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फील्ड मार्शल करिअप्पा से नेहरू को लगता था डर, ये थी वजह

फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा भारत के प्रथम कमांडर इन चीफ के रूप में जाने जाते हैं. आज ही के दिन उनका निधन हुआ था. जानिए ऐसी क्या बात थी जिस वजह से भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मन में उन्हें लेकर डर था.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 15 May 2020
फील्ड मार्शल करिअप्पा से नेहरू को लगता था डर, ये थी वजह के. एम. करिअप्पा (फोटो-@PuducherryPYC)

के. एम. करिअप्पा भारत के पहले ऐसे नागरिक थे जिन्हें भारतीय सेना की कमान मिली थी. वह पहले भारतीय आर्मी चीफ के तौर पर नियुक्त किए गए थे. वह पहले 'प्रथम कमांडर इन चीफ' थे. उनका पूरा नाम कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा था. आज ही रोज 15 मई 1993 में उनका निधन हो गया था. आइए जानते हैं उनके बारे में.

सेना दिवस से खास कनेक्शन

के. एम. करिअप्पा ने जनरल के रूप में 15 जनवरी, 1949 को पद ग्रहण किया था. इसके बाद से ही 15 जनवरी को 'सेना दिवस' के रूप में मनाया जाने लगा. करिअप्पा भारत की राजपूत रेजीमेंट से थे. 1953 वह रिटायर हो गए थे, लेकिन फिर भी किसी न किसी रूप में उनका सहयोग भारतीय सेना को सदा प्राप्त होता रह था. उन्होंने कई साल भारत का नेतृत्व किया. उन्होंने साल 1947 में हुए भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना का नेतृत्व भी किया था.

कहां हुआ था जन्म और कैसे हुई थी पढ़ाई

फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक में हुआ था और उन्होंने शुरुआती शिक्षा माडिकेरी के सेंट्रल हाई स्कूल में ली थी. साल 1917 में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में एडमिशन ले लिया. उनका नाम उन दो अधिकारियों में से है, जिन्हें फील्ड मार्शल की पदवी दी गई थी. आपको बता दें, अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उन्हें 'Order of the Chief Commander of the Legion of Merit' से सम्मानित किया.

वे एक होनहार छात्र के साथ-साथ क्रिकेट, हॉकी, टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी रहे. पूरी ईमानदारी से देश को दी गई उनकी सेवाओं के लिए भारत सरकार ने साल 1986 में उन्हें 'Field Marshal' का पद प्रदान किया. बता दें, सैम मानेकशॉ भारत के पहले फील्ड मार्शल थे और जनवरी 1973 में पद से सम्मानित किया गया था.

साल 1953 में रिटायर होने के बाद करियप्पा ने न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में बतौर हाई कमिश्नर काम किया. वे यूनाइटेड किंगडम स्थ‍ित Camberly के इंपीरियल डिफेंस कॉलेज में ट्रेनिंग लेने वाले पहले भारतीय थे.

द्वितीय विश्व युद्ध में लिया हिस्सा

भारतीय स्वतंत्रता से लेकर करियप्पा ने इराक, सीरिया, ईरान और बर्मा में कार्रवाई देखी थी. साल 1942 में वह एक यूनिट की कमान देने वाले पहले भारतीय अधिकारी बने थे. उन्होंने तीन दशक के अपने करियर में कई पुरस्कार और प्रशंसा प्राप्त किए. उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी के खिलाफ बर्मा में अपनी भूमिका के लिए ब्रिटिश साम्राज्य (OBE) का प्रतिष्ठित आदेश प्राप्त हुआ था.

जवाहर लाल नेहरू को था इस बात डर

फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा के बेटे के. सी करिअप्पा ने अपनी किताब में जिक्र किया था कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को उनके पिता से डर था. ये किताब फील्ड मार्शल के. एम. के जीवन पर लिखी गई थी. किताब में जिक्र है कि 1953 में के. एम. करिअप्पा को ऑस्ट्रेलिया का हाई कमिश्नर बना कर भेज दिया गया था.

बेटे ने किताब में बताया, "पिता को न केवल सेना में बल्कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी बहुत लोकप्रिय माना जाता था. शायद, नेहरू को एक शक था कि वह तख्तापलट कर सकते हैं. हालांकि जनरल करिअप्पा के नेहरू और इंदिरा के साथ काफी अच्छे संबंध थे, लेकिन फिर भी नेहरू के मन में एक डर था.

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