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सीटें बढ़ीं, फिर भी इस वजह से लोकसभा में दबी-दबी रहेगी राहुल गांधी की 'आवाज'

सिंधिया को राहुल गांधी का करीबी कहा जाता है और यही वजह रही कि उन्हें प्रियंका गांधी के साथ पश्चिमी यूपी में कांग्रेस को जिताने का जिम्मा दिया गया था. पार्टी में महासचिव सिंधिया यूपी में कांग्रेस को उबारना तो दूर अपनी पारंपरिक सीट तक नहीं बचा सके.

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aajtak.in
अनुग्रह मिश्र नई दिल्ली, 28 May 2019
सीटें बढ़ीं, फिर भी इस वजह से लोकसभा में दबी-दबी रहेगी राहुल गांधी की 'आवाज' संसद परिसर में राहुल गांधी (फोटो- PTI)

लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. बीजेपी और नरेंद्र मोदी की सुनामी इस कदर चली कि अमेठी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही चुनाव हार गए. हालांकि कांग्रेस के लिए राहत की बात यह है कि वह लोकसभा में अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर पाएंगे क्योंकि उन्होंने इस बार अमेठी के साथ केरल से वायनाड से भी चुनाव लड़ने का फैसला किया था, जहां से उन्हें जीत मिली है. राहुल तो एक सीट से चुनाव जीत गए लेकिन लोकसभा में उनकी कोर टीम का हिस्सा कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया. दीपेंद्र हुड्डा, सुष्मिता देव और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा है. लोकसभा में मोदी सरकार पर सबसे ज्यादा हमलावर रहने वाले इन नेताओं की कमी कांग्रेस पार्टी को जरूर खलेगी.

मल्लिकार्जुन खड़गे

सदन में कांग्रेस दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को विपक्ष की ओर से सबसे पहले बोलना का मौका मिलता था क्योंकि वह बीजेपी के बाद सबसे बड़े दल के नेता थे. बीते 5 साल में खड़गे ने विभिन्न मुद्दों पर सरकार को आड़े हाथ लिया. गैर हिन्दी भाषी राज्य कर्नाटक से आने वाले खड़गे सदन में हिन्दी बोलते थे और कभी-कभी तो शेरो-शायरी के जरिए सरकार की नीतियों पर तंज करते भी देखे गए. वह अपने राजनीतिक करियर का पहला चुनाव हारे हैं. इससे पहले खड़गे 2 बार सांसद और 9 बार विधायक रह चुके हैं. उनकी हार के बाद कांग्रेस के सामने सदन में पार्टी का नया नेता चुनने का संकट भी आ गया है. इस बार शशि थरूर या फिर खुद राहुल गांधी को सदन में कांग्रेस दल का नेता चुना जा सकता है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया

राहुल गांधी के ठीक बगल में बैठने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया इस बार लोकसभा के भीतर नहीं दिखेंगे. सिंधिया को गुना से भारतीय जनता पार्टी के कृष्ण पाल सिंह उर्फ केपी यादव ने हरा दिया है. सिंधिया को राहुल गांधी का करीबी कहा जाता है और यही वजह रही कि उन्हें प्रियंका गांधी के साथ पश्चिमी यूपी में कांग्रेस को जिताने का जिम्मा दिया गया था. पार्टी में महासचिव सिंधिया यूपी में कांग्रेस को उबारना तो दूर अपनी पारंपरिक सीट तक नहीं बचा सके. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए सिंधिया सदन के भीतर अपने तेज-तर्रार सवालों से सत्ता पक्ष पर निशाना साधते आए हैं.

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सुष्मिता देव

कांग्रेस की सबसे मुखर महिला सांसदों में सुष्मिता का नाम सबसे ऊपर आता था. राहुल गांधी की अगुवाई में उन्हें महिला कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर लोकसभा में सुष्मिता कांग्रेस की ओर से सरकार से सवाल करती दिखती रहीं. सुष्मिता के भाषण की तो कई बार सत्ताधारी दलों के नेताओं ने भी तारीफ की. लेकिन इस बार वह भी सदन का हिस्सा नहीं है. असम के लिए सिलचर से बीजेपी के राजदीप रॉय ने देव को चुनाव में शिकस्त दी. सुष्मिता के कद का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी तक उनके लिए रोड शो करने सिलचर गई थीं, जहां उन्होंने सुष्मिता की तुलना पूर्व पीएम इंदिरा गांधी से की थी.

रंजीता रंजन

महिलाओं के मुद्दों पर विपक्ष की सबसे फायर ब्रांड सांसद रहीं रंजीता रंजन को भी इस बार शिकस्त झेलनी पड़ी है. बिहार से सुपौल से रंजीता चुनाव हार गई हैं. अपने अलग अंदाज और बेबाकी के लिए पहचान बनाने वाली रंजीता पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की पत्नी हैं. मुजफ्फरपुर में शेल्टर होम में लड़कियों से रेप के मामले को रंजीता ने संसद के भीतर सबसे जोरदार तरीके से उठाया था. सरकार के खिलाफ विरोध जताने से लेकर अपनी बुलंद आवाज में सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने में वह कभी पीछे नहीं रहीं. लेकिन 17वीं लोकसभा में कांग्रेस पार्टी समेत समूचा विपक्ष सदन में उनकी कमी महसूस करेगा.  

दीपेंद्र हुड्डा

हरियाणा के रोहतक से दीपेंद्र हुड्डा की हार भी कांग्रेस के लिए किसी झटके से कम नहीं है. युवा नेता हुड्डा को बीजेपी के अरविंद कुमार शर्मा ने शिकस्त दी. दीपेंद्र भी राहुल गांधी की युवा टीम का हिस्सा हैं और सदन में भी उनके साथ ही बैठते हैं. अपने पिछले कार्यकाल में हुड्डा ने लोकसभा के भीतर कुल 81 सवाल पूछे जबकि तीन बार वह प्राइवेट मेंबर बिल लेकर आए. हरियाणा के विभिन्न मुद्दों समेत मोदी सरकार को घेरने वाले मसलों पर हुड्डा ने कई बार लोकसभा में कांग्रेस पार्टी का पक्ष रखा.

इसके अलावा कांग्रेस में संगठन महासचिव का पद संभाल रहे केसी वेणुगोपाल भी ऐसे नेता हैं जिन्होंने पूरे पांच साल तक मोदी सरकार पर सदन के भीतर निशाना साधा लेकिन इस बार उन्होंने संगठन की जिम्मेदारी संभालते हुए चुनाव न लड़ने का फैसला किया था. केरल के आलप्पुझा से सांसद रहे वेणुगोपाल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सबसे करीबी नेताओं में से एक हैं और यही वजह रही जब अशोक गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता के बाद उन्हें संगठन महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है.

वेणुगोपाल के अलावा आर्थिक मामले पर मजबूत पकड़ रखने वाले वीरप्पा मोइली को भी कांग्रेस पार्टी इस लोकसभा में जरूर मिस करेगी, जो बजट चर्चा के दौरान सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रमुखता से कांग्रेस का पक्ष रखा करते थे.

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