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नहीं रहे तरुण सागर, जानें- क्या होता है संलेखना या संथारा?

जैन मुनि तरुण सागर महाराज का निधन हो गया है और खबरें आ रही हैं कि उन्होंने संथारा लिया था, जिसके बाद उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए. आइए जानते हैं आखिर क्या है संथारा या संलेखना...

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aajtak.in [Edited By: मोहित पारीक]नई दिल्ली, 02 September 2018
नहीं रहे तरुण सागर, जानें- क्या होता है संलेखना या संथारा? प्रतीकात्मक फोटो

जैन मुनि तरुण सागर महाराज का 51 साल की उम्र में निधन हो गया है. तरुण सागर काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे और बाद में उन्होंने इलाज कराने से मना कर दिया था. उनका अंतिम संस्कार उत्तर प्रदेश के मोदीनगर में तरुण सागर धाम में किया गया. जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज का अंतिम संस्कार शनिवार दोपहर मुरादनगर के सैंथली गांव में हुआ. इस निर्माणाधीन तीर्थ स्थल में ही महाराज का समाधि स्थल बनेगा. इनकी अंतिम विदाई में भी हजारों लोग पहुंचे.

बताया जा रहा है कि उन्होंने इलाज कराने से मना किया और कृष्णा नगर (दिल्ली) स्थित राधापुरी जैन मंदिर चातुर्मास स्थल पर जाने का निर्णय लिया. खबरें आ रही हैं कि तरुण सागर ने अपने गुरु पुष्पदंत सागर महाराजजी की स्वीकृति के बाद संलेखना (आहार-जल न लेना) कर रहे थे और अपना अन्न जल त्याग दिया था. हालांकि कई जानकार इसे गलत बता रहे हैं. आइए जानते हैं संलेखना क्या है?

क्या होता है संलेखना

संलेखना को संथारा या समाधि भी कहते हैं. जैन धर्म के मुताबिक, मृत्यु को समीप देखकर धीरे-धीरे खानपान त्याग देने को संथारा या संलेखना (मृत्यु तक उपवास) कहा जाता है. इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है. वहीं श्वेतांबर साधना पध्दती में संथारा कहा जाता है. सल्लेखना दो शब्दों से मिलकर बना है सत्+लेखना. यह श्रावक और मुनि दोनों के लिए बतायी गई है. इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है.

बता दें कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संथारा लेने के बाद संलेखना लेने वाले मुनि धीरे-धीरे अन्न आदि का त्याग कर देते हैं. कई लोग मृत्यु से कई दिन पहले संथारा ले लेते हैं, जिसमें वे धीरे-धीरे चीजों का त्याग करते हैं, जैसे चावल, आटा आदि. मृत्यु होने के बाद उन्हें हिंदू रिवाजों की तरह ले अंतिम स्थल तक ले जाया जाता है. इसमें उन्हें लैटाकर ले जाने के बजाय बैठाकर ले जाता है, जैसे तरुण सागर को भी ले जाया गया. उसके बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाता है.

राजस्थान हाईकोर्ट ने 2015 में इसे आत्महत्या जैसा बताते हुए उसे भारतीय दंड संहिता 306 और 309 के तहत दंडनीय बताया था. दिगंबर जैन परिषद ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी.

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