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बेडौल से सुडौल: कन्फेशंस ऑफ अ सीरियल डायटर

एक सीरियल डायटर के नतीजा-बेनतीजा प्रयोगों से उजागर हुई गोपनीय खुराक और व्यायाम. वजन गंवाकर जिंदगी हासिल करने की कहानी कन्फेशंस वजन के साथ हमारे अंतरंग रिश्ते और उसके साथ तालमेल के तरीके का सच्चा ब्यौरा है.

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दमयंती दत्तानई दिल्‍ली, 23 December 2011
बेडौल से सुडौल: कन्फेशंस ऑफ अ सीरियल डायटर

कन्फेशंस ऑफ अ सीरियल डायटर

कली पुरी

हार्पर कॉलिन्स

कीमत 250 रु.

पन्ने 255

उसके लिए, जिसने मुझे सबसे ज्‍यादा प्यार तब किया, जब मैं खुद से जरा भी प्यार नहीं करती थी.'' वजन घटाने को लेकर कली पुरी की कहानी, कन्फेशंस ऑफ अ सीरियल डायटर के समर्पण पृष्ठ पर लिखी यह बात एक तरह से सब कुछ बयान कर देती है. 'खुद करके सीखो' शैली में लिखी गई यह किताब बेडौल से सुडौल शरीर पाने की यादों पर आधारित वृतांत है. यह एक 'सीरियल डायटर' के छटपटाहट भरे तीन दशक और 43 उत्सुकता भरे तरीकों की वजन घटाने की यात्रा है-जो अंत में वजन निर्वाण पर जाकर खत्म होती है-100 किलो से 60 किलो पर. यह किताब उस देश में एक नई विधा की शुरुआत है, जहां वजन कम करने की सलाह या तो योग गुरुओं के पावन कार्यक्षेत्र से आती है, या ''दुबलेपन के डॉक्टरों और फिट रखने वाले डायटीशियनों'' की दुनिया से.

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

विशेषज्ञों की लिखी गाइड पुस्तकों में प्यार को कभी भी मोटापे का तोड़ नहीं बताया गया है, लेकिन पुरी की किताब में ऐसा है. वे लिखती हैं, ''प्यार एक लाजवाब प्रेरणा है.'' इंग्लैंड की कड़ाके की सुबह में सुन्न उंगलियों के बावजूद प्यार ही है जो ऑक्सफोर्ड में पढ़ने वाली एक छात्रा के रूप में उन्हें नौकायन में शामिल करवाता है; उनसे बेहद-पसंदीदा करारे चीज़ क्रैकर्स और चॉकलेट छुड़वा देता है; इडली और भेलपुरी पर गुजारा करवाता है; घरेलू वीडियो पर जेन फोंडा के साथ ताल मिलवाता है और भारत के पहले वेट लॉस सेंटर पर वाइब्रेशन मशीनों के आगे समर्पित करवा देता है. वे कहती हैं, ''मैं इस कार्यक्रम पर डटी रही, क्योंकि मेरे सामने एक डेडलाइन थी, एक लवलाइन.'' 18 से 24 साल के सफर में प्यार ने उनका वजन 75 किलो से 58 किलो करवा दिया.

यह खब्ती लेकिन पक्के इरादों से भरा सफर उस नई खोज को दोहराता है कि वजन जितना शरीर में होता है, उतना ही दिमाग में भी होता है. मोटापे से जुड़े मनोवैज्ञानिक पक्षों की उन कारकों के तौर पर रिसर्च की जा रही है, जो लोगों को प्लस साइज के शरीर में धकेल देते हैं, उतना ही, जैसे लाइफस्टाइल की ज्‍यादतियां. वजन महिलाओं को ज्‍यादा गहरी मार मारता है. येल यूनिवर्सिटी का ताजा अध्ययन बताता है कि 5 फुट 5 इंच की महिला जैसे ही 73 किग्रा की होती है, उसे पूर्वाग्रहों और समाज के उलाहनों का सामना करना पड़ता है, जबकि इसी सबका सामना 5 फुट 9 इंच के पुरुष को तब करना होता है, जब वह 107 किलो का हो जाता है. गुस्से और घबराहट की नकारात्मक भावनाओं के जवाब में खाने का दुष्चक्र-एक और दुष्चक्र पैदा कर देता हैः अपराधबोध, शर्म, मायूसी और वजन न बढ़ने देने में और ज्‍यादा परेशानी.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

सेक्‍स सर्वे: तस्‍वीरों से जानिए कैसे बदल रहा है भारतीय समाज

वजन कम करने के उपाय बताने वाले गुरुओं और पुरी के सफर में बड़ा अंतर यह है कि वे उन रास्तों से गुजर चुकी हैं और सब करके देख चुकी हैं. जैसा कि वे लिखती हैं, ''वे एक मोटे इंसान का जेहन, मनोदशा और उसकी लाचारगी नहीं समझ्ते.'' गहन अनुभव, खुद के प्रयोगों और गहरी परख से परिपूर्ण, यह किताब उस हर इंसान के लिए है जिसका अपने वजन के साथ कष्टकारी संबंध है, चाहे वह आखिरी दो किलो का मामला हो या भारी-भरकम 100 किलो का. कन्फेशंस... खुद जमकर अपनी खिल्ली उड़ाने और किताब के पन्नों से बाहर छलांगें लगाते पात्रों की रोचक कहानी है. यह दिलचस्प और प्रेरणादायक किताब, डायट बुक की बजाए एक उपन्यास की तरह है.

30 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

कन्फेशंस... बाजार में जल्दी ही आने वाली है. नए साल में पुरी की अपनी रचनाः शैंपेन डायट. जश्न मनाओ और वजन घटाओ.

पुस्तक अंश

समय से पहले मेरा जन्म हुआ था, वजन था मात्र 2.5 किलोग्राम. मैं एक साल की हुई, तब ओवरवेट थी-और यह तब था, जब खाने की मेरी चॉइस मैश किए सेब और केले तक सीमित थी. चार साल की उम्र में, मैं प्री-स्कूल में अपने दोस्तों के साथ खाने की अदला-बदली करने में सक्षम थी. मेरे पास उनकी चॉकलेट ट्रफल पेस्ट्री होती थी और उनके पास मेरी नल के पानी से भरी बोतल. मैं चार साल की ही उम्र में अपनी पहली डायट पर थी. उसके बाद मैंने कभी पलट कर नहीं देखा. उसके बाद से मैं डायट (खानपान) और वर्कआउट (कसरत) के 40 प्रोग्राम आजमा चुकी हूं. इनमें से कुछ तो दो-दो बार किए हैं.

मैं कबूल करती हूं कि मैं एक सीरियल डायटर हूं. मैं 55 किलो की भी हो चुकी हूं और 104 किलो की भी. मेरी काबिलियत की एक वजनदार लिस्ट है. मैं कोई गुरु नहीं हूं. दुबला बनाने वाले डॉक्टर और फिट रखने वाले डायटीशियन वजन घटाने के हेल्दी तरीकों के बारे में लगातार बातें कर सकते हैं, लेकिन वे एक मोटे इंसान का जेहन, मूड और उसकी बेचारगी नहीं समझ्ते. उन्होंने वह फैट सूट कभी नहीं पहना होता है. उन्होंने उस राह पर कभी चलकर नहीं देखा होता है. लेकिन चूंकि वे एक ही समस्या वाले इतने सारे लोगों से मिलते हैं और उनकी मदद करते हैं, इसलिए उनके पास वास्तव में कुछ अच्छे समाधान और नजरिए होते हैं. इसके बावजूद बात वही नहीं होती. डायटीशियंस और ट्रेनर्स आपको बता सकते हैं कि क्या करना है और उसे करने में मदद कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने खुद वह नहीं किया होता है जो मैंने किया है.

कायाकल्प के बारे में एक जानी-मानी नीतिकथा है- द अग्ली डकलिंग. एक बदसूरत बत्तख खूबसूरत हंस में बदल जाती है. जब वह बदसूरत होती है तब हर कोई उससे किनारा कर लेता है. वह अकेली और दुखी होती है. लेकिन जब वह एक खूबसूरत हंस बन जाती है तब हर कोई उसे चाहने लगता है और उससे दोस्ती करना चाहता है. नीतिकथाएं डरावनी और पारंपरिक सोच से अलग होती हैं, लेकिन हम इसी सब के साथ बड़े हुए होते हैं. यह आपके दिलो-दिमाग में रची-बसी होती हैः मोटे और बदसूरत मशर नहीं होते; दुबले और खूबसूरत हर दिल अजीज होते हैं. लेकिन एक बार जब आप अपना वजन 20 किलो या उससे ज्‍यादा कम कर लेते हैं, तो यह एक बदसूरत बत्तख के एक खूबसूरत हंस में बदल जाने जैसा बदलाव नहीं होता; यह पूर्ण बदलाव होता है, कायाकल्प. इस किस्म का कायाकल्प वैसा ही है, जैसे किसी इल्ली का तितली बन जाना.

23 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

16 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

यह रूपांतरण सिर्फ दूसरे तरह का नजर आने का नहीं, बल्कि दूसरे ढंग से जीने का मामला है. तितली और इल्ली दो अलग जीवन जीते हैं. एक नाजुक, आकर्षक और खूबसूरत होती है. दूसरी मोटी, रोएंदार और भद्दी. एक मंडराती और उड़ती है. दूसरी घिसटते हुए चलती है. एक सिर्फ फूलों का रस पीती है, दूसरी को जो मिल जाता है, वही खा लेती है. 45 किलो वजन कम करना उसी तरह है. इसने मुझे एक बिल्कुल नया बना व्यक्ति दिया. आज, लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, ''तुम अपना बाकी हिस्सा कहां छोड़ आई?'' उन्हें एहसास नहीं होता कि वे सच के कितने करीब हैं.

मैं तीन अंकों वाले वजन से 58 किलो पर आई. मैं 45 किलो वजन कम कर चुकी हूं और गिनती अब भी जारी है. मैं उन चीजों पर हैरान हूं जो छोटी और दुबली हो गई हैं. वे सब शरीर के आसानी से नजर आने वाले अंग हैं- पेट, कूल्हे, जांघें; हाथों और पिंडलियों जैसे कठोर हिस्से; और कहीं ज्‍यादा नुमायां शरीर का ऊपरी हिस्सा. इसके बाद कम नुमायां होने वाले अंग हैं, जैसे-गर्दन, उंगलियां, पैर. मैं ड्रेस की साइज के लिहाज से दस अंक छोटी हो चुकी हूं, साइज 18 से साइज 8 तक. मैंने दूसरे अंगों में भी वजन कम किया है, उन हिस्सों से, जहां चर्बी जमा हो जाती है और आपको पता भी नहीं चलता. चर्बी बिना आवाज किए मारने वालों में से है, वह आपके इर्दगिर्द इकट्ठी होती है, आपको सुस्त, धीमा और निकम्मा बना देती है. चर्बी संक्रामक होती है, लिहाजा आपका दिमाग भी अपनी धार खोने लगता है. वह भी उस शरीर की तरह सुस्त हो जाता है, जिस शरीर में वह रहता है. मेरा दिमाग चुस्त है और चौकन्ना है और मैं बहुत सारे काम कर सकने वाली देवी हूं.

9 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
2 नवंबर 201: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

वह सीमा रेखा क्या है, जब आपको पता चलता है कि आप लालच से लड़ने में सक्षम हैं? जब आप घर से बाहर निकलती हैं, और अंधाधुंध खा-पीकर नहीं लौटती हैं? यह आपके मूल वजन, लक्षित वजन और इच्छाशक्ति का एक जटिल समीकरण है. लेकिन मैं आसानी से कह सकती हूं कि बाजी पलटने के लिए 5 से 7 किलो वजन कम कर लेना काफी है. और अगर आपका वजन, आपके आदर्श वजन से 20 किलो या उससे भी ज्‍यादा है, तो 5 किलो कम कर लेना बहुत कठिन नहीं है, लेकिन वजन कम करने के लिहाज से यह अच्छा-खासा है. और आप इस कम किए गए वजन को बरकरार रखने के लिए प्रेरित हैं. तो, जब लालच होता है तब भी, आपका दिमाग आपको दूसरी सलाह देता है और आप लालच पर रोक लगाने में सक्षम हो जाते हैं.

तो, मैं सोशलाइज कैसे होती थी? 

सच तो यह है कि मैं होती ही नहीं थी, अपनी पहल पर तो नहीं. रात में बाहर निकलना मेरे लिए बहुत कठिन होता था. एक, क्योंकि डिनर की योजना का मतलब होता था कि मैं टेबल पर बैठकर डायट कोक पीती रहूंगी और बाकी लोगों को दावत उड़ाते देखती रहूंगी. हालांकि इससे मुझे औरों से बेहतर होने का एहसास होता था, लेकिन मुझे अपनी पूरी डायट की सफाई देनी पड़ती थी, जिससे बाकी लोगों में अपराधबोध पैदा होता था. कॉकटेल पार्टियों में ड्रिंक्स और स्नैक्स बहुत ज्‍यादा ललचाते थे. स्वीट चिली सॉस में डुबोया गया सिर्फ एक बैटर्ड प्रॉन, एक कुरकुरा स्‍प्रिंग रोल, एक तंदूरी पनीर, कैलिफोर्निया सुशी का एक टुकड़ा और बस.

मेरे शौहर मुझे इतना प्यार करते थे कि वे मुझे बाहर जाने के लिए मजबूर नहीं करते थे. उन्होंने कभी इस बात के लिए जोर नहीं डाला कि मैं उनके साथ डिनर करूं. मैं बेचारी महीनों तक अकेले खाना खाती रही. लेकिन मैं उनकी भी कल्पना कर सकती हूं, बदलाव हौसला बढ़ाने वाले थे क्योंकि वे अपनी 100 किलो की बीवी को वापस नहीं चाहते थे. उन्होंने कभी जोर नहीं डाला कि मैं वजन कम करूं, क्योंकि इसका अंत झ्गड़े में निकलता था, लेकिन उन्होंने सपोर्टिंग भूमिका ऑस्कर पुरस्कार लायक ढंग से अदा की. दो महीने तक मैं रात को बाहर नहीं निकली. मैं इतना भरा पेट महसूस करती थी कि मुझे खाने का लालच नहीं होता था. सच कहा जाना चाहिए, डायटिंग का नो-डिनर नियम यकीनन सख्त है, क्योंकि ज्‍यादातर बार सोशलाइजिंग डिनर के इर्दगिर्द होती है. और लालच से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि उससे दूर रहा जाए. आपको कीमत तो चुकानी ही पड़ती है.

और चुकाने के लिहाज से यह एक छोटी-सी कीमत है. मैं इसकी बजाए दोस्तों से कॉफी पर मुलाकात करने लगी. मुझे छह बजे कॉफी पीने की इजाजत थी. वह मेरा डिनर होता था. इसने बखूबी काम किया. मैंने डिनर्स और पार्टियों में खुद को तभी जाने दिया, जब मेरा दिमाग मजबूत हो गया, मेरा पेट छोटा हो गया और मेरा वार्डरोब और आकर्षक हो गया. जब एक बार शरीर नए रूटीन में रम जाता है, तो आपका कम हो चुका वजन आपको धोखा न देने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है. आपका दिमाग, शरीर, आत्मा सब कुछ अच्छा चखने की बजाए अच्छा नजर आने के अंकुश में फंस जाते हैं.

जब मैंने बेहतर दिखना और महसूस करना शुरू किया तो मुझे बाहर जाना अच्छा लगने लगा. मेरी योजना डिनर की कम और अपनी नई पोशाक दिखाने की ज्‍यादा होती थी. मैं एक गिलास शैंपेन या व्हाइट वाइन पीती थी और किसी और चीज के लिए अपना मुंह नहीं खोलती थी. यहां तक कि दुनिया की सबसे अच्छी डिशेज़ को चखने के लिए भी नहीं. कभी-कभी मैं देर से घर लौटती थी और फल या दही खाती थी. एक बार मैंने रात को देर से खाना खाने का पैटर्न तोड़ दिया, सुबह मैंने काफी अच्छा महसूस किया. मैं तरोताजा और भूखी थी और कसरत करने और नाश्ता करने के लिए तैयार थी. काफी देर से और जमकर डिनर करके सो जाने पर मैं सुबह हमेशा सुस्ती, उबकाई महसूस करती थी और नाश्ते के लिए भूख नहीं लगती थी.

*****

बहन की शादी अपना वजन कम करने की बहुत बढ़िया वजह है. शादी दो महीने बाद थी और मुझे लगा कि कि मेरा शरीर 80 किलो से कम का वजन स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. मैं कम करते-करते 75 किलो तक पहुंची और फिर 79 किलो पर लौट गई. हर कोई मुझसे कहता था कि मैं कितनी अच्छी दिख रही हूं. पहले तो मैंने उन पर विश्वास कर लिया, इससे और वजन कम करने की प्रेरणा कमजोर पड़ गई. लेकिन जब मैंने तस्वीरें देखीं, तो मुझे पता चला कि वे सभी झूठ बोल रहे थे. या हो सकता है, उन्होंने न बोला हो. उनकी तारीफ तुलनात्मक होती थी. ''तुम पहले जैसी थीं, उसकी तुलना में अब बहुत अच्छी लग रही हो.'' मेरे लिए अब यह काफी नहीं रह गया था. मैं ऐसी तारीफ चाहती थी, जिसमें किसी से तुलना न हो.

19 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
12 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

5 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

शादी, खाने और शैंपेन का मेला था. दूल्हा-दुल्हन के हनीमून से लौट आने के भी कई हफ्ते बाद तक पार्टी चलती रही और इसी तरह खाने के साथ मेरी दोस्ती चलती रही. इस दौरान, पैमाना फिर सरक कर 80 पर पहुंच रहा था. फिर वही 4 किलो. 75 से 79 की दौड़ मैं करीब चार बार लगा चुकी थी और इससे आजिज आने लगी थी. मेरे पारिवारिक डॉक्टर का कहना था कि मेरा शरीर उसके औसत वजन पर है. हर किसी का औसत वजन होता है और मेरा 79 से 80 किलो का था. मैं इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थी. मैंने इसे सुस्ताने वाले एक पड़ाव के तौर पर देखा. शरीर को नए वजन के साथ तालमेल बैठाने के लिए वक्त चाहिए था, क्योंकि मैं बहुत जबरदस्त बदलाव की मांग कर रही थी.

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