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भरूच: गुजरात की वह लोकसभा सीट जहां 1989 से नहीं हारी बीजेपी

सियासत के लिहाज से यह सीट भारतीय जनता पार्टी के काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह सीट बीजेपी का वह गढ़ है, जहां पहली बार 1989 में जीत दर्ज करने के बाद से 2014 तक कभी भी पार्टी को हार का मुंह नहीं देखना पड़ा.

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aajtak.in
जावेद अख़्तर नई दिल्ली, 24 February 2019
भरूच: गुजरात की वह लोकसभा सीट जहां 1989 से नहीं हारी बीजेपी Bharuch Seat

नर्मदा किनारे बसा भरूच राजनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण इलाका है. यह इलाका गुजरात के दक्षिण क्षेत्र में आता है. समुद्री सीमा में होने के चलते यहां उद्योगों की भरमार है. टेक्सटाइल मिल से लेकर डेयरी और केमिकल प्लांट की भी यहां अधिकता है. इसके अलावा खेती की बात की जाए तो यहां उत्तम क्वालिटी का कपास पाया जाता है. पर्यटन की दृष्टि से भी यह इलाका अपनी पहचान रखता है. यहां सरदार सरोवर बांध, दशाशमवेध घाट गोल्डन ब्रिज समेत कई प्रसिद्ध मंदिर भी हैं, जो आकर्षण का केंद्र माने जाते हैं.

सियासत के लिहाज से यह सीट भारतीय जनता पार्टी के काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह सीट बीजेपी का वह गढ़ है, जहां पहली बार 1989 में जीत दर्ज करने के बाद से 2014 तक कभी भी पार्टी को हार का मुंह नहीं देखना पड़ा. ऐसे में 2019 के लोकसभा के लोकसभा चुनाव में बीजेपी क्या अपने इस अभेद्य किले को हमेशा की तरह सुरक्षित रख पाएगी या 2017 के विधानसभा चुनाव में बदले राजनीतिक समीकरण उसके लिए चुनौती पेश करेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा.

सीट की राजनीतिक पृष्ठभूमि

आजादी के बाद 1951 से ही इस सीट पर कांग्रेस की जीत का जो सिलसिला शुरु हुआ था, वह इंदिरा गांधी के वक्त, यहां तक कि आपातकाल में भी चलता रहा. 1984 तक कांग्रेस यहां से जीतती रही. भारतीय जनता पार्टी को 1989 में पहली बार यहां से जीत दर्ज की. उसके बाद से बीजेपी यहां से एक बार भी चुनाव नहीं हारी है.

इस सीट पर अब तक कुल 17 बार चुनाव हुए हैं. इनमें से पहले आठ चुनाव कांग्रेस ने जीते, जबकि पिछले 9 चुनाव में बीजेपी ने बाजी मारी. सीट पर एक बार 1998 में उपचुनाव हुए और उसमें भी बीजेपी को जीत मिली. यानी बीते 1989 से 2014 तक जितने भी लोकसभा के आम चुनाव या उपचुनाव इस सीट पर हुए, उसमें भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को विजय मिली है.

अहमद पटेल पहली बार बने सांसद

देश की राजनीति के सबसे बड़े अज्ञात योद्धा कहे जाने कांग्रेस नेता और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल इसी इलाके से आते हैं और पहली बार भरूच लोकसभा सीट से ही वह सांसद निर्वाचित हुए थे. 1977 के चुनाव में अहमद पटेल ने यहां से पहली बार बाजी मारी और फिर लगातार दो और चुनाव (1984 व 1989 लोकसभा चुनाव) भी जीते. इसके बाद 1989 और 1991 के चुनाव में भी उन्होंने हाथ आजमाया, लेकिन दोनों ही बार चंदूभाई देशमुख ने उन्हें परास्त कर दिया. अहमद पटेल इन दो हार के बाद कभी लोकसभा सांसद नहीं बने और वह कांग्रेस नेतृत्व तमाम अहम पदों पर होते हुए अब तक राज्यसभा सांसद बनते रहे. इस सीट के दूसरे बड़े नेता मौजूदा सांसद मनसुखभाई वसावा ही हैं, जिन्होंने यहां से सबसे ज्यादा पांच बार चुनाव जीता है.

इस सीट के वोटिंग पैटर्न का आकलन किया जाए तो साफतौर पर प्रत्याशी हावी नजर आते हैं. 1951 से अब तक यहां से 6 नेता चुनाव जीतते रहे हैं. केवल 1967 में एक बार ऐसा मौका आया है जब कांग्रेस के सिटिंग सांसद छोटूभाई पटेल दोबारा संसद नहीं पहुंच सके. हालांकि, 1962 में जीतने के बाद वह 1967 का चुनाव लड़ ही नहीं पाए, जिसके चलते भी ऐसा हुआ. उनके बाद लगातार दो बार मानसिंह राणा, लगातार तीन बार अहमद पटेल, उनके बाद लगातार चार बार चंदूभाई देशमुख और फिर पांच बार मनसुखभाई वसावा ने यहां से बाजी मारी.

सीट का सामाजिक ताना-बाना

2011 की जनगणना के मुताबिक, भरूच जिले की कुल आबादी करीब 15,51,019 है. इनमें 4,88,194 आबादी अनुसूचित जनजाति (ST) की है. भरूच तालुका की बात की जाए तो यहां करीब 18 फीसदी एसटी आबादी है और 5 फीसदी एससी की आबादी है. यहां की करीब 66 फीसदी आबादी हिंदू समुदाय की है, और मुसलमानों की आबादी 32 फीसदी है.

भरूच लोकसभा के अंतर्गत सात विधानसभा सीट आती हैं. इनमें करजन, देदियापाड़ा, जंबूसर, वागरा, झागड़िया, भरूच, अंकलेश्वर हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में जंबूसर से कांग्रेस, वागरा से बीजेपी, झगाड़िया से भारतीय ट्राइबल पार्टी, भरूच से बीजेपी, अंकलेश्वर से बीजेपी, देदियापाड़ा से भारतीय ट्राइबल पार्टी और करजन से कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. यानी लोकसभा की सात सीटों में तीन सीटों पर बीजेपी, दो पर भारतीय ट्राइबल पार्टी और दो पर कांग्रेस ने बाजी मारी थी.

2014 लोकसभा चुनाव का जनादेश

मनसुखभाई वसावा, बीजेपी- 548,902 वोट (51.8%)

जयेशभाई पटेल, कांग्रेस- 395,629 (37.3%)

2014 चुनाव का वोटिंग पैटर्न

कुल मतदाता-  14,17,548

पुरुष मतदाता-   7,34,861

महिला मतदाता-  6,82,687

मतदान-   10,60,211 (74.8%)

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

61 साल के मनसुखभाई वसावा लंबा राजनीतिक करीयर रहा है. बीए के बाद एमएसडब्ल्यू करने वाले मनसुखभाई वसावा ने नर्मदा जिले के जूनाराज में जन्म लिया था. पांच बार सांसद का चुनाव जीतने के से पहले वह विधानसभा के लिए भी निर्वाचित होते रहे हैं. वह 1994-96 तक विधायक रहे हैं. इसके बाद 1998 में सांसद बन गए थे. 2014 में सांसद बनने के बाद उन्हें मोदी कैबिनेट में जगह दी गई थी. उन्हें राज्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन 2016 में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया.

मंत्रालय छिन जाने पर मनसुखभाई वसावा ने ऐतराज भी जताया था. साथ ही कहा था उन्हें खुद इस बात का अंदाजा नहीं है कि उन्हें क्यों हटाया गया.

परभुभाई वसावा ने अपने कार्यकाल के दौरान जारी कुल धनराशि का लगभग 86 फीसदी खर्च किया है. उनकी निधि से अलग-अलग मद में कुल 23.62 करोड़ रुपये की राशि जारी हुई है, जिसमें 19.86 करोड़ रुपये खर्च कर दिया गया. यानी करीब 3.76 करोड़ रुपये उनकी निधि से खर्च नहीं हो सके. परभुभाई वसावा की संपत्ति की बात की जाए तो एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पास कुल 65 लाख के करीब संपत्ति है. इसमें 45 लाख के करीब चल संपत्ति और 20 लाख की अचल संपत्ति शामिल है.

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