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पश्चिम बंगालः दमदम में कोई भी नहीं दिखा सका लगातार दमदख

 Dum Dum Lok Sabha दमदम लोकसभा सीट पर किसी पार्टी विशेष का दबदबा नहीं रहा है. हालांकि बीजेपी सहित विरोधी पार्टियां यहां पर केवल पांच चुनाव ही जीत पाई हैं. अब देखना होगा 2019 के चुनावों में यहां की राजनीति किस दिशा में जा रही है.

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वरुण शैलेशनई दिल्ली, 04 February 2019
पश्चिम बंगालः दमदम में कोई भी नहीं दिखा सका लगातार दमदख Dum Dum Lok Sabha constituency

पश्चिम बंगाल में अंग्रेजों के कदम रखने से पहले दमदम एक आबाद इलाका हुआ करता था. लेकिन 6 फरवरी 1757 को बंगाल के नवाब ने अंग्रेजों को यह इलाका सौंप दिया था और इस क्षेत्र को अपने हिसाब से तैयार करने की इजाजत दी थी. 1783 में दमदम सेना छावनी की स्थापना की गई थी. उसी दौरान इस इलाके में सेना के लिए बैरक बनाए गए. 1884 में यहां ऑर्डिनेंस फैक्टरी स्थापित की गई. बाद में यह शहर सेना, शस्त्रागार का अड्डा बन गया है, और बाद में यह बंदूकों के कारखानों के लिए जाना गया. 19वीं सदी में ब्रिटिश रॉयल आर्टिलरी दमदम शस्त्रागार की वजह से प्रसिद्ध रहा है. 1890 के दशक की शुरुआत में कैप्टन नेविल बर्टी-क्ले ने यहीं पर खास तरीके के कारतूस का निर्माण किया किया था. इससे पहले दमदम को डोमडोमा के तौर पर जाना जाता था. औपनिवेशिक काल में इसके भौगोलिक ढांचे की वजह से ही ब्रिटिश सरकार ने इसे अलग तरह से विकसित किया, जहां सेना के लिए छावनी थी और सरकारी शस्त्रागार थे.

सेना, शस्त्रागार का अड्डा रहे शहर की तस्वीर

दमदम लोकसभा सीट पर किसी पार्टी विशेष का दबदबा नहीं रहा है. हालांकि बीजेपी सहित विरोधी पार्टियां यहां पर केवल पांच चुनाव ही जीत पाई हैं. गणित के लिहाज से देखा जाए तो 1977 के बाद इस सीट पर माकपा पांच बार जीत चुकी है. इस सीट पर जिस तरीके से बीजेपी के वोट शेयर में बढ़ोतरी हो रही है, उसे देखते हुए वह ज्यादा सक्रियता दिखा रही है. बहरहाल, 1977 में इस सीट पर जब पहली बार चुनाव हुआ, उस दौरान भारतीय लोक दल के टिकट पर अशोक कृष्ण दत्त सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे थे. 1980 के चुनाव में माकपा के उम्मीदवार निरेन घोष चुने गए थे. 1984 के चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी और उसके उम्मीदवार आशुतोष लाहा संसद पहुंचे थे. इसके बाद माकपा के 1989, 1991 और 1996 के लोकसभा चुनावों में माकपा के निर्मल कांति चटर्जी चुनाव जीतते रहे. इसी तरह 1998 और 1999 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के तपन सिकदर चुनाव जीते. 2004 के चुनाव में माकपा के अमिताव नंदी चुनकर संसद पहुंचे. 2009 में तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार इस सीट पर जीत हासिल की और सौगत रॉय सांसद बने.

सामाजिक ताना-बाना  

दमदम लोकसभा सीट उत्तर 24 परगना जिले में आती है. जनगणना 2011 के आंकड़ों के मुताबिक इस संसदीय क्षेत्र की कुल आबादी 21,63,791 है. इसमें 1.58% आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है जबकि 98.42% जनता शहरी इलाकों में रहती है. दमदम संसदीय क्षेत्र की कुल आबादी में अनुसूचित जाति और जनजाति की हिस्सेदारी क्रमशः 10.96 और 1.03 फीसदी है. मतदाता सूची 2017 के अनुसार इस सीट पर 15,11,515 मतदाता जो 1727 मतदाता केंद्रों पर वोटिंग करेंगे. 2014 के चुनावों में 80.64% फीसदी मतदान हुआ था, लेकिन 2009 में 80.49% लोगों ने मतदान किया था. दमदम संसदीय क्षेत्र में सात विधानसभा सीटें आती हैं जिनमें खरदाह (Khardaha), दमदम उत्तर (Dum Dum Uttar), पनिहाटी (Panihati), कमरहाटी (Kamarhati), बारानगर (Baranagar),  दम दम (Dum Dum) और राजरहाट गोपालपुर (Rajarhat Gopalpur) शामिल हैं.

क्या कहता है 2014 का जनादेश

अब 2014 के आम चुनावों की बात करते हैं. असल में, पश्चिम बंगाल की दमदम लोकसभा सीट पर कॉलेज के दो पूर्व प्रध्यापकों तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा सांसद सौगत राय और माकपा के प्रत्याशी असीम दासगुप्ता के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला था. हालांकि उस दौरान बीजेपी की उपस्थिति ने इस सीट पर चुनावी सियासत को दिलचस्प बना दिया था. यूपीए सरकार में राज्य मंत्री रहे TMC के सांसद सौगत रॉय ने 2009 में माकपा के अमिताभ नंदी को 20,000 मतों से हराया था. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 1990 के दशक के अंतिम चरण में सिकदर इस सीट से तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में चल रही हवा और तृणमूल-बीजेपी गठबंधन के कारण जीते थे. अब देखना होगा 2019 के चुनावों में राजनीति किस दिशा में जा रही है.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

बतौर सांसद सौगत सदन में 90 फीसदी उपस्थित रहे. खासबात यह है कि उन्होंने सदन की 204 बहसों में हिस्सेदारी की और 559 सवाल पूछे. दमदम संसदीय क्षेत्र के लिए सांसद निधि के तहत 25 करोड़ रुपये निर्धारित हैं. विकास संबंधी कार्यों के लिए 25 करोड़ रुपये पूरे जारी कर दिये गए. सौगत रॉय इसमें 89.35 फीसदी राशि खर्च कर चुके हैं. 

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