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आखिर किसकी नजर से बचने के लिए राहुल और प्रियंका गांधी ने लगाया काला टीका?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की स्थिति पर नजर डाली जाए तो साफ पता चलता है कि उसे किसी की 'नजर' लगी है. तभी तो पार्टी 1989 के बाद कभी सूबे की सत्ता में वापसी नहीं कर पाई. लखनऊ में किए रोड शो में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी काला टीका लगाए नजर आए.

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aajtak.in
सना जैदी/ वरुण प्रताप सिंह नई दिल्ली, 12 February 2019
आखिर किसकी नजर से बचने के लिए राहुल और प्रियंका गांधी ने लगाया काला टीका? लखनऊ रैली में राहुल-प्रियंका (फोटो-हरीश)

करीब तीन दशकों से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस के लिए सोमवार यानी 11 फरवरी का दिन अहम रहा. इस दिन कांग्रेस ने अपने तुरुप के पत्ते के तौर पर प्रियंका गांधी वाड्रा को औपचारिक तौर पर उत्तर प्रदेश में खस्ताहाल हो चुकी पार्टी को उबारने के लिए मैदान में उतार दिया. सुबह करीब 12.30 बजे लखनऊ के चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट मोड़ से प्रियंका-राहुल का रोड शो शुरू हुआ और दोपहर बाद प्रदेश कांग्रेस दफ्तर पहुंचा. इस दौरान कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का जोश देखते ही बनता था. ये कार्यकर्ता यूपी के अलग-अलग जिलों- कानपुर, उन्नाव, सीतापुर, लखीमपुर, फैजाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अमेठी, रायबरेली, बाराबंकी, फैजाबाद से स्वागत के लिए पहुंच थे. रोड शो के दौरान राहुल और प्रियंका को काला टीका लगाए हुए देखा गया.

राहुल-प्रियंका ने अपनाया टोटका?

भारतीय समाज में काला टीका और काला धागा टोटके और प्रसाद के रूप में कई स्थानों पर प्रचलित है. तो क्या राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने रोड शो के दौरान इसे टोटके के रूप में इस्तेमाल किया ताकि वे किसी बुरी नजर से बच सकें? लखनऊ में जिन इलाकों से कांग्रेस के इन दोनों नेताओं का काफिला गुजरा, वहां लोग दिन भर इस मुद्दे पर बात करते रहे.

कांग्रेस को लगी बुरी नजर?

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस मानती है यूपी में उसे बुरी नजर लग गई है और प्रियंका का राजनीति में आना और उनका काला धागा बांधना उसे बुरी नजर से बचा पाएगा? अगर उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की स्थिति पर नजर डाली जाए तो साफ पता चलता है कि उसे किसी की 'नजर' लगी है. तभी तो पार्टी 1989 के बाद कभी सूबे की सत्ता में वापसी नहीं कर पाई. इस दौरान कई चुनाव आए और गए, लेकिन पार्टी की स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं हो पाया. इन 30 सालों में सिर्फ 2009 का चुनाव ऐसा था, जब पार्टी को 21 लोकसभा सीटें मिली थीं. बाकी किसी भी चुनाव में कांग्रेस को उल्लेखनीय कामयाबी नहीं मिली. कांग्रेस की इस पतली का हालत का अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में इस पार्टी के पास सिर्फ 2 सांसद और 6 विधायक और 1 विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) है. इसके अलावा सूबे में पार्टी का वोट प्रतिशत सिंगल डिजिट में है.

मंडल-कमंडल की राजनीति के उभार से हाशिए पर कांग्रेस

सूबे में कांग्रेस की खस्ताहालत के लिए कई कारण जिम्मेदार माने जाते हैं. लेकिन मंडल-कमंडल की राजनीति इसके लिए सबसे बड़ा कारण मानी जाती है. 1980 के दशक के आखिरी सालों में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन ने तेजी पकड़ी तो बीजेपी का सियासी ग्राफ चढ़ता चला गया. इसे ही कमंडल की राजनीति कहा गया. इसी बीच, लगभग उसी दौर में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू की गईं और ओबीसी वर्ग को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण दे दिया गया. इस मुद्दे को लेकर देश में विरोध और समर्थन का जबर्दस्त माहौल बना तो जातीय गोलबंदी की राजनीति शुरू हो गई. मंडल की राजनीति का ही नतीजा था कि जाति और उसकी पहचान राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गए. और शायद इसी का नतीजा था कि यूपी में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियां मजबूत होती चली गईं. मंडल और कमंडल के बीच प्रतिद्वंद्वी राजनीति जैसे-जैसे तेज होती गई, कांग्रेस के लिए सियासी स्पेस कम होता चला गया.

टोटके नए नहीं

भारतीय समाज खासकर राजनेताओं के बीच टोटकों का इस्तेमाल नया नहीं है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं को काला या लाल धागा बांधे हुए देखा गया है. यही नहीं कई नेता किसी खास किस्म के कपड़े पहनते हैं तो किसी को खास किस्म की कुर्सियां पसंद हैं. इन सब बातों को टोटके से जोड़कर देखा जाता है. तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता जहां भी जाती थीं, उनकी कुर्सी उनसे पहले उस जगह पर पहुंचा दी जाती थी. कहा जाता था कि वे किसी और कुर्सी पर कहीं नहीं बैठती थीं. आलम यह था कि जब वे दिल्ली किसी मीटिंग में आती थीं, तो उनकी कुर्सी चेन्नई से दिल्ली लाई जाती थी. उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर को लेकर भी लंबे समय तक यह मान्यता रही कि यहां यूपी का जो मुख्यमंत्री आएगा, उसकी कुर्सी कुछ समय बाद चली जाएगी. इस मान्यता को तब बल मिला जब नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को नोएडा जाने और उसके कुछ समय बाद कुर्सी गंवानी पड़ी. यही वजह है कि राजनाथ सिंह, मायावती और अखिलेश यादव यूपी के सीएम के रूप में जब तक काम करते रहे, कभी नोएडा नहीं आए. लेकिन इस मान्यता को तोड़ा यूपी के मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ ने. वे 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद कई बार नोएडा का दौरा कर चुके हैं.

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