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नेशनल मेडिकल कमीशन को PM मोदी ने बताया गेमचेंजर, गिनाए ये फायदे

देश में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह पर आ रहा नेशनल मेडिकल कमीशन लंबे समय से चर्चा में है. देश भर के डॉक्टर इस कमीशन को लेकर विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं. मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने IANS को दिए इंटरव्यू पर नेशनल मेडिकल कमीशन पर अपनी बात रखी.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 14 August 2019
नेशनल मेडिकल कमीशन को PM मोदी ने बताया गेमचेंजर, गिनाए ये फायदे प्रतीकात्मक फोटो

देश में एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) की जगह पर आ रहा नेशनल मेडिकल कमीशन लंबे समय से चर्चा में है. देश भर के डॉक्टर इस कमीशन को लेकर विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं. मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने IANS को दिए इंटरव्यू पर नेशनल मेडिकल कमीशन पर अपनी बात रखी.

उन्होंने कहा कि नेशनल मेडिकल कमीशन आगे चलकर बड़े सुधार लाएगा. ये बिल पहले से मौजूद समस्याओं को भी सही करेगा. इस बिल के आने से कई और सुधार होंगे जैसे कि भ्रष्टाचार के मौके कम हो जाएंगे और पारदर्शिता बढ़ेगी. ठीक ऐसे वक्त पर जब दुनिया के दूसरे देश विकास की दिशा में अग्रसर भारत की ओर देख रहे हैं.

प्रधानमंत्री ने कहा कि हम महसूस करते हैं कि ये सिर्फ एक स्वस्थ ढंग से प्रचारित करने से ही संभव है. देश में गरीब और हाशिये के लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का काम ये कमीशन करेगा. बता दें, इसी माह की शुरुआत में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) बिल को मोदी सरकार ने राज्यसभा में पास कराया है. राज्यसभा में दो अगस्त को ये बिल पास हुआ जबकि 29 जुलाई को लोकसभा में ये बिल पास हो गया था. बिल पास होने के बाद अगले 3 सालों में नेशनल मेडिकल कमीशन का गठन किया जाएगा.

प्रधानमंत्री ने नेशनल कमीशन बिल को लेकर आईएएनएस से कहा कि इसे लेकर कई विवाद भी रहे हैं और सरकार इनसे निपटी भी है. जैसे, मेडिकल सुधार का ही मामला है, जिसकी आम लोगों में प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही है. मेडिकल सुधार पर कई हिस्सों से आपत्तियां उठी हैं.

क्या आपको लगता है कि आपने जो यह बदलाव किए हैं, वे अच्छे से सोच विचार कर किए गए हैं? इस सवाल पर उन्होंने बिना देर किए कहा, "हमने जब 2014 में सरकार बनाई थी, तब मेडिकल शिक्षा की मौजूदा व्यवस्था को लेकर कई तरह की चिंता सामने आई थीं. इससे पहले, अदालतों ने भारत में मेडिकल शिक्षा को संभाल रही संस्थाओं के खिलाफ कड़े शब्दों में आपत्ति दर्ज कराई थी, इन्हें भ्रष्टाचार का गढ़ कहा था.

एक संसदीय समिति ने गहन अध्ययन के बाद मेडिकल शिक्षा को लेकर निराशाजनक तस्वीर पेश की थी. उसने कुप्रबंधन, पारदर्शिता की कमी, मनमानेपन का उल्लेख किया था. पहले की सरकारों ने इस क्षेत्र को सुधारने के बारे में सोचा था, लेकिन इस दिशा में वे आगे नहीं बढ़ सकी थीं. हमने इस दिशा में आग बढ़ने का फैसला किया, क्योंकि यह मामला ऐसा नहीं है, जिसे हल्के में लिया जाए.

यह हमारे लोगों की सेहत और हमारे युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है. इसलिए, हमने विशेषज्ञों का एक समूह यह देखने के लिए बनाया कि समस्या कहां है. विशेषज्ञ समूह ने प्रणाली का बारीकी से अध्ययन किया और समस्याओं तथा सुधार के क्षेत्रों को चिन्हित किया. यह विशेषज्ञों के सुझाव हैं, जिसे हम मौजूदा विधेयक में लेकर आए हैं.

एक ऐसे समय में जब दुनिया के देश विश्व में विकास को गति देने के लिए भारत की तरफ देख रहे हैं, हमने महसूस किया कि ऐसा केवल एक स्वस्थ आबादी के साथ ही हो सकता है. गरीब लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से मुक्त करना बेहद जरूरी है, जिसे सेहत संबंधी समस्याएं स्थायी बना देती हैं. एनएमसी इस उद्देश्य को भी पूरा करता है.

यह देश में मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता को सुनिश्चित करेगा। इसका लक्ष्य विद्यार्थियों पर से बोझ घटाना, मेडिकल सीट बढ़ाना, मेडिकल शिक्षा की लागत को घटाना है. इसका मतलब यह है कि और अधिक प्रतिभावान युवा मेडिसिन को एक पेशे के रूप में अपना सकेंगे और इससे मेडिकल पेशेवरों की संख्या को बढ़ाने में मदद मिलेगी. आयुष्मान भारत चिकित्सा देखभाल के क्षेत्र में क्रांति लाने के बारे में है. ये जागरूकता बढ़ा रहा है, साथ ही गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा को पहुंच के दायरे में ला रहा है.

खासकर द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में हम इसे सुनिश्चित करने पर भी काम कर रहे हैं कि हर तीन जिले के दायरे में एक मेडिकल कॉलेज हो. चिकित्सा सेवा के प्रति बढ़ती जागरूकता, बढ़ती आय और लोगों के बीच बेहतर जीवन के लक्ष्य पर फोकस के बीच हमें इस मांग को पूरा करने के लिए हजारों चिकित्सकों की जरूरत पड़ेगी, खासकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में. एनएमसी सभी हितधारकों के लिए बेहतर नतीजों के लिए इन सभी मुद्दों पर गौर करेगा.

आपने निश्चित ही पढ़ा होगा कि दो दर्जन नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के साथ 2019-20 का एकेडमिक साल सरकारी कॉलेजों में एक साल में सर्वाधिक अतिरिक्त मेडिकल सीटों का इजाफा देखेगा. हमारा रोड मैप साफ है- एक पारदर्शी, सुगम और वहन करने योग्य मेडिकल शिक्षा व्यवस्था जो बेहतर चिकित्सा सेवा के नतीजों तक ले जा सके.

कमीशन की जरूरत क्यों है

आइए जानें, केंद्र की मोदी सरकार ने एमसीआई की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन के जरिए कौन से नए प्रावधान जोड़े हैं जिसका विरोध हो रहा है.

1. नेशनल मेडिकल कमीशन बिल तैयार करने वाले नीति आयोग को ऐतराज था कि MCI में ज्यादातर डॉक्टर चुनाव चाहते हैं जिस कारण डॉक्टरों की लॉबी सक्रिय रहती है ऐसे में वे मूल मकसद पर ध्यान नहीं दे पाते.

2. एमसीआई के पास मेडिकल एजुकेशन और डॉक्टरों की प्रैक्टिस जैसे 2 बड़े काम नहीं होने चाहिए.

3. 2016 में एमसीआई पर बनी स्टैडिंग कमेटी ने कहा कि एमसीआई का सारा फोकस कॉलेजों को लाइसेंस देने पर रहता है जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होती है.

2017 में MCI भंग

उक्त आपत्तियों के आधार पर केंद्र सरकार ने 2017 में एमसीआई को भंग कर एनएमसी के गठन की तैयारी शुरू कर दी थी. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एमसीआई की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए निगरानी कमेटी बनाई थी. तब निगरानी कमेटी ने स्वास्थ्य मंत्रालय को बताया था कि एमसीआई सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रहा है. इसके बाद केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर एमसीआई की मैनेजमेंट कमेटी को भंग कर दिया तबसे मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई), बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के जरिए संचालित होता है.

प्रावधान जिसका विरोध हो रहा

नेशनल मेडिकल बिल के 32वें प्रावधान के तहत कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को मरीजों को दवाइयां लिखने और इलाज का लाइसेंस मिलेगा. इस पर डॉक्टरों को आपत्ति है क्योंकि इससे मरीजों की जान खतरे में पड़ जाएगी.

इस बिल में एक प्रावधान यह भी है कि आयुर्वेद-होम्योपैथी डॉक्टर ब्रिज कोर्स करके एलोपैथिक इलाज कर पाएंगे. जबकि डॉक्टरों का कहना है कि इससे नीम-हकीम और झोलाछाप डॉक्टरों को बढ़ावा मिलेगा.

प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को 50 फीसदी सीटों की फीस तय करने का हक मिलेगा जबकि डॉक्टरों का कहना है कि इससे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा.

प्रावधान के अनुसार पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिस शुरू करने के लिए डॉक्टरों को एक टेस्ट पास करना होगा. वहीं इसके विरोध में डॉक्टरों का कहना है कि एक बार टेस्ट में नाकाम रहने के बाद दोबारा टेस्ट देने का विकल्प नहीं है.

ये रहा है सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि नेशनल मेडिकल कमीशन देश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने में सक्षम होगा. सरकार का तर्क है कि इस बिल के आने से प्राइमरी हेल्थ वर्कर्स को 6 महीने का मेडिकल कोर्स करके प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिल जाएगा. जिससे वे इलाज और दवाई लिख सकेंगे. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को खासी राहत मिलेगी. ब्रिज कोर्स के जरिए सीमित एलोपैथी प्रैक्टिस का अधिकार सिर्फ उन आयुष डॉक्टरों को मिलेगा जिनके पास प्रैक्टिस का लाइसेंस हो.

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