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बरसों तक जिसे खून समझती रही दुनिया, बाद में वो निकला गर्म पानी

दुनिया में ऐसे बहुत से रहस्य है जो सदियों से अनसुलझे है. अंटार्कटिका एक ऐसा महाद्वीप जो पूरी तरह से बर्फ से घिरा हुआ हैं. यहां का तापमान हमेशा माइनस में रहता हैं. वैसे तो अंटार्कटिका में बहुत से बर्फ के ग्लेशियर हैं लेकिन एक ऐसा रहस्यमय ग्लेशियर भी है जिससे लाल रंग का पानी निकलता है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली , 24 July 2019
बरसों तक जिसे खून समझती रही दुनिया, बाद में वो निकला गर्म पानी ब्लड फाल्स(टेलर ग्लेशियर)

दुनिया में ऐसे बहुत से रहस्य है जो सदियों से अनसुलझे है. अंटार्कटिका एक ऐसा महाद्वीप जो पूरी तरह से बर्फ से घिरा हुआ हैं. यहां का तापमान हमेशा माइनस में रहता हैं. वैसे तो अंटार्कटिका में बहुत से बर्फ के ग्लेशियर हैं लेकिन एक ऐसा रहस्यमय ग्लेशियर भी है जिससे लाल रंग का पानी निकलता है.

इसलिए कहा जाता था ब्लड फाल्स

इसका नाम टेलर ग्लेशियर है. ईस्ट अंटार्कटिका में विक्टोरिया लैंड के मैकमुर्डो ड्राई वैलीज में वेस्ट लेक बोननी में बर्फ से ढकी सतह पर टेलर ग्लेशियर स्थित हैं. ये ग्लेशियर बड़ा ही अनोखा ग्लेशियर है. लाल रंग के पानी के कारण इसे खून से जोड़कर ग्लेशियर को ब्लड फाल्स भी कहा जाता है. ये पिछले 106 सालो से एक रहस्य बना हुआ था. लेकिन, आखिरकार वैज्ञानिको ने ग्लेशियर से निकलते हुए लाल पानी के पीछे का रहस्य सबके सामने ला दिया. 

अमेरिका के कोलोराडो कॉलेज की पूर्व स्नातक छात्र जेसिका बड़गेलेय, यूनिवर्सिटी ऑफ अलास्का की हिमनद वैज्ञानिक एरिन पेटिट और उनकी शोधकर्ताओं टीम ने मिलकर ग्लेशियर में लाल पानी होने की वजह खोज ली. उन्होंने इस शोध के लिए रेडियो इको साउंडिंग राडार का इस्तेमाल भी किया. उन्होंने बताया कि ये लाल पानी दरअसल एक विशालकाय तालाब से गिर रहा है. जो पिछले कई सालो से इस टेलर ग्लेशियर के नीचे दबा हुआ हैं.

शोधकर्ताओं ने माना कि ये पानी जैसे-जैसे फ्रीज होता जाता है, वैसे-वैसे वो गर्मी छोड़ता जाता हैं. यही गर्मी बर्फ को चारों तरफ से गरम करती है. इसी प्रक्रिया के कारण ये रासायनिक क्रियाएं हो रही हैं. इसी वजह से ग्लेशियर से लाल रंग का पानी निकल रहा है. इस अनुसंधान को 2017 में साबित किया गया.

पहले बताए जाते थे ये कारण 

इस ग्लेशियर की खोज 1911 में ऑस्ट्रेलिया के जियोलॉजिस्ट थॉमस ग्रिफ्फिथ टेलर ने की थी. इसके बाद ग्रिफ्फिथ टेलर ने इसके ऊपर शोध शुरू कर दी थी. उनकी शोध के अनुसार लाल रंग के पानी की वजह लाल रंग का शैवाल था जो ग्लेशियर की ऊपरी परत पर जम गया था. इससे ग्लेशियर से बहने वाले  पानी का रंग लाल हो गया था. कुछ लोगों ने इस रिसर्च को सही मान लिया था. ग्रिफ्फिथ टेलर अपनी इस रिसर्च की थ्योरी को साबित नहीं कर पाए, जिससे उनकी थ्योरी फ़ैल हो गई.

 इसके बाद 2003 में आई शोधकर्ताओं की टीम ने इस ग्लेशियर के पानी को लेकर दोबारा शोध शुरू कर दी थी. इनकी शोध के अनुसार वजह ये बताई गई कि पानी में लौह नमक की मात्रा अधिक होने के कारण ग्लेशियर से पिघलने वाला पानी का रंग लाल हो गया हैं. ये रिसर्च कुछ प्रतिशत ठीक थी लेकिन ये इसका असली कारण नहीं था.

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