के आवेदन की जांच की और उसे ''टेलेनर एशिया, सिंगापुर की विदेशी हिस्सेदारी बढ़ाने की मंजूरी लेने की इस हद तक इजाजत दे दी, कि उसकी प्रत्यक्ष और परोक्ष हिस्सेदारी 74 फीसदी तक हो जाए. सीसीईए को भेजे गए प्रस्ताव को, जिसमें यूनिटेक का इतिहास और इसके लाइसेंस पाने का ब्यौरा था, गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग, विदेश मंत्रालय (विदेशी निवेश इकाई) और नीति एवं प्रोत्साहन विभाग की भी मंजूरी मिल गई. महत्वपूर्ण यह है कि सीसीइए को टेलेनर द्वारा निवेश किए जाने पर सवाल उठाने की वजह नहीं मिली.

सहयोगियों को औकात दिखाने का खेल
'क्यों' और 'अभी ही क्यों' ऐसे सवाल हैं जो द्रमुक अपनी सहयोगी कांग्रेस से पूछ रही है. वह यह सोचकर हैरान है कि कहीं वह क्षुब्‍ध राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की श्रेणी में शामिल तो नहीं हो गई है. राजा और द्रमुक तमिलनाडु में कांग्रेस की महत्वाकांक्षाओं की अटकलों और इस कदम के समय को लेकर ही भयभीत हैं. वैसे, दूसरे नजरिए से देखें तो कांग्रेस की ओर से यह गलती भी हो सकती है, कम से कम कांग्रेस के बड़े नेता द्रमुक सुप्रीमो से तो यही कह रहे हैं. हालांकि दिल्ली में जोरदार अटकलें लगाई जा रही हैं और कहा जा रहा है कि यह कांग्रेस के अपने सहयोगियों को औकात दिखाने की महत्वाकांक्षा का हिस्सा है. और गुजरती हर घटना षड्यंत्र के सिद्धांत में जगह पाती जा रही है. वह चाहे नोएडा में मायावती द्वारा बनाए जा रहे स्मारकों को पर्यारणीय मंजूरी देने की बात हो या तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा ममता बनर्जी का सिलीगुड़ी प्रकरण और मुंबई में राकांपा की यंत्रणादायक परीक्षा हो. उत्तर प्रदेश में भी नया मोर्चा खुल गया है जहां यादव वंशवाद को कांग्रेस वंशवाद से चुनौती के चलते समाजवादी पार्टी को परेशान किया जा रहा है.

कांग्रेस को करनी चाहिए निष्‍पक्ष जांच की वकालत
वजह चाहे जो भी हो, विपक्ष (वाम और दक्षिणपंथी दोनों) की गैर मौजूदगी से फूली कांग्रेस खुद को मनमौजी स्थिति में पा रही है. यदि कोई दूसरी योजना भी है तो वह ठंडे बस्ते में डाल दी गई है. यदि उसका मानना है कि कोई घोटाला हुआ भी है तो कांग्रेस को एक निष्पक्ष जांच की वकालत करनी चाहिए. लेकिन यदि ऐसा नहीं है और कांग्रेस की दृढ़ोक्तियों में सचाई है तो कहा जा सकता है कि पार्टी के एक खेमे ने एजेंडे को हथिया लिया है. यह याद रखना पार्टी के हित में ही होगा कि 1980 के दशक में जब उसे 400 से अधिक सीटें मिली थीं, कॉर्पोरव्ट महायुद्ध में कूद कर उसने खुद विपक्ष तैयार कर लिया था. अन्यथा इस घोटाले की क्या व्याख्या की जा सकती है? आखिर बोफोर्स जैसे मुद्दों से सफलतापूर्वक निबट लेने वाली सरकार संसद सत्र से महज कुछ हफ्ते पहले एक घोटाला उजागर कर भाजपा को जीवनदान क्यों देगी.

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