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संजय दत्त के नाना जद्दनबाई से शादी के लिए बन गए थे मुसलमान

पुनीत उपाध्याय
28 June 2018
संजय दत्त के नाना जद्दनबाई से शादी के लिए बन गए थे मुसलमान
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राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी "संजू" आज रिलीज हो गई है. संजय दत्त को उनके अभिनय, कॉन्ट्रोवर्सी के  अलावा सुनील और नरगिस की विरासत के लिए जाना जाता है. संजय का परिवार एक लंबे वक्त से फिल्म और कला के क्षेत्र से जुड़ा है. संजय के पिता सुनील दत्त एक सफल एक्टर होने के साथ दिग्गज नेता भी थे. मां नरगिस को भारतीय सिनेमा की बड़ी अभिनेत्रियों में गिना जाता है. इसके अलावा बहुत कम लोगों को पता होगा कि संजय की नानी जद्दनबाई भी अपने जमाने की बहुत बड़ी कलाकार थीं. संजय के नाना ने जद्दनबाई से शादी करने के लिए अपना धर्म तक बदला था.
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संगीत में जद्दनबाई की रुचि, मां की वजह से थी. उनकी मां भी गायिका थीं. मां की राह पर चलते हुए जद्दनबाई ने भी संगीत को ही अपना प्रोफेशन बनाया. इसमें उन्हें जगह-जगह पर जा कर परफॉर्म करना होता था. ऐसे में कई दफा वो अजनबियों से ठगी का शिकार भी हो जाया करती थीं. नरगिस की मां जद्दन की शादी का किस्सा बेहद रोचक है.
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एक बार नरगिस की मां जद्दनबाई की मुलाकात मोहनचंद उर्फ मोहन बाबू से हुई. मोहन बाबू, रावलपिंडी के एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखते थे. वह डॉक्टर बनने के लिए इंग्लैंड जाने की तैयारी में भी थे. लेकिन जद्दनबाई ने मोहन बाबू को शादी के लिए प्रपोज किया. जिसे उन्होंने मान लिया. हालांकि मोहन बाबू का परिवार इस बात से खफा हो गया. पर उन्होंने अपने परिवार के खिलाफ जाकर जद्दनबाई से शादी की. इस शादी के लिए मोहन बाबू ने अपना धर्म भी बदल लिया था.
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मोहन बाबू ने अपने से 4 साल बड़ी जद्दनबाई से शादी करने के लिए इस्लाम धर्म अपना लिया. बाद में वो अब्दुल राशिद के नाम से जाने गए. शादी के बाद 1 जून 1929 को उनके घर में बच्ची ने जन्म लिया. यह बच्ची कोई और नहीं संजय दत्त की मां नरगिस थीं. चूंकि नरगिस का जन्म हिंदू और मुस्लिम परिवार की जड़ों से था, इसलिए दोनों धर्मों के आधार पर उनका नामकरण हुआ.
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नरगिस का एक नाम फातिमा अब्दुल राशिद रखा गया और दूसरा नाम तेजस्वरी मोहन रखा गया. बाद में यही बच्ची बड़ी होकर भारतीय सिनेमा के चमकते सितारों में शुमार हुई. नरगिस फ़िल्मी नाम था.
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जद्दन के फ़िल्मी सफर की बात करें तो वो 1932 में लाहौर गईं और उन्होंने 1933 की फिल्म ''राजा गोपीचंद'' में एक महत्वपूर्ण रोल प्ले किया. 1934 में वो परिवार के साथ मुंबई शिफ्ट हो गईं. मुंबई उस समय सिनेमा के क्षेत्र में काफी तेजी से विकसित हो रहा था. जद्दन बाई एक साहसी और सशक्त महिला थीं.
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उन्होंने मुंबई जा कर ''संगीत मूवीटोन'' नाम की एक कंपनी खोली और ''तलाश-ए-हक'' नाम की एक फिल्म भी बनाई. इसके बाद उन्होंने कई सारी फिल्में बनाई और अपने आप को एक फिल्म प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, एक्टर और म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में स्थापित किया. यासीर उस्मान ने अपनी किताब 'Sanjay Dutt: The Crazy Untold Story of Bollywood’s Bad Boy'' में इन सब बातों का किक्र किया है. हालांकि ये किताब विवादों में है. संजय दत्त, किताब में दर्ज तमाम तथ्यों को मनगढ़ंत करार दे चुके हैं.
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