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कहीं आप पर भी तो नहीं लगा ऐसा ही कोई ताला?

यौन-स्वाधीनता! इसका अर्थ जिस किसी के साथ कभी-भी हमबिस्तर होना नहीं है. इसका मतलब है अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ सोना और सोने के लिए हर घड़ी हां कहने से ज्यादा ना कहने की आजादी.

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तस्‍लीमा नसरीननई दिल्‍ली, 07 August 2012
कहीं आप पर भी तो नहीं लगा ऐसा ही कोई ताला?

इंदौर के एक (भले) आदमी ने अपनी स्त्री की योनि पर पिछले चार सालों से ताला जड़कर रखा था. परेशान स्त्री जहर खाकर जान देने जा रही थी-अफरातफरी में जब उसे अस्पताल ले जाया गया तो इलाज के दौरान पता चला कि उसकी योनि ताले में जकड़ी हुई है.

अगर यह घटना घटित नहीं होती तो किसी को पता भी नहीं चलता कि इस 21वीं सदी में, अक्षरशः योनि को ताले में बंद किया जाता है. चाबी पतिदेव के जिम्मे. किसी अन्य पुरुष का लिंग उसकी योनि में प्रवेश न कर पाए, इसलिए ताले-चाबी का इंतजाम किया गया. अपनी जरूरत के मुताबिक पति ही उसकी योनि का ताला खोला करता था.

इस खबर को पढ़ने के बाद, मुझे याद आया कि यूरोप के अंधकार युग में वहां की लड़कियों की देह पर भी लोहे से निर्मित कौमार्य बंधन या 'चेस्टिटि बेल्ट' बांधा जाता था. दूर देशांतर जाने के पहले स्त्रियों की योनि पर भारी-भरकम 'चेस्टिटि बेल्ट' नाम का लौह पिंजर डालकर ही लोग बाहर जाते थे.moral policing

स्त्रियां उस लौह पिंजर को तब तक नहीं खोल पाती थीं, जब तक स्वयं स्वामी आकर उसका ताला न खोलें. यानी, योनि की अधिकारिणी स्त्रियां नहीं, उनके मालिक हैं. वे अपनी व्यक्तिगत संपदा की रक्षा चाहे जैसे करें. जो पुरुष सत्तात्मक मानसिकता उस अंधकार युग में स्त्रियों की योनि पर ताला जड़ती थी, उसी मानसिकता के चलते इंदौर वासी सज्‍जन ने स्त्री योनि पर ताला लगाया था.

उस युग और वर्तमान युग के बीच कई शताब्दियां गुजर चुकी हैं, लेकिन उस मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है. इस घटना को जानने के बाद लोगों ने उस आदमी को बहुत दुत्कारा, शैतान, कमीना आदि कहकर गालियां दीं. ठीक ही है कि यह घटना ताला जड़ने वाली है पर यह मानसिकता तो चारों ओर से घेरे हुए है. इसी मानसिकता वाले लोग आज का समाज चला रहे हैं. चूंकिताला दृश्यमान है, इसलिए लोगों को आपत्ति है. अदृश्य ताले के लिए किसी को कोई आपत्ति नहीं.

स्त्री सिर्फ पति की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है, वह पूरे समाज की व्यक्तिगत संपत्ति है. स्त्री विवाह के पहले किसी के साथ यौन संपर्क करेगी कि नहीं, विवाह के बाद किसके साथ किस प्रकार चलेगी-रहेगी, रात कितनी देर तक बाहर रहेगी, किसके साथ बातें करेगी, किससे नहीं मिलेगी, किसके साथ हंसेगी, घर में कौन-कौन आएंगे, कौन नहीं आएंगे, किसके साथ सोएगी और किसके साथ नहीं-यह सब उसका पति या परिवार ही नहीं, पूरा समाज बता देता है, तर्जनी उठाकर धमका देता है. नारी के चारों ओर हाथ में हथियार उठाए सैनिक तैनात रहते हैं या फिर पत्थर फेंकने के लिए, कारा यातना के लिए या फिर फाड़ खाने को तैयार रहते हैं.

समाज की हर लड़की के यौनांग पर एक अदृश्य ताला जड़ा हुआ है. जिस मर्दवादी मानसिकता ने स्त्रियों को 'चेस्टिटि बेल्ट' या ताला जड़ने को बाध्य किया था, उसी मानसिकता ने आज अदृश्य ताला डालने को बाध्य किया है. ताला दिखता नहीं, लेकिन ताला है. यह अदृश्य ताला यदि समाज की किसी लड़की के यौनांग पर न हो तो खासा हंगामा खड़ा हो जाए.

उस लड़की को समाज मान्यता नहीं देता, अगर उसके यौनांग पर वह अदृश्य ताला यथास्थान न लगा हो. इस अदृश्य ताले का नाम है पितृ सत्ता तंत्र या पुरुष सत्ता तंत्र. इस पितृ सत्ता तंत्र या पुरुष सत्ता तंत्र के कठघरे में स्त्रियां कैद हैं.

पारिवारिक और सामाजिक सीखचे में स्त्रियां कैद हैं, इसलिए उनके लिए अलग से किसी लौह पिंजर या लोहे के ताले गढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती. इस पुरुष सत्ता तंत्र में पुरुष की भूमिका है-प्रभु की, कर्ता की, नियामक की और भोग करने वाले स्वामी की. स्त्रियों की भूमिका है कि वह पुरुषों की दासी है-उसकी यौन वस्तु है, पुरुष की संतान पैदा करने वाली मशीन है. यही सब उसके हिस्से हैं-कई तरह के नियम बनाकर, रंग-रोगन पोतकर.

क्या ऐसी कोई प्रजाति है जो अपनी ही प्रजाति के भिन्न यौनांग होने के कारण उसे हाशिए पर धकेल अपमानित करती है. आज भी नारी के विरुद्ध उस विषमता को दूर नहीं किया जा सका है. अभी भी स्त्रियां यौन-दासी हैं, आज भी लड़कियां यौन-लिप्सा की शिकार हैं, घरेलू हिंसा, ऑनर किलिंग, बलात्कार, सामूिहक कुकृत्य, कन्या-शिशु हत्या, कन्या-भ्रूण हत्या, तेजाब की शिकार और दहेज प्रथा की यातना झेल रही हैं. दहेज चुकाने में असमर्थ होने पर घर-घर में स्त्री-दाह, ब की हत्या-यानी स्त्री-विरोधी कोई नृशंसता समाज से दूर नहीं हुई है.

कई लोगों का कहना है कि शिक्षित होने पर नारी समस्या का निदान हो जाएगा. लेकिन देखा यह गया है कि एक शिक्षित नारी पुरुष सत्ता तंत्र की नियमावली जितनी अच्छी तरह सीख सकती है, उतनी अच्छी तरह एक अनपढ़ स्त्री नहीं.

सीखने की क्षमता शिक्षितों में अधिक होती है. शिक्षित स्त्रियों का विवाह होने पर वे मायके से उसी तरह ससुराल जाती हैं, जिस तरह एक अनपढ़ और गरीब स्त्री. शिक्षित स्त्री अपना सरनेम बिसार कर पति का सरनेम लपक लेती है. पुरुषों के लिए होता है पिता का सरनेम, मां का नहीं. इसका मतलब हुआ, स्त्री और उसकी संतान पुरुष पति के अधीन हैं.Taslima nasreen

स्त्री और उसकी संतान का मालिक वह पुरुष है. पितृ-सत्तात्मक नियम के अनुसार एक लड़की को रहना पड़ेगा-बचपन में पिता के अधीन, विवाह के बाद पति के अधीन और बुढ़ापे में बेटे के अधीन. शास्त्र में भी इसकी दुहाई दी गई है-'न स्त्री स्वातंत्रमर्हति'-नारी का स्वतंत्रता पर कोई अधिकार नहीं.

स्त्रियों का पहनावा बदला है-एक बार उन्हें सिर से पांव तक खुद को ढककर रखने को बाध्य किया गया, और एक बार उन्हें सब कुछ उतार फेंकने को कहा गया. वे हर जगह ''सेक्सुअल ऑब्जेक्टिफिकेशन'-की शिकार हैं. वे कॉस्मेटिक्स पोतती हैं-क्योंकि पुरुष सत्ता तंत्र की दुनिया उन्हें घड़ी-घड़ी उपदेश देती है कि वे पुरुष की नजरों में आकर्षक बनी रहें. आकर्षक बने रहने के लिए शरीर की माप-जोख की हिफाजत करनी है. वक्ष कितना, कमर कितनी, नितंब कितना-सब कुछ बताया जा रहा है, काले और सांवले रंग की युवतियों को कह दिया गया है कि तुम्हारे रंग बदरंग हैं.

इन्हें जितना गोरा करोगी, उतनी ही आकर्षक लगोगी. काया का रंग गोरा-चमकीला बनाने, त्वचा की सिकुड़न खत्म करने के लिए बाजार में केमिकल छा गए हैं. लड़कियां एक मांस-पिंड हैं-चेहरा-सीना और यौनांग के अलावा और कुछ नहीं. लड़कियों के पास दिमाग है, उनमें बुद्धि है-यह बात किसी के पल्ले नहीं पड़ती. स्त्रियां क्रय-विक्रय की वस्तु हैं-जिन्स. इन्हें जैसे सजा-धजाकर, चमकाकर रखा जाता है वैसे ही स्त्रियों को भी.

पुरुष सत्ता तंत्र का कठोर नियम है, उन्हें हर हाल में अपना कौमार्यत्व बचाकर रखना होगा. सभी पुरुषों की चाह होती है कुमारी कन्या की. अगर किसी लड़की का किसी के साथ एक बार भी यौन संबंध हो चुका है, इस बात की खबर फैल जाने पर मजाल है कि कोई पुरुष उस लड़की के साथ विवाह करने की हामी भर दे. और विवाह के बाद उसे सुरक्षित रखना होगा अपना सतीत्व. यह नियम ही है नारी के यौनांग में जंजीर डालने या ताला जड़ने का.

नारी के यौनांग का ही नहीं, उसकी जरायु का मालिक भी पुरुष ही है. स्त्री और पुरुष यह फैसला करते हैं कि एक स्त्री कितनी संतान को गर्भ में धारण करेगी और किसी संतान का लिंग क्या होगा. स्त्री की जरायु अपनी है लेकिन उस पर उसका अधिकार नहीं.

पुरुष के यौनांग पर कोई ताला जड़ने की पाबंदी नहीं है. पुरुषों के लिए सारी दुनिया में ही पतितालय खुले हुए हैं, पुरुष जब भी चाहे अपनी यौनेच्छा शांत कर सकता है. ऐसी लाखों-करोड़ों लड़कियों को छल-बल और कौशल से इस समाज में पतिता या यौन-दासी बनाकर उनका भोग कर सकता है.

लड़कियां लिख-पढ़ गई हैं, काबिल हुई हैं. विवाह के बाजार में शिक्षित लड़कियां ऊंची कीमत पर बिक रही हैं. लेकिन शिक्षित हो या अशिक्षित, अकसर सभी युवक दहेज की मांग करते हैं. अगर हम स्वस्थ और बेहतर समाज चाहते हैं तो हमें यह याद रखना होगा कि उस समाज में स्त्रियों को समान अधिकार देना होगा. पुरुष और स्त्री का संबंध प्रभु और दासी का संबंध नहीं, यह संबंध मित्रता और सहधर्मिता आदि पर टिका होगा. समाज के निर्माण में विषमता पैदा करने वाली व्यवस्था को मिटाना होगा. लेकिन ऐसे कितने मां-बाप हैं जो अपनी संतान को यह सीख देते हैं कि स्त्री हो या पुरुष-दोनों के समान अधिकार हैं.

पुरुष की देह में अधिक पेशियां होती हैं, लेकिन हम समाज, अथवा देश या परिवार को मांस पेशियों के बल पर नहीं चलाते हैं, हम इसे बुद्धि से चलाते हैं. बुद्धि में स्त्री और पुरुष-कोई किसी से कम नहीं है. स्त्रियों  ने प्रमाणित किया है कि जो-जो काम इतने दिनों तक पुरुषों के लिए बताए जाते थे, उन तमाम कामों को करने में वे समर्थ हैं.

(हालांकि अब भी पुरुषों ने यह नहीं स्वीकारा है कि स्त्री जिन कामों में पारदर्शी है, या जो गुण उसमें है, उनमें पुरुष भी दखल रखते हैं या वे सारे गुण उनमें भी हैं, जैसे-बच्चों का पालन-पोषण, घर-गृहस्थी के काम, खाना बनाना, घर-बार की सफाई, संवेदनशील होना, उदार होना, हृदय से कोमल होना इत्यादि).

पितृ सत्ता तंत्र की व्यवस्था पुरुष द्वारा निर्मित है जो पुरुषों के आराम और ऐश करने और प्रभुत्व बनाए रखने के लिए की गई है. लेकिन स्त्री की सहायता के बिना यह पितृ सत्ता टिक नहीं सकती. स्त्रियों ने इस पितृ सत्ता को टिकाए रखने में हर तरह का सहयोग किया है. जैसे कि अफ्रीका में लड़कियों के यौनांग के संवेदनशील हिस्से को छोटी उम्र में ही काटकर फेंक दिया जाता है ताकि वे कभी भी यौन-सुख का अनुभव न कर सकें. बहुतों के यौनांग के संवेदनशील हिस्से को टांक तक दिया जाता है. सिर्फ अफ्रीका में ही नहीं, भारत के बोहरा मुसलमानों में भी स्त्री-यौनांग के हिस्से को काट फेंकने का रिवाज है. एशिया के इंडोनेशिया और अन्य कुछ देशों में भी ऐसा होता है.

बलात्कार तो आम बात है, यौन संबंधी दासता और वेश्यावृत्ति कब से चलती आ रही है, स्त्रियां भी स्त्रियों के विरुद्ध इस जघन्य यौनाचार में सहायता करती रही हैं. स्त्रियां इस पितृ तंत्र को टिकाए रखना चाहती हैं-कारण यह है कि उनके दिमाग में बचपन से ही यह विश्वास भर दिया जाता है कि पुरुष एक बड़ी जात का मनुष्य है और स्त्री है एक छोटी जात. स्त्री है पुरुष के भोग की सामग्री. यह जघन्य और स्त्री विरोधी कुत्सित मंत्र पुरुष के दिमाग में भी ठूंस दिया गया है.

पितृ सत्ता तंत्र के नियमों को स्त्रियों ने सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया है और इसका पालन वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक बेगार की तरह करती हैं; स्त्री को अपमानित कर, वस्तु या माल की तरह उसका इस्तेमाल करने का सारा उपक्रम और आयोजन स्त्रियों ने ही किया है. हर तरह के धार्मिक, सामाजिक और स्त्री-विरोधी अनुष्ठानों एवं अनुशासनों का बड़े धूमधाम से पालन करती हैं. यही नहीं, पढ़ी-लिखी स्त्रियां भी इसमें हिस्सा बंटाती हैं.

शिक्षा पाने और स्वनिर्भर होने का एक उद्देश्य सत्ता तंत्र का प्रतिवाद करना है, वे यह नहीं समझ्तीं. तथाकथित स्त्री शिक्षा और स्वनिर्भरता का जितना अंश स्त्री के निजी उपयोग में होता है उससे कहीं अधिक पुरुष के उपकार में चला जाता है. पुरुष एक शिक्षित स्त्री को साथ लेकर सैर-सपाटा कर सकता है, पुरुष की संतान एक शिक्षित स्त्री के पास पल-बढ़ सकती है, स्त्री की कमाई का बड़ा हिस्सा पुरुष की जेब में जा रहा है. सारे फैसले अब भी पुरुष ही ले रहा है.

स्त्री की कमाई को किस मद में खर्च करना है, इसका फैसला भी अकसर पुरुष ही करता है. स्त्री की कमाई स्त्री के यौनांग की तरह या फिर जरायु की तरह है. स्त्री का यौनांग किस तरह उपभोग किया जाएगा, इसका फैसला स्त्री नहीं, पुरुष लेता है.

आज स्त्रियों को कई तरह की स्वतंत्रता मिली हुई है, सड़क पर चलने की, स्कूल-कॉलेज जाने की, दफ्तर-अदालत जाने की, लेकिन उन्हें यौन-स्वाधीनता अभी तक नहीं मिली है, क्योंकि यही बंदिश स्त्री की असल बंदिश है.

पुरुष सत्ता तंत्र स्त्री-यौनांग को खूंटियों में जकड़कर रखता है. यौन-स्वाधीनता का अर्थ यहां जिस किसी के साथ कभी-भी हमबिस्तर होना नहीं है. इसका मतलब है अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ सोना और सोने के लिए हर घड़ी हां कहने से ज्यादा ना कहने की आजादी. यौन संपर्क के लिए राजी होना ही यौन स्वाधीनता नहीं है, देह-संबंध के लिए राजी न होना भी यौन-स्वाधीनता है.

मूल बात है यौनांग की बंदिश, यौन-पराधीनता, घरेलू हिंसा, कन्या भ्रूण हत्या, शिशु कन्या हत्या, दहेज, ब हत्या, यौनाचार और वेश्यावृत्ति इत्यादि-ये रोग नहीं हैं-ये रोग के लक्षण हैं. रोग का नाम है-पितृ सत्ता. हम इस महामारी के लक्षण दूर करने में जुटे हैं लेकिन महामारी को नहीं. महामारी को हटाए बिना इसके लक्षण कभी भी नष्ट नहीं होंगे, हम चाहे जितनी भी कोशिश क्यों न करें. 

इंडिया टुडे के लिए विशेष रूप से लिखे इस मूल बांग्ला आलेख का अनुवाद प्रोफेसर रंजीत साहा ने किया है.

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