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इन 7 वजहों से 'न्यूटन' को मिलना चाहिए ऑस्कर

24 September 2017
इन 7 वजहों से 'न्यूटन' को मिलना चाहिए ऑस्कर
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राजकुमार राव की फिल्म 'न्यूटन' ऑस्कर में जा रही है. फिल्म को भारत की तरफ से बेस्ट फॉरेन फिल्म कैटेगरी में नामित किया गया है. हालांकि फिल्म के कंटेंट को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं कि इसे ईरानी फिल्म 'सीक्रेट बैलेट' से चोरी किया गया है, लेकिन फिल्म के मेकर्स इस बात से इन्कार कर रहे हैं. असलियत जो भी हो, लेकिन न्यूटन में ऐसी 7 बातें हैं, जिनकी वजह से यह ऑस्कर पाने का हकदार है.
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यह एक ब्लैक कॉमडी है. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे इस देश में गरीबों को न्याय नहीं मिलता. भारत भले ही विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हो, लेकिन अगर देश के किसी हिस्से में हो रहे मतदान में लोगों को यह नहीं पता है कि वो किसको अपना वोट दे रहे हैं, या वोट देते समय वो दहशत में हैं तो इस लोकतंत्र का क्या फायदा.
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फिल्म में आपको बेहतरीन डायलॉग्स मिलेंगे. मयंक तिवारी का स्क्रीनप्ले फिल्म का प्लस प्वाइंट है.
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फिल्म में हमारे देश के इलेक्शन सिस्टम, आदिवासियों और जवानों की जिंदगी को डिटेल में दिखाया गया है. पोलिंग बूथ के पास जले हुए घर, आदिवासियों के आंखों में डर यह दिखाता है कि हमारे देश के कुछ हिस्सों में क्या हालात हैं. फिल्म उन जवानों की जिंदगी को भी दिखाता है, जो खुद इस राजनीतिक व्यवस्था से पीड़ित हैं.
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कलाकारों के दमदार रोल भी इसे ऑस्कर जीतने लायक फिल्म बनाते हैं. फिल्म में न्यूटन का कैरेक्टर सबसे ज्यादा डिप्रेसिंग है, लेकिन बुरी परिस्थिती में भी किताब फॉलो करने का न्यूटन का तरीका इसे विजेता बनाता है. पंकज त्रिपाठी का ये आज तक का सबसे अच्छा रोल है. 'पीपली लाइव' के बाद रघुबीर यादव ने भी कमाल का प्रदर्थन किया है.
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दो घंटें में ही फिल्म हमारे समाज की कई समस्याओं को दिखाता है. छोटे शहरों में बिजली की समस्या, कम उम्र में लड़कियों की शादी, दहेज प्रथा, नक्सल प्रभावित क्षेत्र में मतदान- यह फिल्म इन सब समस्याओं को अपने में समेटे है.
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1968 में ऋषिकेश मुखर्जी ने 'सत्यकाम' बनाई थी, जिसमें एक आदर्शवादी का संघर्ष दिखाया गया था. राजनीतिक व्यंग्य के साथ एक बार फिर मसरकर 'न्यूटन' लेकर आए हैं. इसमें भी एक आदर्शवादी का संघर्ष दिखाया गया है, जो राजनीतिक व्यवस्था से लड़ता है.
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अब समय आ गया है कि कोई भारतीय फिल्म ऑस्कर जीते और न्यूटन से हमें पूरी आशा है.
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'न्यूटन' से पहले इन 5 भारतीय फिल्मों को ऑस्कर भेजने पर विवाद हो चुका है. इसमें कोई शक नहीं है कि संजय लीला भंसाली की 'देवदास' बेहतरीन फिल्म थी, लेकिन मणि रत्नम की फिल्म 'कनाथी मुथमित्तल' अपने अलग विषय के कारण ऑस्कर में भेजी जानी चाहिए थी.
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ऐश्वर्या राय की तमिल फिल्म 'जीन्स' को ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया था, लेकिन उस साल हिंदी फिल्म 'सत्या' भी रिलीज हुई थी. आज भी 'सत्या' राम गोपाल वर्मा की सबसे अच्छी फिल्म मानी जाती है. सत्या की जगह 'जीन्स' को ऑस्कर के लिए नॉमिनेट करने पर विवाद हुआ था.
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साल 2005 में शाहरुख खान-रानी मुखर्जी स्टारर 'पहेली' को ऑस्कर के लिए नॉमिनेट करना गलत माना गया था. उसी साल आशुतोष गोवारिकर की फिल्म 'स्वदेश' भी आई थी, जिसे हर मायने में 'पहेली' से बेहतर माना जा रहा था.
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2012 में 'बर्फी' को ऑस्कर के लिए भेजा गया था. उसी साल 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और 'पान सिंह तोमर' भी रिलीज हुई थी. इन दो फिल्मों की जगह 'बर्फी' को ऑस्कर के लिए भेजना कुछ लोगों को पसंद नहीं आया था.
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गुजराती फिल्म 'द गुड रोड' को इरफान खान की फिल्म 'लंचबॉक्स' की जगह ऑस्कर के लिए चुना गया था. 'लंचबॉक्स' को कई फिल्म फेस्टिवल्स में सराहना मिली थी. इसलिए 'द गुड रोड' को भेजना गलत फैसला माना जा रहा था.
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