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कांगड़ा लोकसभा सीट पर 69.45% मतदान, 23 मई को आएगा फैसला

बाणगंगा और मांझी नदी के बीच बसा कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अहम दखल रखता है. इसकी पहचान यहां के सांसद शांता कुमार से भी होती है. बीजेपी सांसद शांता कुमार, जो इस सीट से चार बार संसद पहुंचे. शांता कुमार, हिमाचल प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

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aajtak.in [Edited By: वरुण शैलेश]नई दिल्ली, 20 May 2019
कांगड़ा लोकसभा सीट पर 69.45% मतदान, 23 मई को आएगा फैसला   कांगड़ा में मतदान

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा लोकसभा सीट पर आज रविवार (19 मई) को मतदान कराया गया. इस सीट पर 11 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी किशन कपूर को टिकट दिया है जबकि कांग्रेस ने पवन काजल को टिकट दिया. इस सीट पर मुख्यतौर पर बीजेपी और कांग्रेस में सीधे मुकाबला है.

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा संसदीय सीट पर 69.45% वोटिंग हुई. जबकि पूरे प्रदेश की 4 सीटों पर ओवरऑल 71.96% मतदान हुआ. लोकसभा चुनाव के सातवें और अंतिम चरण के तहत 19 मई 2019 को 8 राज्यों (7 राज्य और 1 केंद्रशासित प्रदेश) की 59 सीटों पर मतदान कराया जा रहा है.

बहरहाल, बाणगंगा और मांझी नदी के बीच बसा कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अहम दखल रखता है. इसकी पहचान यहां के सांसद शांता कुमार से भी होती है. बीजेपी सांसद शांता कुमार, जो इस सीट से चार बार संसद पहुंचे. शांता कुमार, हिमाचल प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री भी रहे.

1966 तक पंजाब में शामिल कांगड़ा को 1972 में हिमाचल प्रदेश के जिले के रूप में दर्जा मिला. इस इलाके की पूरी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है. यहां चाय के बगान तो हैं ही, साथ में छोटे-मोटे कुटीर उद्योगों के जरिए लोग अपनी आजीविका चलाते हैं. हिमालय की गोद में होने के कारण यहां भी हिमाचल के बाकी हिस्सों की तरह सैलानी घूमने आते हैं. इस लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत सूबे की 17 विधानसभा सीटें आती है.

कांग्रेस का गढ़ रहा कांगड़ा

कांगड़ा लोकसभा सीट का राजनीतिक इतिहास बाकी सीटों की तरह है. पहले यह सीट कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी, बाद में बीजेपी का कमल खिला. अगर शुरुआत 1951 से की जाए तो कांग्रेस के हेमराज ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी. वह लगातार चार बार (1951, 1957, 1962 और 1967) में सांसद रहे. 1971 में कांग्रेस के ही विक्रम चंद इस सीट से जीते. 1977 में यह सीट बीएलडी के खाते में चली गई और उसके प्रत्याशी दुर्गा चंद जीतने में कामयाब हुए. 1980 में कांग्रेस ने वापसी की और विक्रम चंद फिर जीते. 1984 में भी कांग्रेस अपने गढ़ को बचाने में कामयाब रही और चंद्रेश कुमारी जीतीं.

1989 में पहली बार इस सीट पर कमल खिला. शांता कुमार पहली बार जीतकर संसद पहुंचे. 1991 में वह मुख्यमंत्री थे, इसलिए इस सीट पर डीडी खनोरिया को बीजेपी ने मैदान में उतारा और वह जीतने में कामयाब हुए. इसके बाद कांग्रेस ने वापसी की और 1996 का चुनाव कांग्रेस के सत महाजन जीते. 1998 और 1999 में बीजेपी के शांता कुमार फिर जीते और अटल बिहारी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बने. 2004 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर वापसी की और शांता कुमार को हराकर चंदर कुमार संसद पहुंचे. लेकिन बीजेपी ने कांगड़ा सीट पर कमल खिला दिया. 2009 के चुनाव में बीजेपी के रंजन सुशांत और 2014 में शांता कुमार ने जीत दर्ज की.

कांगड़ा लोकसभा सीट के अन्तर्गत राज्य की 17 विधानसभा सीटें (चुराह, चम्बा, डलहौज़ी, भटियात, नूरपुर, इन्‍दौरा, फतेहपुर, ज्‍वाली, ज्वालामुखी, जयसिंहपुर, सुलह, नगरोटा, कांगड़ा, शाहपुर, धर्मशाला, पालमपुर, बैजनाथ) आती है. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 13 सीटों (चुराह, चम्बा, भटियात, नूरपुर, इन्‍दौरा, ज्‍वाली, ज्वालामुखी, जयसिंहपुर, सुलह, नगरोटा, शाहपुर, धर्मशाला, बैजनाथ) और कांग्रेस ने 4 सीटों (डलहौज़ी, फतेहपुर, कांगड़ा, पालमपुर) पर जीत दर्ज की थी. इस सीट पर वोटरों की संख्या 12.58 लाख है. इनमें 6.45 लाख पुरुष वोटर और 6.12 महिला वोटर है. 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां करीब 64 फीसदी मतदान हुआ था.

2014 का जनादेश

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने कांगड़ा लोकसभा सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. बीजेपी के कद्दावर नेता शांता कुमार ने कांग्रेस के चंदर कुमार को करीब 1.70 लाख वोटों से मात दी थी. शांता कुमार को 4.56 लाख और चंदर कुमार को 2.86 लाख वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर आम आदमी पार्टी के डॉ. रंजन सुशांत (24 हजार वोट) रहे. नोटा को 8704 वोट मिले थे. खास बात है कि ठीक इस चुनाव से पहले यानी 2009 में बीजेपी के टिकट पर लड़े डॉ. रंजन सुशांत 3.22 लाख वोटर पाकर सांसद बने थे, लेकिन वह 2014 में बागी हो गए और आम आदमी पार्टी से लड़े, लेकिन अपनी जमानत नहीं बचा पाए.

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