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कहानी संग्रह: दिशा मोड़ने का दम

रत्नकुमार सांभरिया का यह ताजा कहानी  संग्रह है, जिसमें चेतना जाग्रत करती चौबीस कहानियां हैं. उनसे गुजरकर सहज ही आभास हो जाता है कि लेखक दलित रचनाकारों की जमात से छिटककर उदारवादी रुख अपनाता है.

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aajtak.in
विजयनई दिल्‍ली, 03 September 2011
कहानी संग्रह: दिशा मोड़ने का दम

दलित समाज की कहानियां
रत्न कुमार सांभरिया
अनामिका पबिलशर्स,
नई दिल्ली-02,
कीमतः 150 रु.

रत्नकुमार सांभरिया का यह ताजा कहानी  संग्रह है, जिसमें चेतना जाग्रत करती चौबीस कहानियां हैं. उनसे गुजरकर सहज ही आभास हो जाता है कि लेखक दलित रचनाकारों की जमात से छिटककर उदारवादी रुख अपनाता है.

पुस्तक की भूमिका में सांभरिया स्पष्ट कर देते हैं कि सवर्ण समाज में जन्मा रचनाकार भी दलित कहानी लिख सकता है. मगर जिस कहानी के पात्र रुआंसे, गिड़गिड़ाते-से समझैतापरस्त-से या पलायनवादी-से होते हैं वह कहानी दलित कहानी की श्रेणी में न आकर ब्राह्मणवादी, सामंतवादी या फिर पूंजीवादी धारा की कहानी होगी. चाहे उसे दलित लेखक ने लिखा हो या गैर दलित लेखक ने.

दलित शोषित है. दलित स्त्री दलितों में भी दलित है, सो वह पुरुषवादी व्यवस्था में दोहरे शोषण का शिकार होती है. लेकिन सांभरिया की कलम स्त्री के हक और उसके जज्‍बे की बात करती है.

इत्तफाक कहानी में एक खुद्दार और पतिपरायण  दलित महिला का चरित्रांकन वे एक अभिनव दृष्टि से करते हैं. गांव की पंच वह औरत 44 वर्ष पहले अलग हुए अपने पति के एकाएक बस में मिल जाने पर उसे आदर और अदब से मायके के अपने घर लाती है और समूचे समाज की उपस्थिति में पोती के विवाह में उसका हाथ पकड़ कर स्वीकारोक्ति के साथ प्रस्तुत होती है.

साहित्य में दलित कहानी आज तक बहस का मुद्दा बनी हुई है. कोई उस पर दलित एकाधिकार को पूंजीवादी प्रवृत्ति मानता है तो कतिपय दलित साहित्यकार और चिंतक मानते हैं कि भोगा हुआ यथार्थ दलित रचनाकार की कलम से ही उतर सकता है. सांभरिया की कहानियां इन सतही यथार्थों से ऊपर उठकर बताती हैं कि दलित्व की फोटोग्राफी यथार्थ नहीं है. साहित्य का ध्येय दलित चेतना, उसकी इज्‍जत-आबरू और पुनर्वास होना चाहिए.

फुलवा  कहानी की फुलवा को लीजिए. तमाम कठिनाइयों की परवाह न करके वह डॉ. आंबेडकर के मूल मंत्र 'शिक्षित बनो' को आत्मसात कर लेती है और बेटे राधामोहन को पढ़ाती-लिखाती है. वह एस.पी. बन जाता है और शहर में एक बड़ी कोठी में रहता है. फुलवा भी बेटे के साथ रहती है. गांव के जमींदार रामेश्वर सिंह, जिनके यहां वह चाकरी करती थी, को उसकी कोठी पर आने पर वह यह एहसास करा देती है कि आदमी जाति से नहीं, पैसे/पद से बड़ा होता है.

सांभरिया ने दलितों के स्वाभिमान, उनके मान, सम्मान, संघर्ष और स्थापना के मुद्दे शिद्दत से उठाए हैं. उनका मानना है कि दलित कहानी में पीड़ा और संघर्ष दोनों सामने आने चाहिए. दलित कहानी का उद्देश्य समाज विभाजन या नफरत फैलाना नहीं, मनुष्य में मनुष्यता पैदा करना और रूढ़ वैचारिकता में बदलाव कर नवाचार की स्थापना है. ग्रामीण और शहरी परिवेश पर लिखी कहानियों में लेखक तो यहां तक कह जाता है कि 'पैसे और पद के सामने जात जूती है.'' (बूढ़ी).

शर्त कहानी में जसवीर दलितों के  वोटों से सरपंच बनता है. उसका लड़का मौका पाकर पानाराम मेहतर की लड़की के साथ कुकर्म करता है. जसवीर के सामने बैठे भूखे-प्यासे पानिया का शरीर पत्ते की तरह सूखा है. जसवीर उसे पैसे और खेत-क्यार में भेड़-बकरियां चराने का प्रलोभन देकर समझौता करना चाहता है. पानिया टस से मस नहीं होता.

मरा-सा पानिया दबंग जसवीर के सामने शर्त रखता है-''यह इज्‍जत का सवाल है मुखिया साहब. आप की इज्‍जत सो मेरी इज्‍जत. आपकी लड़की मेरे लड़के के साथ रात रहेगी.'' छोटी-सी एक चिनगारी शोला कैसे बनती है, यह इस कहानी में देखा जा सकता है. शर्त को दलित चेतना की पहली कहानी माना जाता है. स्वाभिमान और जिंदगी की पुकार से भरपूर सांभरिया की कहानियां धमनियों में पहुंचकर परिवर्तन का शोर करती हैं. जीवट पैदा करती है, जज्‍बा दिखाती हैं.

सांभरिया की हर कहानी को दलित कहानी नहीं कहा जा सकता. मिसाल के तौर पर मियांजन की मुर्गी. इस कहानी की बुनावट बेजोड़ है और कौतूहल जगाती है.

लेखक की भाषा-शैली में जादू है, जो पाठक को बांधे रखती है. उदाहरण देखिए-''न बाप, न मां, न बहन, न भाई. बीड़ का ढूंढ. कुदरत की काट. छोटी पांत. छोटी जात. पेट में भूख. घर में सूख. (भैंस). उनकी कहानियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि पात्र निराश-हताश नहीं होते. उनमें जिजीविषा के  दर्शन होते हैं. वे तत्पर हैं, समाज में न्याय के लिए. साफ-सुथरी जिंदगी बसर करने के लिए. पुनर्वास की चाह और स्थितियों से जूझ्ने की कुव्वत लिए.

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