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तीसरे कोण में उलझी बिहार की सियासत, एक दर्जन सीटों पर खेल बना-बिगाड़ सकते हैं बागी

गठबंधनों का समीकरण ऐसा बना कि बीजेपी, आरजेडी समेत तमाम दलों को पिछली बार से कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ रहा है. ऐसे में कई प्रमुख नेताओं के टिकट कट गए. जेडीयू को एडजस्ट करने के चक्कर में बीजेपी ने तो अपने 5 सीटिंग सांसदों के टिकट काट दिए.

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संदीप कुमार सिंहनई दिल्ली, 16 April 2019
तीसरे कोण में उलझी बिहार की सियासत, एक दर्जन सीटों पर खेल बना-बिगाड़ सकते हैं बागी खेल बना-बिगाड़ सकते हैं बागी

बिहार में इस बार का चुनाव एनडीए बनाम महागठबंधन के बीच सीधी लड़ाई के लिए चर्चा में है. 40 लोकसभा सीटों की जंग में तमाम दलों ने दोनों में से किसी न किसी खेमों का दामन थाम लिया है. लेकिन करीब एक दर्जन सीटें ऐसी हैं जहां मुकाबले का तीसरा कोण भी एक्टिव दिख रहा है. इनमें से कुछ जगहों पर टिकट कटने से बागी हुए उम्मीदवार तो कुछ जगहों पर पप्पू यादव जैसे अपनी अलग पार्टियां खड़ी करने वाले नेता मजबूती से मैदान में खड़े हैं और दोनों में से किसी न किसी गठबंधन का गेम बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं.     

टिकट कटने से बिगड़ा पार्टियों का गेम

गठबंधनों का समीकरण ऐसा बना कि बीजेपी, आरजेडी समेत तमाम दलों को पिछली बार से कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ रहा है. ऐसे में कई प्रमुख नेताओं के टिकट कट गए. जेडीयू को एडजस्ट करने के चक्कर में बीजेपी ने तो अपने 5 सीटिंग सांसदों के टिकट काट दिए. इनमें सीवान से ओमप्रकाश यादव, वाल्मीकि नगर से सतीश चंद्र दूबे, गया से हरि मांझी, झंझारपुर से बीरेन्द्र कुमार चौधरी और गोपालगंज से जनक राम के नाम शामिल हैं.

वहीं आरजेडी में अली अशरफ फातमी, कांति सिंह, सीताराम यादव और आलोक मेहता तो कांग्रेस में शकील अहमद, लवली आनंद और निखिल कुमार जैसे नेताओं के हाथ टिकट नहीं लगा. कई सीटों पर बागी उम्मीदवार या तो मैदान में उतर गए हैं या उनका विरोध भीतरघात का संकेत दे रहा है...इन सीटों पर मुकाबला रोचक हो गया है-

1. बांका में पुतुल देवी बढ़ा रहीं एनडीए की मुश्किल

दक्षिण बिहार की बांका सीट से पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह की पत्नी पुतुल देवी टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गई हैं. यहां से एनडीए ने जेडीयू नेता गिरधारी यादव को उतारा है. मुकाबला आरजेडी के जय प्रकाश यादव से है जो 2014 के मोदी लहर में भी जीतने में कामयाब रहे थे. पुतुल देवी 2010 में पति दिग्विजय सिंह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में पहली बार सांसद बनी थीं. बाद में बीजेपी में शामिल हो गईं. 2014 में दूसरे नंबर पर रहीं और सिर्फ 10 हजार वोटों से हारी थीं. अब वे एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ ही मैदान में हैं.

2. मधुबनी में अशरफ फातमी-शकील अहमद बनेंगे महागठबंधन की मुसीबत?

महागठबंधन ने मधुबनी से टिकट वीआईपी पार्टी को दिया तो सहयोगी दलों कांग्रेस और आरजेडी में ही बगावत हो गई. पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी ने आरजेडी तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद ने अपनी पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया. वीआईपी ने बद्री पुर्बे को मधुबनी से अपना उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी ने इस सीट से दिग्गज सांसद हुकुमदेव नारायण यादव के बेटे अशोक यादव को उतारा है. अली अशरफ फातमी आरजेडी के पुराने नेता रहे हैं और सांसद तथा केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. शकील अहमद यहां से सांसद रह चुके हैं और कांग्रेस के केंद्रीय नेता हैं. अगर ये दोनों नेता चुनाव मैदान में उतरते हैं तो महागठबंधन सहयोगी वीआईपी पार्टी के उम्मीदवार के लिए राह आसान नहीं होगी.

3. मधेपुरा में पप्पू यादव बने तीसरा कोण

इस बार बिहार की सबसे कठिन त्रिकोणीय लड़ाई मधेपुरा सीट पर मानी जा रही है. यहां से वर्तमान सांसद हैं बाहुबली पप्पू यादव. जो कांग्रेस से टिकट चाहते थे लेकिन बात बनी नहीं और वे अपनी पार्टी जनअधिकार पार्टी के टिकट पर मैदान में उतर गए. आरजेडी ने यहां से दिग्गज नेता शरद यादव को उतारा है तो एनडीए की ओर से जेडीयू के दुलारचंद यादव उम्मीदवार हैं. यादव लैंड में 2014 का मुकाबला पप्पू यादव ने जीता था. हालांकि बाद में आरजेडी से उनका मोहभंग हुआ तो उन्होंने अपनी पार्टी बना ली. 2014 में पप्पू यादव को 3 लाख 68 हजार 937 वोट मिले थे. तब जेडीयू के टिकट पर थे शरद यादव. उन्हें 3 लाख 12 हजार 728 वोट मिले थे. बीजेपी के विजय कुमार सिंह को 2 लाख 52 हजार 534 वोट मिले थे और वे तीसरे स्थान पर रहे थे.

4. रालोसपा के लिए मुसीबत बनेंगे उनके ही सांसद राम कुमार शर्मा?

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा महागठबंधन का हिस्सा है और 5 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. लेकिन पार्टी के खिलाफ उनके ही वर्तमान सांसद राम कुमार शर्मा ने मोर्चा खोल दिया है. सीतामढ़ी से सांसद राम कुमार शर्मा ने रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए कहा कि कुशवाहा को हराने के लिए वे प्रचार करेंगे और काराकाट और उजियारपुर में उपेंद्र कुशवाहा की हार सुनिश्चित करेंगे. कुशवाहा इन दोनों सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं.

5. महाराजगंज में सच्चिदानंद राय बढ़ाएंगे बीजेपी की मुश्किल

राजपूत बहुल महाराजगंज सीट पर बीजेपी ने सांसद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल को दोबारा मौका दिया तो पार्टी के एमएलसी सच्चिदानंद राय निर्दलीय मैदान में उतर पड़े. सच्चिदानंद राय इस सीट से टिकट के दावेदार माने जा रहे थे लेकिन पार्टी ने सिग्रीवाल को ही दोबारा मौका दिया. यहां मुकाबला आरजेडी के उम्मीदवार रणधीर कुमार सिंह से हैं जो बाहुबली नेता और पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह के बेटे हैं. यहां से लालू यादव के साले साधू यादव बसपा के टिकट पर उतरे हैं तो जीतनराम मांझी की हम पार्टी के बागी महाचंद्र प्रसाद सिंह निर्दलीय.

6. पटना साहिब में रविशंकर प्रसाद की मुश्किल बढ़ाएगी आर के सिन्हा की नाराजगी

कायस्थ वोटों के गढ़ पटना साहिब में बीजेपी के बागी शत्रुघ्न सिन्हा अब कांग्रेस उम्मीदवार हैं. उनके सामने हैं बीजेपी के रविशंकर प्रसाद. लेकिन आर के सिन्हा के समर्थकों की नाराजगी उन्हें भारी पड़ सकती है. टिकट मिलने के बाद पिछले दिनों जब रविशंकर प्रसाद पटना पहुंचे तो उन्हें एयरपोर्ट पर आर के सिन्हा के समर्थकों की नाराजगी का सामना करना पड़ा था. दरअसल, भाजपा के राज्यसभा सांसद आर के सिन्हा के समर्थक चाहते थे कि शत्रुघ्न सिन्हा के बागी होने के बाद पटना साहिब सीट से आर के सिन्हा को चुनाव का टिकट मिले. लेकिन भाजपा हाईकमान ने इस सीट से केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को उतार दिया. ये तल्खी यहां जमीन पर भी दिख रही है.

7. शिवहर में महागठबंधन के लिए सिरदर्द बनेंगी लवली आनंद?

बाहुबली नेता आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद पिछले दिनों कांग्रेस में आईं थीं टिकट की उम्मीद में लेकिन ये सीट आरजेडी के खाते में चली गई. हालांकि शिवहर सीट से आरजेडी भी अभी उम्मीदवार तय नहीं कर पा रही. इसी सीट को लेकर लालू के दो बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप में ठनी हुई है. टिकट नहीं मिलने के बाद लवली आनंद यहां से निर्दलीय उतरने का ऐलान कर चुकी हैं. शिवहर से उनके पति आनंद मोहन दो बार सांसद रह चुके हैं. जबकि लवली आनंद खुद 1994 में वैशाली से चुनकर लोकसभा जा चुकी हैं.

8. सीतामढ़ी में सीताराम यादव बढ़ाएंगे आरजेडी की मुश्किल?

सीतामढ़ी के पूर्व सांसद सीताराम यादव के बागी होने की बात महागठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार अर्जुन राय को परेशान कर रही है. सीताराम यादव उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने मुखिया से लेकर संसद तक का सफर किया है. जमीन पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है. वे प्रखंड प्रमुख, विधायक और मंत्री भी रहे हैं. उनका असंतोष आरजेडी के लिए नुकसानदायक हो सकता है.

9. किशनगंज में अख्तरुल इमान मुकाबले को बना रहे हैं त्रिकोणीय

बिहार की मुस्लिम बहुल किशनगंज लोकसभा सीट से सांसद मौलाना असरारूल हक के निधन के बाद से एक सियासी शून्य सा है. इस सीट पर कब्जे के लिए एनडीए और महागठबंधन ने पूरा जोर लगा दिया है. महागठबंधन की ओर से कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. मोहम्मद जावेद और एनडीए की ओर से जेडीयू उम्मीदवार सईद महमूद अशरफ मैदान में हैं. लेकिन मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के उम्मीदवार अख्तरुल इमान. बिहार की ये इकलौती सीट है जहां से ओवैसी की पार्टी ने उम्मीदवार उतारा है.

10. कटिहार में एनडीए की बगावत मारपीट तक पहुंची

सहयोगी जेडीयू के लिए कई जगहों पर सीट छोड़नी बीजेपी और एनडीए के लिए मुश्किल साबित हो रही है. पिछले दिनों कटिहार से बागी हुए बीजेपी नेता अशोक कुमार अग्रवाल को समझाने गए प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय को धक्का-मुक्की का सामना करना पड़ा. दरअसल इस सीट से एनडीए ने जेडीयू के दुलाल चंद्र गोस्वामी को उतारा है. इस फैसले के खिलाफ बगावत करते हुए भाजपा के विधान पार्षद अशोक कुमार अग्रवाल निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं. बीजेपी इस सीट को 1999, 2004 और 2009 में जेडीयू के समर्थन से जीत चुकी है लेकिन 2014 में यह सीट एनसीपी के तारिक अनवर के पास चली गई थी. इस बार तारिक अनवर कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर इस सीट से मैदान में हैं. बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी जेडीयू के लिए मुसीबत साबित हो सकती है.

11. खगड़िया में आरजेडी का खेल बिगाड़ेंगे बाहुबली रणवीर यादव?

बिहार की खगड़िया सीट से बाहुबली रणवीर यादव आरजेडी के लिए मुसीबत बन रहे हैं. उनकी पत्नी कृष्णा यादव को टिकट नहीं मिला तो वे सीपीआई की उम्मीदवार बन गईं. 2014 में कृष्णा यादव आरजेडी की उम्मीदवार थीं. आरजेडी ने कृष्णा यादव को 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है.

12. अररिया में बीजेपी में नामांकन को लेकर ही हो गई लड़ाई

अररिया में भी बीजेपी को बगावत झेलनी पड़ रही है. इस सीट से भाजपा ने प्रदीप सिंह को प्रत्याशी बनाया लेकिन बागी हुए रामकुमार भगत ने भी पर्चा दाखिल कर दिया. राम कुमार भगत ने नामांकन करते वक्त पार्टी के कॉलम में बीजेपी भरा. लेकिन आधिकारिक पत्र नहीं होने के कारण उनकी उम्मीदवारी नहीं मानी जाएगी. बीजेपी ने यहां से पूर्व सांसद प्रदीप सिंह को उतारा है जिन्होंने उपचुनाव में सरफराज आलम को कड़ी टक्कर दी थी. लेकिन राम कुमार भगत की नाराजगी उनके लिए मुसीबत बन सकती है.

इसी तरह औरंगाबाद से कांग्रेस ने पूर्व सांसद निखिल कुमार को टिकट नहीं दिया. निखिल कुमार के परिवार का इस सीट पर लंबे समय से कब्जा रहा है. निखिल कुमार खुद और उनकी पत्नी भी यहां से सांसद रह चुकी हैं. लेकिन 2009 के चुनाव में सुशील कुमार सिंह ने जेडीयू और 2014 में बीजेपी के टिकट पर इस सीट से जीत हासिल की. इस बार कांग्रेस में निखिल कुमार के समर्थकों की नाराजगी एनडीए को फायदा पहुंचा सकती है.

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