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तेभागा आंदोलन की धरती बसीरहाट सीट पर माकपा और कांग्रेस के बीच रही है टक्कर

Basirhat constituency बसीरहाट लोकसभा सीट पर आमतौर पर कांग्रेस और माकपा के बीच मुकाबला रहा है, लेकिन 2009 के आम चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार इस सीट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी

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aajtak.in
वरुण शैलेश नई दिल्ली, 15 March 2019
तेभागा आंदोलन की धरती बसीरहाट सीट पर माकपा और कांग्रेस के बीच रही है टक्कर Basirhat constituency

पश्चिम बंगाल में बसीरहाट औपनिवेशक काल में तेभागा किसान आंदोलन की जमीन रही है. तेभागा आंदोलन बंगाल का प्रसिद्ध किसान आंदोलन था. वर्ष 1946 का यह आंदोलन सर्वाधिक सशक्त आंदोलन था, जिसमें किसानों ने फ्लाइड कमीशन की सिफ़ारिश के अनुरूप लगान की दर घटाकर एक तिहाई करने के लिए संघर्ष शुरू किया था. यह आंदोलन जोतदारों के खिलाफ बंटाईदारों का आंदोलन था. इस आंदोलन के महत्त्वपूर्ण नेता कम्पाराम सिंह और भवन सिंह थे.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

बसीरहाट लोकसभा सीट पर कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) के बीच सीधे टक्कर रही है. लेकिन 2009 के आम चुनावों में इस सीट पर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने बाजी मारी. 1952 में जब देश में पहला आम चुनाव हुआ, उस समय यह सीट दो सदस्यीय लोकसभा क्षेत्र था. 1952 के आम चुनावों में यहां से माकपा के टिकट पर रेणु चक्रवर्ती ने जीत हासिल की थी. उनके बाद कांग्रेस की प्रतिमा रॉय सांसद बनीं. 1957 के आम चुनावों में माकपा की रेणु चक्रवर्ती दोबारा जीत हासिल करने में कामयाब रहीं. उनके बाद कांग्रेस के परेशनाथ कायल सांसद बने. 1962 के चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार हुमांयू कबीर जीतकर संसद पहुंचे. 1967 के आम चुनावों में बांग्ला कांग्रेस ने इस सीट पर जीत हासिल की और हुमांयू कबीर सांसद बनें. 1970 के चुनावों में बांग्ला कांग्रेस ने दोबारा इस सीट पर जीत दर्ज की और सरदार अमजद अली लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे. फिर 1971 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस के ए.के.एम. इश्क ने जीत दर्ज की जबकि 1977 के चुनावों में भारतीय लोकदल के अल्हाज एम. ए. हन्नान जीते. यह आपातकाल के बाद का दौर जिसमें भारतीय लोकदल ने पश्चिम बंगाल की कई लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी. 1980 और 1984 के चुनावों में माकपा के इंद्रजीत गुप्ता लगातार चुनकर संसद पहुंचते रहे. 1989 और 1991 के चुनावों में माकपा के मनोरंजन सुर लगातार चुने जाते रहे. 1996,1998,1999 और 2004 के आम चुनावों में माकपा के उम्मीदवार अजय चक्रवर्ती लगातार चुनाव जीतते रहे. लेकिन 2009 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की और उसके उम्मीदवार हाजी नुरूल इस्लाम सांसद बनें जबकि 2014 के चुनावों में तृणमूल के इद्रीस अली चुनाव जीतने में सफल रहे.

सामाजिक ताना-बाना

जनगणना 2011 के मुताबिक बसीरहाट संसदीय क्षेत्र की आबादी 2200148 है जिसमें 86.81% गांवों में रहती है जबकि 13.19% आबादी शहरी है. इनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी क्रमशः 25.34 और 6.56 फीसदी है. मतदाता सूची 2017 के मुताबिक बसीरहाट संसदीय क्षेत्र में 1613131 मतदाता हैं जो 1822 पोलिंग केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं.

2014 के जनादेश का संदेश

बसीरहाट लोकसभा सीट पर आमतौर पर कांग्रेस और माकपा के बीच मुकाबला रहा है, लेकिन 2009 के आम चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार इस सीट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी. 2014 के आम चुनावों में समूचे बंगाल में मोदी नहीं बल्कि ममता बनर्जी की लहर चली थी और तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटों पर जीत हासिल की थी. उनमें बसीरहाट लोकसभा सीट भी शामिल हैं. 2014 में टीएमसी के इद्रीस अली सांसद बने. 2014 में बसीरहाट सीट पर 85.47% मतदान हुआ था जबकि 2009 में यह आंकड़ा 86.62% था. 2014 में तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी, माकपा और कांग्रेस को क्रमशः 38.65%, 18.36%, -% और 8.02% वोट मिले थे.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

इद्रीस अली संसदीय कार्यवाही के दौरान सदन में 71 फीसदी उपस्थित रहे जबकि 25 डिबेट में हिस्सा. इस दौरान उन्होंने 17 सवाल भी पूछे. हालांकि www.prsindia.org के मुताबिक वह कोई प्राइवेट मेंबर बिल नहीं ला पाए. सांसद निधि के तौर पर बसीरहाट संसदीय क्षेत्र के लिए 25 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे जिसमें 96.06 फीसदी रकम विकास संबंधी कार्यों पर खर्च हुए.

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