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इटावा लोकसभा सीट: सपा के गढ़ में खिला कमल, क्या वापसी करेगी BJP

उत्तर प्रदेश की इटावा लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. इटावा शुद्ध देशी घी का बड़ा केंद्र है. इसके अलावा कपास और रेशम बुनाई के महत्त्वपूर्ण उद्योग हैं तो तिलहन व आलू यहां की मुख्य फसल है. ये इलाका समाजवादी राजनीति का बड़ा केंद्र रहा है, लेकिन मौजूदा समय में ये सीट बीजेपी के कब्जे में हैं.

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aajtak.in
कुबूल अहमद नई दिल्ली, 23 March 2019
इटावा लोकसभा सीट: सपा के गढ़ में खिला कमल, क्या वापसी करेगी BJP बीजेपी प्रतीकात्मक फोटो

उत्तर प्रदेश की इटावा लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. इटावा शुद्ध देशी घी का बड़ा केंद्र है. इसके अलावा कपास और रेशम बुनाई के महत्त्वपूर्ण उद्योग हैं तो तिलहन व आलू यहां की मुख्य फसल है. ये इलाका समाजवादी राजनीति का बड़ा केंद्र रहा है, लेकिन मौजूदा समय में ये सीट बीजेपी के कब्जे में हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में अशोक कुमार दोहरे मुलायम के गढ़ में कमल खिलाने में कामयाब रहे थे. 1991 में बसपा के संस्थापक कांशीराम भी इस सीट से जीतकर सांसद पहुंचे थे.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

इटावा लोकसभा सीट पर अभी तक कुल 16 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें से चार-चार बार सपा और कांग्रेस ने जीत हासिल की है. जबकि दो बार बीजेपी और एक-एक बार बसपा, जनता दल, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी जीत दर्ज की हैं.

आजादी के बाद पहली बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के तुला राम ने जीत हासिल की. इसके बाद 1957 में हुए चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी के अर्जुन सिंह भदौरिया सांसद बने. 1962 में कांग्रेस के जीएन दीक्षित चुनाव जीते. लेकिन 1967 में अर्जुन सिंह भदौरिया संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीतने में कामयाब रहे. लेकिन1971 में यहां कांग्रेस ने वापसी और शंकर तिवारी सांसद बने.

1977 में अर्जुन सिंह ने भारतीय लोकदल से जीत हासिल की, लेकिन 1980 में जनता पार्टी से राम सिंह शाक्य ने जीत का परचम फहराया. 1984 में रघुराज सिंह चौधरी कांग्रेस से जीते, पर 1989 में राम सिंह शाक्य जनता दल से उतरे और जीत हासिल की और 1991 में बसपा से कांशीराम ने विजय दर्ज की. 1996 में राम सिंह शाक्य से सपा उतरे और एक बार फिर जीतने में कामयाब रहे. 1998 में पहली बार बीजेपी इटावा सीट पर कमल खिलाया और सुखदा मिश्र पहली बार कोई महिला सांसद बनी.

1999 और 2004 रघुराज सिंह शाक्य सपा से जीत हासिल की. इसके बाद 2009 में परिसीमन के बाद इटावा लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हो गई और यहां से सपा के प्रेमदास कठेरिया ने जीत दर्ज की, लेकिन 2014 में मोदी लहर के सहारे अशोक कुमार दोहरे बीजेपी का कमल खिलाने में कामयाब रहे.

सामाजिक ताना-बाना

इटावा लोकसभा सीट पर 2011 के जनगणना के मुताबिक कुल जनसंख्या 2374473 है. इसमें 76.36 फीसदी ग्रामीण औैर 23.64 फीसदी शहरी आबादी है. 2017 में हुए विधानसभा चुनाव के मुताबिक इस लोकसभा सीट पर पांचों विधानसभा सीटों पर कुल 1721858  मतदाता और 1939 मतदान केंद्र हैं. अनुसूचित जाति की आबादी इस सीट पर 26.79 फीसदी है जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.02 फीसदी है. इसके अलावा इटावा संसदीय सीट पर ओबीसी समुदाय में यादव और शाक्य मतदाताओं के साथ-साथ राजपूत मतदाता काफी निर्णायक भूमिका में हैं. जबकि 7 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं.

इटावा लोकसभा सीट के अंतर्गत कुल पांच विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें इटावा, भरथना, दिबियापुर, औरैया और सिकन्दरा विधानसभा सीटें आती हैं. भरथना सीट पर सपा बाकी चार सीटों पर बीजेपी का कब्जा है.

2014 का जनादेश

2014 के लोकसभा चुनाव में इटावा संसदीय सीट पर 55.04 फीसदी मतदान हुए थे. इस सीट पर बीजेपी के अशोक कुमार दोहरे ने सपा के प्रेमदास कठेरिया को एक लाख 72 हजार 946 वोटों से मात देकर जीत हासिल की थी.

बीजेपी के अशोक कुमार दोहरे को 4,39,646 वोट मिले

सपा के प्रेमदास कठेरिया को 2,66,700 वोट मिले

बसपा के अजय पाल सिंह जाटव को 1,92,804 वोट मिले  

कांग्रेस के हंस मुखी कोरी को 13,397 वोट मिले

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

इटावा लोकसभा सीट से 2014 में जीते अशोक कुमार दोहरे ने लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन रहा है. पांच साल में चले सदन के 331 दिन में वो  274 दिन उपस्थित रहे. इस दौरान उन्होंने कोई भी सवाल नहीं उठाए, लेकिन 4 बहसों में हिस्सा जरूर लिया. इतना ही नहीं उन्होंने पांच साल में मिले 25 करोड़ सांसद निधि में से 14.51 करोड़ रुपये विकास कार्यों पर खर्च किया.

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