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बस्तीः बीजेपी के लिए सपा-बसपा से पार पाना आसान नहीं होगा

1990 के बाद देश में राजनीति की दिशा बदली और कांग्रेस के हाथ से बस्ती सीट भी छीन गई. 1991 से 1999 तक लगातार 4 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यह सीट अपने नाम की. 2004 में बसपा के लालमणि प्रसाद ने बीजेपी को चौंकाते हुए हरा दिया.

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aajtak.in
सुरेंद्र कुमार वर्मा नई दिल्ली, 13 February 2019
बस्तीः बीजेपी के लिए सपा-बसपा से पार पाना आसान नहीं होगा सांकेतिक तस्वीर (ट्विटर)

हिंदी के प्रकांड विद्वान, आलोचक, निबंधकार, अनुवादक, कथाकार और कवि आचार्य रामचंद्र शुक्ल की धरती के नाम से पहचाने जाने वाली बस्ती ने कई महान हस्तियों से समाज को नवाजा है. इस जिले की अपनी ऐतिहासिक पहचान है. बस्ती लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश के 80 संसदीय सीटों में से एक है और इसकी सीट संख्या 61 है.  

प्राचीन काल में बस्ती को वैशिश्थी के नाम से जाना जाता था. वैशिश्ठी नाम वसिष्ठ ऋषि के नाम से बना है, जिनका ऋषि आश्रम यहीं पर था. बस्ती का वर्तमान नाम 16वीं सदी में राजा कल्हण ने रखा था. ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1801 में बस्ती तहसील मुख्यालय बन गया था और 1865 में इसे गोरखपुर कमिश्नरी में नए जिले के मुख्यालय के रूप में चुना गया. बस्ती जिला पूर्व में संत कबीर नगर, पश्चिम में गोंडा, दक्षिण में फैजाबाद और अंबेडकर नगर, उत्तर में सिद्धार्थ नगर जिला से घिरा हुआ है.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव के दौरान स्वतंत्र रूप से बस्ती संसदीय सीट नहीं थी और यह 3 संसदीय सीटों में बंटी हुई थी. लेकिन 1957 के लोकसभा चुनाव में सुरक्षित बस्ती संसदीय सीट से निर्दलीय प्रत्याशी राम गरीब सांसद बने थे. कुछ समय बाद यहां पर हुए उपचुनाव में केशव देव मालवीय चुनाव जीतने में कामयाब हुए. 1957 से 1971 तक यहां पर कांग्रेस का कब्जा रहा है. 1997 में कांग्रेस को भारतीय लोकदल के हाथों हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद 1980 और 1984 में कांग्रेस फिर से जीतने में कामयाब रही.

1990 के बाद देश में राजनीति की दिशा बदली और कांग्रेस के हाथ से यह सीट भी छीन गई. 1991 से 1999 तक लगातार 4 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यह सीट अपने नाम की. 2004 में बसपा के लालमणि प्रसाद ने बीजेपी को चौंकाते हुए हरा दिया. 2004 तक यह सीट सुरक्षित सीट थी, लेकिन 2009 से यह सामान्य सीट में आ गया. 2009 में बसपा के अरविंद कुमार चौधरी ने सपा के राजकिशोर सिंह को हराते हुए जीत हासिल की. 1999 के बाद 2014 में बीजेपी ने फिर से जीत हासिल की.

सामाजिक तानाबाना

2011 की जनगणना के अनुसार बस्ती की आबादी 24.6 लाख है और उत्तर प्रदेश की 31वां सबसे घनी आबादी वाला जिला है. क्षेत्रफल के आधार पर यह 26वां सबसे छोटा जिला है. 24.6 लाख की आबादी में 12.6 लाख (51%) पुरुष  और 12.1 लाख (49%) महिलाएं हैं. जातिगत आधार पर 79 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग से जुड़े हैं जबकि  21%  आबादी अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं.

धर्म आधारित जनगणना के आधार पर 85 फीसदी हिंदू आबादी और 14.81 फीसदी आबादी मुस्लिम समाज की रहती है. लिंगानुपात के मामले में प्रति हजार पुरुषों में 963 महिलाएं हैं जबकि सामान्य वर्ग में लिंगानुपात 965 है. साक्षरता के मामले में बस्ती की 67% आबादी साक्षर है जिसमें 78% पुरुष और 56% महिलाएं शामिल हैं.

बस्ती लोकसभा सीट में 5 विधानसभा सीट (हरैया, कप्तानगंज, रुधौली, बस्ती सदर और महादेवा) है और सभी सीट पर बीजेपी का ही कब्जा है. हरैया विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का कब्जा है. 2017 के चुनाव बीजेपी के अजय कुमार सिंह ने समाजवादी पार्टी के राजकिशोर सिॆंह को 30,106 मतों के अंतर से हराया था. वहीं कप्तानगंज से बीजेपी के चंद्र प्रकाश ने बहुजन समाज पार्टी के राम प्रसाद चौधरी को 6,827 मतों के अंतर से हराकर जीत हासिल की थी.

रुधौली विधानसभा सीट पर भी बीजेपी का कब्जा है. यहां से संजय प्रताप जयसवाल ने बसपा के राजेंद्र प्रसाद चौधरी को 21,805 मतों के अंतर से हराया था. पिछले विधानसभा चुनाव में बस्ती सदर से भी बीजेपी ने जीत हासिल की थी. दयाराम चौधरी ने 42,594 मतों के अंतर से जीत हासिल करते हुए सपा के महेंद्र यादव को हराया था. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित महादेवा विधानसभा से बीजेपी के रविकुमार सोनकर ने बसपा के दूधराम को 25,884 मतों के अंतर से हराया था.

2011 की जनगणना के आधार पर बस्ती जिले की आबादी 24.6 लाख है जिसमें 12.6 लाख (51%) पुरुष और 12.1 लाख (49%) महिलाएं हैं. इस आबादी में 79% लोग सामान्य वर्ग से आते हैं जबकि 21% लोग अनुसूचित जाति से हैं.

धर्म आधारित आबादी के आधार पर 85% आबादी हिंदुओं की है जबकि 15% जनसंख्या मुसलमानों की है. धार्मिक आधार पर लिंगानुपात में प्रति हजार पुरुषों पर 950 महिलाएं हैं जबकि मुस्लिम समाज में यह स्थिति 1,042 है. ओवरऑल देखा जाए तो यहां का लिंगानुपात प्रति हजार पुरुष के साथ 963 महिलाएं है. जिले की 13.9 लाख शिक्षित हैं, जिसमें 8.2 लाख पुरुष और 5.7 लाख महिलाएं हैं.

2014 का जनादेश

2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या 18,47,613 थी, जिसमें 10,22,508 मतदाता पुरुष और 8,25,105 महिला मतदाता हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में  10,48,534 (56.8%) मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. कुल पड़े मतों में से 10,168 (0.6%) मत नोटा में पड़े. बस्ती से कुल 13 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई थी, जिसमें बाजी बीजेपी के हरीश चंद्र उर्फ हरीश द्विवेदी के हाथ लगी थी. उन्होंने चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार बृजकिशोर सिंह डिंपल को 33,562 मतों के अंतर से हराया था. हरीश को 34.1% जबकि बृजकिशोर को 30.9% वोट मिले थे और इनके बीच जीत-हार का अंतर महज 3.2 फीसदी वोटों का था.

चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के राम प्रसाद चौधरी तीसरे स्थान पर रहे जिन्हें 283,747 मत और चौथे स्थान पर रहने वाले कांग्रेस के अंबिका सिंह को 27,673 मत मिले थे. पांचवें स्थान पर आम आदमी पार्टी रही जिसके उम्मीदवार आनंद राजपाल को 8,407  मत मिले.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

राजनीतिक विज्ञान में परास्नातक की डिग्री लेने वाले 45 साल के हरीश चंद्र उर्फ हरीश द्विवेदी मूल रूप से किसान हैं. उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है.

पहली बार लोकसभा में पहुंचने वाले हरीश चंद्र उर्फ हरीश द्विवेदी ऊर्जा और वित्त विभाग से जुड़ी स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य हैं. जहां तक लोकसभा में उनकी उपस्थिति का सवाल है तो 8 जनवरी, 2019 तक उनकी 86 फीसदी उपस्थिति राष्ट्रीय औसत (80%) से अधिक है. बतौर सांसद उन्होंने 33 बहस में हिस्सा लिया. हालांकि उनकी उपस्थिति 90 फीसदी से कम है लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय औसत (285) और राज्य औसत (193) से काफी ज्यादा 318 सवाल पूछे हैं. उन्होंने अब तक एक भी प्राइवेट मेंबर्स बिल पेश नहीं किया है.

बस्ती संसदीय सीट पर 2014 में चुनाव कांटेदार रहा था. बीजेपी के हरीश चंद्र ने महज 3.2 फीसदी मतों के अंतर से यह जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार यह राह आसान नहीं दिख रही. दूसरे और तीसरे स्थान पर रही सपा और बसपा इस बार एक हो गए हैं और पिछले मिले मतों को जोड़ा जाए तो उनके खाते में 58 फीसदी वोट आ जाते हैं. दूसरी ओर प्रियंका गांधी के राजनीति में कूदने और पूर्वांचल का प्रभार लेने से कांग्रेस भी अपनी चुनौती पेश कर सकती है. ऐसे में देखना होगा कि बीजेपी अपनी सीट बचाने के लिए किस तरह की रणनीति अपनाती है. सपा-बसपा गठबंधन और प्रियंका गांधी के आने के बाद बीजेपी के लिए मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है.

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